माहवारी पर बात की झिझक हुई ख़त्म

नूतन यादव  आज जब महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे पर हर राजनैतिक विचारधारा का विमर्श हमारे समक्ष मौजूद है हम माहवारी या मासिक धर्म के...

सेलेब्रटिंग कैंसर

विभा रानी लेखिका, रंगमंच में सशक्त उपस्थिति, संपर्क :मो- 09820619161 gonujha.jha@gmail.com ‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’ ‘मुझे नहीं लगता.‘ ‘फिर क्यों आई...

मासिक धर्म : आखिर चुप्पी कब तक ?

सुनीता धारीवाल सामाजिक कार्यकर्ता . ब्लॉगर , कानाबाती ब्लॉग की मोडरेटर. सभी जीवो की मादाएं अपनी  प्रजनन क्षमता के कारण अपने अपने समाज में  उच्च...

#टॉक.. सेक्स स्त्री यौनिकता का उत्सव अभियान

इन दिनों हैश टैग टाक सेक्स सोशल मीडिया पर वाइरल हो रहा है. यह लन्दन के 23, पॉल स्ट्रीट के “स्कारलेट लेडिज” के भव्य...

मातृ-मृत्यु का नियंत्रण महिला -स्वास्थ्य का जरूरी पहलू : चार्म

डाॅ. शकील-उर-रहमान ( कल बिहार में नालंदा सहित अन्य जिलों के विधानसभाओं में मतदान होने जा रहा है. पिछले दो चरणों में महिला मतदाताओं ने...

महाराष्ट्र की ये महिलायें अपना गर्भाशय निकालने को क्यों हैं मजबूर (!)

गन्ना काटने वाले ठेकेदार उन महिलाओं को काम पर रखने के लिए तैयार नहीं हैं जिनकी माहवारी नियमित होती है. इसीलिए इस इलाके...

पुरुषों के पोर्न देखने की आदत का एक अध्ययन: आख़िरी क़िस्त

सक्रिय यौनशिक्षा द्वारा एक ओर जहाँ पुरुषों को उनकी अतिरंजित व हानिकारक कामकल्पनाओं को नियंत्रण में करना सिखाना होगा, वहीं स्त्रियों को अपने सहमी हुई कूपमंडूक स्थिति से बाहर निकलना। इन दोनों विपरीत ध्रुवों के बीच ही कहीं हम एक सधा हुआ संतुलन-बिन्दु खोज पाने की आशा रख सकते हैं यदि इस लक्ष्य को कुशल व संवेदनशील सोशल इंजीनियरों का साथ मिल सके।

सामूहिक नसबंदी के कारण भारतीय स्त्रियों की मौतें: लुटे हुए विकल्प व स्त्री गरिमा

 ( बिलासपुर में नसबंदी के कारण महिलाओं की मौत के कारणों की पड़ताल के लिए चार महिला -स्वास्थ्य संगठनों ने संयुक्त रूप से एक...

दिलचस्प रही माहवारी के सम्बन्ध में मेरी पहली जानकारी

 नवल किशोर कुमार स्त्रियों के लिए माहवारी को टैबू बनाया जाना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है. इसे गोपनीय,  टैबू और लज्जा का विषय बनाने में यह प्रक्रिया...

महावारी से क्यों होती है परेशानी

आरती रानी प्रजापति  महावारी हर स्त्री के 10-14 की आयु में शुरू होने वाला नियमित चक्र है| जिसमें स्त्री की योनि से रक्त का स्त्राव...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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