बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: करुणा प्रीति: अनब्याही माँ का संतान के संरक्षकत्व का संघर्ष

सच यह है कि पितृसत्तात्मक समाजों में, विवाह संस्था के 'अंदर' पैदा हुए बच्चे वैध मगर विवाह संस्था के बाहर (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा स्त्री से) पैदा हुए बच्चे अवैध कहे,माने (समझे) जाते हैं। न्याय की नज़र में, 'वैध' संतान सिर्फ पुरुष की और 'अवैध’ स्त्री की होती है। इसीलिए वैध संतान का 'प्राकृतिक संरक्षक' पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा माँ) होती है। उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए-वैध विवाह होना अनिवार्य है।'अवैध संतान' पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते।

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री : मेरी रॉय, जिसने सम्पत्ति में समान उत्तराधिकार की लड़ाई...

मुकदमें की पृष्ठभूमि यह है कि केरल में ईसाई समुदाय में संपत्ति पर अलग-अलग उत्तराधिकार कानून थे, जो प्राचीन काल से धर्मशास्त्रों के आधार पर बने-बनाये गए थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रथा और कानून होने के कारण, अनिश्चितता और संपत्ति विवाद बढ़ते जा रहे थे। 1916 में त्रावनकोर में राजशाही थी और महाराजा ने सभी नियमों को मिला कर भारतीय ईसाईयों के लिए उत्तराधिकार सम्बन्धी पहला कानून त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 (अधिनियम, 1916) बनाया था।

पैतृक सम्पत्ति, कृषि भूमि और स्त्रियाँ

'कृषि भूमि' विवाद की पृष्ठभूमि यह है कि एक था लाजपत जिसकी मृत्यु के बाद, उसकी कृषि भूमि उसके दो पुत्रों नाथू और संतोख को मिली नाथू ने अपना हिस्सा एक बाहरी व्यक्ति को बेच दिया। संतोख ने मामला हमीरपुर अदालत में दायर कर कहा कि (उत्तराधिकार कानून[7] की धारा 22 के अनुसार) उसे इस मामले में प्राथमिकता पर संपत्ति लेने का अधिकार है।

इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत: अरविंद जैन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायधीश पर लगे आरोप को खारिज कर दिया और इसपर अपनी रिपोर्ट जारी करने से इनकार भी...

सत्ता में भारतीय महिलाओं की उपस्थिति: सामर्थ्य, सीमाएँ एवं संभावनाएँ

अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था.

कानूनी भेदभाव: बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री (सी.बी.मुथम्मा)

उल्लेखनीय है कि अदालत में बहस के दौरान महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने सरकार की तरफ से दलील दी थी कि महिलाओं द्वारा विवाह करने की स्थिति में, गोपनीय और महत्वपूर्ण सरकारी सूचनाओं और दस्तावेजों के लीक होने का खतरा या संभावना बढ़ सकती है। इस पर न्यायमूर्ति अय्यर ने पूछा था "क्या पुरुषों द्वारा शादी करने से यह खतरा या संभावना शून्य है?"

हिंदू कोड बिल और डॉ. अंबेडकर

डॉ. अंबेडकर राजनीति के आकाशगंगा के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिनकी छवि कालांतर में भी धूमिल नहीं हो...

अपने ही कानूनी जाल-जंजाल में फंसे पितृसत्ता के होनहार लाडले

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 9 के अनुसार अगर अठारह साल से अधिक उम्र का लड़का, अठारह साल से कम उम्र लड़की से विवाह करे तो अपराध। सज़ा दो साल कैद या दो लाख ज़ुर्माना या दोनों हो सकते हैं. इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि अगर लड़का भी अठारह साल से कम हो, तो कोई अपराध नहीं!

भेदभाव की कानूनी बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: रख्माबाई

रख्माबाई ने भी सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराया "ऐसे निक्कमे और बीमार पति के साथ कभी नहीं रहूँगी, भले ही छह महीने जेल जाना पड़े।" रख्माबाई के इस फैसले से ब्रिटिश शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था के पहिये डगमगाने लगे थे। सम्बंधित कानून-नियम बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई। देश-दुनिया के अखबारों में बहस गर्म होने लगी। पक्ष-विपक्ष में लेख, रिपोर्ट, पत्र, साक्षात्कार छपने लगे।

न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो...

समाचार है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर... न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

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