चार करोड़ की फेलोशिप पाने वाली बेटी सुदीक्षा को मर्दवाद ने मार दिया

सुदीक्षा भाटी ने 5वीं तक की पढ़ाई डेरी स्कैनर गांव के प्राइमरी स्कूल से की थी वह गरीब परिवार की होनहार बेटी थी, उसने...

माहवारी का ब्योरा नौकरी के लिए क्यों जरूरी (?) : बेड़ियां तोडती स्त्री: नीरा...

“जब हम भारतीय महिलाओं के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक गारंटी प्राप्त करने के लिए आगे बढ़...

मातृत्व अवकाश पर भी अंकुश! (बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: जे. शर्मिला)

इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। भारत में सबसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम,1929 बॉम्बे में बनाया गया था। ‘रॉयल कमीशन’ की सिफारिश के बाद मातृत्व लाभ अधिनियम मद्रास, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और आसाम में भी लागू किये गए। केंद्र द्वारा दिसम्बर,1942 में खदान मातृत्व लाभ अधिनियम,1942 सिर्फ देशभर की खानों में महिला मजदूरों के लिए ही पारित किया गया था। कुछ संशोधन के साथ बॉम्बे मातृत्व लाभ अधिनियम को अजमेर-मेवाड़ राज्य ने 1933, दिल्ली ने 1937 और सिंध ने 1939 में अपनाया।

अपने परिवार के खिलाफ लड़कर लता सिंह ने हासिल किया न्याय: बेड़ियाँ तोडती स्त्री

हमारा विचार है कि किसी भी आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया और विचाराधीन पूरा आपराधिक मामला अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ याचिकाकर्ता के भाइयों के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग है, जो केवल इसलिए उग्र थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपनी जाति के बाहर शादी की। हम यह सुन कर व्यथित हैं कि याचिकाकर्ता के भाइयों के खिलाफ उनके गैरकानूनी कार्यों (जिसका विवरण ऊपर सेट किया गया है) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने याचिकाकर्ता के पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही की है।

और भी तरीके हैं (तीन) तलाक-ए-बिद्दत समाप्त करने के: सरकार बहादुर की मंशा पर...

सात बिन्दुओं पर आधारित यह बिल अभी भी तीन तलाक बोलने वाले पति को तीन साल की सजा़ देने पर कायम है। अभी भी यह अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा। इसका अर्थ है कि तीन तलाक़ बोलने वाले शौहर को पत्नी या उसके खून के रिश्तेदारों की शिकायत पर फ़ौरन पुलिस जेल ले कर चली जाएगी और उसे तीन साल तक की सजा दी जाएगी। बिल में खून के रिश्तेदारों की परिभाषा भी स्पष्ट नही है।

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: करुणा प्रीति: अनब्याही माँ का संतान के संरक्षकत्व का संघर्ष

सच यह है कि पितृसत्तात्मक समाजों में, विवाह संस्था के 'अंदर' पैदा हुए बच्चे वैध मगर विवाह संस्था के बाहर (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा स्त्री से) पैदा हुए बच्चे अवैध कहे,माने (समझे) जाते हैं। न्याय की नज़र में, 'वैध' संतान सिर्फ पुरुष की और 'अवैध’ स्त्री की होती है। इसीलिए वैध संतान का 'प्राकृतिक संरक्षक' पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (अनब्याही, विधवा या तलाकशुदा माँ) होती है। उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए-वैध विवाह होना अनिवार्य है।'अवैध संतान' पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते।

बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री : मेरी रॉय, जिसने सम्पत्ति में समान उत्तराधिकार की लड़ाई...

मुकदमें की पृष्ठभूमि यह है कि केरल में ईसाई समुदाय में संपत्ति पर अलग-अलग उत्तराधिकार कानून थे, जो प्राचीन काल से धर्मशास्त्रों के आधार पर बने-बनाये गए थे। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रथा और कानून होने के कारण, अनिश्चितता और संपत्ति विवाद बढ़ते जा रहे थे। 1916 में त्रावनकोर में राजशाही थी और महाराजा ने सभी नियमों को मिला कर भारतीय ईसाईयों के लिए उत्तराधिकार सम्बन्धी पहला कानून त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 (अधिनियम, 1916) बनाया था।

पैतृक सम्पत्ति, कृषि भूमि और स्त्रियाँ

'कृषि भूमि' विवाद की पृष्ठभूमि यह है कि एक था लाजपत जिसकी मृत्यु के बाद, उसकी कृषि भूमि उसके दो पुत्रों नाथू और संतोख को मिली नाथू ने अपना हिस्सा एक बाहरी व्यक्ति को बेच दिया। संतोख ने मामला हमीरपुर अदालत में दायर कर कहा कि (उत्तराधिकार कानून[7] की धारा 22 के अनुसार) उसे इस मामले में प्राथमिकता पर संपत्ति लेने का अधिकार है।

इंसाफ करने के नाटक-नौटंकी की क्या जरूरत: अरविंद जैन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायधीश पर लगे आरोप को खारिज कर दिया और इसपर अपनी रिपोर्ट जारी करने से इनकार भी...

सत्ता में भारतीय महिलाओं की उपस्थिति: सामर्थ्य, सीमाएँ एवं संभावनाएँ

अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था.
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