मुजफ्फरपुर बलात्कार मामले में मीडिया रिपोर्टिंग बैन के खिलाफ स्त्रीकाल संपादकीय सदस्य निवेदिता पहुँची...

राजीव सुमन   5 सितम्बर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में पटना उच्च न्यायलय द्वारा मुजफ्फरपुर शेल्टर होम-बलात्कार मामले की जांच से सम्बंधित मीडिया रिपोर्ट पर प्रतिबन्ध-आदेश  को...

राष्ट्रपति, क्या कुलपति के खिलाफ कार्रवाई करने वाले हैं!

स्त्रीकाल डेस्क  कार्य स्थलों पर महिला कर्मियों के यौन  उत्पीडन को लेकर 2013 में क़ानून बना. इसके पहले कार्यस्थलों पर यौन  उत्पीड़न के प्रसंग में...

निजता के अधिकार के खिलाफ सरकार की सारी दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज...

पिछले तीन वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में मामले की मैराथन सुनवाई के दौरान, भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने तर्क दिया था कि...

सीवर में मौत: सर्वोच्च न्यायालय की अवहेलना

रजनीतिलक रविवार (20 अगस्त) को जब सारी दुनिया अपने घर में बैठ कर अपने बच्चों के साथ छुट्टी मनाती है तब लोक नायक जयप्रकाश नारायण...

मातृत्व अवकाश पर भी अंकुश! (बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: जे. शर्मिला)

इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। भारत में सबसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम,1929 बॉम्बे में बनाया गया था। ‘रॉयल कमीशन’ की सिफारिश के बाद मातृत्व लाभ अधिनियम मद्रास, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और आसाम में भी लागू किये गए। केंद्र द्वारा दिसम्बर,1942 में खदान मातृत्व लाभ अधिनियम,1942 सिर्फ देशभर की खानों में महिला मजदूरों के लिए ही पारित किया गया था। कुछ संशोधन के साथ बॉम्बे मातृत्व लाभ अधिनियम को अजमेर-मेवाड़ राज्य ने 1933, दिल्ली ने 1937 और सिंध ने 1939 में अपनाया।

यौन स्वतंत्रता, कानून और नैतिकता (अरविन्द जैन)

वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', मगर सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है 'आदर्श बहू'।वैसे भारतीय शहरी मध्य वर्ग को 'बेटी नहीं...

सत्ता में भारतीय महिलाओं की उपस्थिति: सामर्थ्य, सीमाएँ एवं संभावनाएँ

अन्तरराष्ट्रीय मंचो पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आन्दोलन का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है। पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6 प्रतिशत महिलाएँ है। हमारे देश की स्थिति हमारे पड़ोसी देशों से भी बदतर है। हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रश्न अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ। 1947 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार हुई रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था और इसमें विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की खराब स्थिति के लिए उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी जिम्मेदार है और इससे उबरने के लिए विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था.

धारा 304 IPC के बहाने एक चर्चा : एक विचार यह भी

प्रो.परिमळा अंबेकर प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो...

लालू प्रसाद से महिला आरक्षण पास कराने की स्त्रीकाल की अपील: कहा कोटे के...

राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ने पटना पुस्तक मेले में शनिवार को पूर्व सांसद अली अनवर पर केंद्रित ‘अली अनवर’ शीर्षक पुस्तक पर...

12वीं लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस ( 8 मार्च )

राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति  दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया , परन्तु प्रधानमंत्री...
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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।