नाबालिग पत्नी से, बलात्कार का कानूनी अधिकार (हथियार): अरविंद जैन

  ( इन दिनों ' वैवाहिक बलात्कार ' को लेकर काफी मुखरता बनी है - जो स्वागत योग्य है,  तो विरोध के भी स्वर हैं...

वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाना समस्या का समाधान नहीं : महिला संगठन

( पिछले दिनों राष्ट्रीय महिला आयोग की नवनियुक्त अध्यक्ष ने यौनकर्म को कानूनी दर्जा देने की वकालत की थी , जिसके खिलाफ स्त्री अधिकार...

शादी का झूठा आश्वासन यौन शोषण

अरविंद जैन स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब...

महिला मताधिकार पर बहस : सन्दर्भ बिहार विधान परिषद ( १९२१ , १९२५, १९२९...

डा मुसाफिर बैठा डा मुसाफिर बैठा कवि और सामाजिक -सांस्कृतिक विषयों के चिन्तक हैं . सम्प्रति बिहार विधान परिषद् में कार्यरत हैं. संपर्क : 09835045947,...

धारा 304 IPC के बहाने एक चर्चा : एक विचार यह भी

प्रो.परिमळा अंबेकर प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो...

यौन शोषण के आरोपों से घिरी न्यायपालिका

अरविंद जैन स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब...

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आगे आये महिला संगठन

दहेज़ कानूनों के दुरुपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के खिलाफ चारो ओर आक्रोश है . आज पटना में भी ८ महिला...

दहेज विरोधी कानून में सुधार की शुरुआत

कमलेश जैन कमलेश जैन सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं , स्त्री मुद्दों और कानूनी मसलों पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ लेखन करती...

न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

अरविंद जैन स्त्री पर यौन हिंसा और न्यायालयों एवम समाज की पुरुषवादी दृष्टि पर ऐडवोकेट अरविंद जैन ने मह्त्वपूर्ण काम किये हैं. उनकी किताब...

हम चार दशक पीछे चले गए हैं :

आयडवा और पी यू सी एल की  अपील ( याद होगा कि महिला आंदोलनों की वजह से महिलाओं के खिलाफ उत्पीडन को लेकर क़ानून सख्त...
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लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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