न्यायपालिका में यौन शोषण का मामला पहला नहीं है और न्याय नहीं हुआ तो...

समाचार है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ़ यौन उत्पीड़न की जाँच, न्यायमूर्ति बोबड़े को सौंप दी है। न्यायमूर्ति बोबड़े ने आंतरिक समिति में, न्यायमूर्ति एन. वी.रमन्ना और इंदिरा बनर्जी को रखने का फैसला लिया है। काश! यह फैसला शनिवार को ही ले लिया गया होता, तो कितना बेहतर होता। किसी को यह नहीं लगता कि मीडिया, सुप्रीम कोर्ट बार या किसी और दबाव-तनाव में लिया फैसला है। खैर... न्यायिक विवेक जागा तो सही, भले ही थोड़ी देर से।

अपने परिवार के खिलाफ लड़कर लता सिंह ने हासिल किया न्याय: बेड़ियाँ तोडती स्त्री

हमारा विचार है कि किसी भी आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया और विचाराधीन पूरा आपराधिक मामला अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ याचिकाकर्ता के भाइयों के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग है, जो केवल इसलिए उग्र थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपनी जाति के बाहर शादी की। हम यह सुन कर व्यथित हैं कि याचिकाकर्ता के भाइयों के खिलाफ उनके गैरकानूनी कार्यों (जिसका विवरण ऊपर सेट किया गया है) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने याचिकाकर्ता के पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही की है।

भेदभाव की कानूनी बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: रख्माबाई

रख्माबाई ने भी सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराया "ऐसे निक्कमे और बीमार पति के साथ कभी नहीं रहूँगी, भले ही छह महीने जेल जाना पड़े।" रख्माबाई के इस फैसले से ब्रिटिश शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था के पहिये डगमगाने लगे थे। सम्बंधित कानून-नियम बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई। देश-दुनिया के अखबारों में बहस गर्म होने लगी। पक्ष-विपक्ष में लेख, रिपोर्ट, पत्र, साक्षात्कार छपने लगे।

मातृत्व अवकाश पर भी अंकुश! (बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: जे. शर्मिला)

इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। भारत में सबसे पहले मातृत्व लाभ अधिनियम,1929 बॉम्बे में बनाया गया था। ‘रॉयल कमीशन’ की सिफारिश के बाद मातृत्व लाभ अधिनियम मद्रास, उत्तर प्रदेश, बंगाल, पंजाब और आसाम में भी लागू किये गए। केंद्र द्वारा दिसम्बर,1942 में खदान मातृत्व लाभ अधिनियम,1942 सिर्फ देशभर की खानों में महिला मजदूरों के लिए ही पारित किया गया था। कुछ संशोधन के साथ बॉम्बे मातृत्व लाभ अधिनियम को अजमेर-मेवाड़ राज्य ने 1933, दिल्ली ने 1937 और सिंध ने 1939 में अपनाया।
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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।