सत्ता का पुरुष चरित्र: राजनीति-गली अति सांकर

स्वरांगी साने

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. संपर्क : swaraangisane@gmail.com

‘क्या किसी महिला के साथ सेल्फी लेने से महिला और पुरुष का चरित्र खराब हो जाता है? क्या महिलाओं के साथ सेल्फी लेना गुनाह है?’ यह सवाल बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने उठाया है। दरअसल तेजस्वी यादव की एक तस्वीर जेडीयू ने बाकयदा प्रेस कॉन्फ़रेंस कर सार्वजनिक की थी। सारे मामले को परे रख भी दें तब भी तेजस्वी ने जो सवाल उठाए हैं उनके जवाब दिए ही जाने चाहिए। बकौल तेजस्वी ‘क्या नीतीश जी ने यह तस्वीर जारी करवाने से पहले इस महिला की इज़ाजत ली थी? क्या ये निजता का उल्लंघन नहीं है?’ राजनीति की गलियों में घूमती सेक्स सीडियां किसी महिला पक्षधरता का नमूना नहीं होतीं. जब संबंधों में कोई पीड़ित पक्ष सामने नहीं आया तो एक को ठिकाने लगाने के लिए दूसरे की निजता का उल्लंघन पुरुष-वर्चस्व के हु-तू-तू का खेल है.


स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध उनकी निजता के होते हैं और उसे चौराहे पर ला खड़ा करना, उतने ही ओछेपन का प्रतीक। फिर लोग कोई ढाल तलाशते हैं मतलब जैसे गुरमीत मामले में यह कहना कि हनीप्रीत मेरी बेटी जैसी है। स्त्री-पुरुष को साथ में देखा ही नहीं जा सकता और यदि वे साथ हैं, तो ग़लत ही है..पर यदि बेटी (या पत्नी) कहकर कितना भी अत्याचार कर लें, सही है। दो व्यक्तियों के बीच के संबंधों पर तीसरे का दखल क्यों हो?समाज किसी भी स्त्री के मामले में ठेकेदार बन क्यों उभरता है? स्त्री जिसे वह (समाज) जैसा चाहे नचा ले…और राजनीति की काली कोठरी में तो स्त्रियों का नाम उछालना बड़े गर्व (!) की बात।

अनचिन्हा कोलाज़….स्वरांगी साने की कविताएँ

हम एक से बढ़कर एक कद्दावर महिला राजनेताओं की बात कर लें लेकिन सबसे ज़्यादा उनकी वे तस्वीरें देखी जाती हैं जिसमें वे ग्लैमरस दिखती हैं। सत्ता किसी की भी हो, वह स्त्रीवाची नहीं होती और स्त्री के प्रति उसका नज़रिया भी सकीर्ण होता है। वरना क्या कारण है कि अभी दो-तीन दिन पहले नंदुरबार जिले में एक चीनी के कारखाने में आयोजित कार्यक्रम में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन कह उठते हैं कि शराब के ब्रांड को महिलाओं का नाम दे दिया जाए, तो यह खूब बिकेगी। ऐसे में क्या कोई फ़र्क दिखता है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनैतिक पैंतरे और महाराष्ट्र के मंत्री की सोच में? लगता है दोनों ही मानते हैं कि महिला का नाम उछालना दोनों हाथ में लड्डू होने जैसा है, यदि तीर निशाने पर लग गया तो भी ठीक और नहीं लगा तब भी खबर तो बन ही जाएगी…बदनाम कर दिया या बदनाम हो गए, दोनों सूरत में नाम तो हो ही जाएगा। और इस हथकंडे में वे इस्तेमाल करते हैं स्त्री को।

हनीप्रीत की खबर नहीं सेक्स फंतासी बेच रही मीडिया

कथित ‘त्रिया चरित्र’ की दुहाई देने वालों से बड़ी कठोरता से पूछने का मन करता है कि इस मानसिकता के लिए वे पुरुष चरित्र जैसा कोई नाम क्यों नहीं रचते? क्या वजह है कि जैसे किसी मंच की शोभा बढ़ाने के लिए फूलदान को रख दिया जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी मंच पर बैठा दिया जाता है…या वैसे ही राजनीति में उनका स्थान तय कर दिया जाता है।

उत्तरप्रदेश में होने वाले नगर निकाय के चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जी-जान एक किये हैं तो प्रदेश में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए यह प्रतिष्ठा का मुद्दा है। लेकिन यहाँ भी महिला का इस्तेमाल चुनावी हथकंडे जीतने के लिए किया जा रहा है। कानपुर के बिठूर से भाजपा विधायक अभिजीत सांगा की माँ निर्मला सिंह को भाजपा ने बिठूर नगर पंचायत से प्रत्याशी बनाया और बस्ती जिले के रुधौली नगर पंचायत से वहाँ के विधायक संजय जायसवाल की पत्नी संगीता जायसवाल को प्रत्याशी बनाया गया है जबकि कहा जा रहा था जमीनी कार्यकता को टिकट दी जाएगी। यदि इन महिलाओं को जमीनी कार्यकर्ता के रूप में टिकट दी गई है तो स्वागत है लेकिन इन्हें विधायक सांसद के रिश्तेदार के तौर पर टिकट दी गई है। ऊपरी तौर पर महिला को टिकट लेकिन वह केवल कठपुतली।मड़ियाहूँ सीट से माफ़िया डॉन मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मैदान में हैं पर भाई लोग कह रहे हैं- ‘सब जानत हैं कि भइया जी लड़ रहे हैं। भाभी का नामे भर है’।


ऐसा ही तब भी कहा गया था जब पहली बार राबड़ी देवी सत्ता में आई थी। लेकिन समय ने बताया कि यदि किसी भी, एकदम घरेलू महिला को भी अवसर दिया जाए तो वह खुद को सिद्ध कर देती है लेकिन यह और ऐसे अनगिनत उदाहरण हो सकते हैं जहाँ महिलाओं को केवल उस खिलौने की तरह माना जाता है, जिसका जैसा चाहे इस्तेमाल कर लो…वह क्या कर लेगी? किसी के साथ उसकी तस्वीर को हवा में उछाल दो या उसकी ही हॉट तस्वीर जारी कर दो। ‘राहुल गांधी, स्मृति ईरानी से डरते हैं’ का जुमला उछाल दो या ऐसा ही कुछ कर लो…

यह स्थिति भारत की नहीं पूरे विश्व की है। आँकड़े बताते हैं पूरे विश्व में विधायिकाओं में केवल 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6.1 प्रतिशत महिलाएँ ही हैं। भारत में 17 वीं विधानसभा की 403 में से केवल 98 सीटें महिलाओं को दी गई, मतलब 25 प्रतिशत से भी कम और वह भी अधिकांश अपनी बहू-बेटियों में बाँट दी गईं। महिलाओं को खुद से कम आँकना, ‘ये क्या जानती हैं’, वाली मानसिकता और महिलाएँ कुछ समझ नहीं सकतीं, वाला भाव दूर होना चाहिए। बसपा की तो मुखिया ही महिला है तब भी टिकट बँटवारे में महिलाओं की सबसे ज़्यादा उपेक्षा की गई, 400 सीटों पर केवल 21 महिला प्रत्याशी। भाजपा ने 370 में से 46 सीटें महिलाओं को दीं, कांग्रेस ने 105 में से केवल पाँच महिलाओं को सपा ने 299 में से केवल 29 महिलाओं को दीं।

महिलाओं ने लगातार अपने आपको सिद्ध किया लेकिन पुरुषों की मानसिकता दकियानूस ही रही। इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही देश के सबसे बड़े राज्य अविभाजित उत्तरप्रदेश में सुचेता कृपलानी (1963 से 1967) बनकर देश की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं। उसी उत्तरप्रदेश में अगर कानून व्यवस्था के राज की बात की जाती है तो वो कल्याण सिंह और मायावती की ही होती है। देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे ताकवतर लोगों में मायावती हैं। अखिलेश यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाने वाली डिम्पल यादव हैं। बिहार में पहली बार 1997 में भले ही मजबूरी में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनाई गई थी लेकिन 2005 तक वे तीन बार मुख्यमंत्री पद को मुस्तैदी से सँभाल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल का नाम आए तो ममता बनर्जी को भूल जाएँ यह हो ही नहीं सकता। सोनिया गाँधी पर विदेशी मूल का होने का आरोप लगता रहा हो लेकिन सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज हो चुका है। जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती का मुख्यमंत्री बन जाना कोई आसान बात नहीं थी। पंजाब में आतंकवाद का निपटारा करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्टल को देखा जा सकता था। देश की राजधानी दिल्ली में लंबे समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शीला दीक्षित का कब्जा था। राजस्थान में वसुंधरा राजे का बोलबाला है वे 2003 से 2008 तक यहाँ मुख्यमंत्री थीं। उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री काल में सबसे ताकतवर मंत्री इंदिरा हृदयेश रहीं। तमिलनाडु में शशिकला के लिए रास्ता बनाने का काम जयललिता ने किया था जब उन्होंने वहाँ के पुरुष वर्चस्व की राजनीति को मटियामेट कर दिया था।



…ज़ाहिर है अब पुरुषों को साबित करना होगा कि वे महिलाओं को अपने देखने के दृष्टिकोण को बदलेंगे..महिला के बारे में विचार करते हुए उनकी आँखें जिस एक्स-रे मशीन का काम करती हैं उस चश्मे से महिलाओं की त्रि-आयामी छवि बनाने की बजाए अपने दिमाग के जाले झाड़कर महिलाओं के बहुआयामों को समझेंगे और महिलाओं का इस्तेमाल किसी भी तरीके से अपने हित में करना बंद करेंगे।

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