राकेश श्रीमाल की कविताएँ

राकेश श्रीमाल 

इन दिनों समाज के जेंडर-भेद की परतें सतह पर है. स्त्रियाँ अपने को वस्तु समझे जाने के खिलाफ मुंह खोल रही हैं. इस माहौल में राकेश श्रीमाल की ये कवितायें पढ़ी जानी चाहिए. देह की चौहद्दी से अधिक स्त्री का अस्तित्व शायद आपकी संवेदना को झंकृत कर दे.

उंगली
वह कौन है
जो मेरे कंधे पर सोकर
स्वप्न देखती है
मेरी नींद के साथ-साथ
बालों को सहलाती एक हथेली
कब एक छोटी उंगली बन जाती है
छूने लगती है होंठ

परस्पर स्पर्श में
टहलती रहती है नींद
कभी कानों को छूती है
कभी पीठ पर सिहरती है
कभी आपस में
उलझी उंगलियों को धोखा देकर
चुपके से कुहनी पर ठहर जाती है
वह कौन है
जो मेरी देह में बार-बार बसती है
मुस्कराती है
फिर अपने ही अकेलेपन में
गुम ही जाती है

अक्सर
————–
एक स्त्री से
प्यार करने के बाद
क्या बचता है?

निसन्देह
स्त्री बिल्कुल नहीं बचती
वह बचता है
जो हमने कभी नहीं चाहा था
और वह भी बचता है
जो कभी कुछ होता ही नहीं

स्त्री से
प्यार करते समय
हम स्त्री को ही बचा नहीं पाते हैं

प्यार करते हुए
वह इतनी दूर चली जाती है
जितनी कि अक्सर
वह जाती नहीं है

हम एक ही समय में
स्त्री से प्यार करते हैं
और उससे दूर भी होते हैं


स्त्री के साथ कौन रहता है?

स्त्री का आदिम गीत


कहीं कँटीली झाड़ियों के पीछे
ना मालूम कब से बसी कन्दरा में
सुबक रही है एक स्त्री

उसी के गर्भ में जा रहे हैं उसके आँसू
अपनी नई पीढ़ी को देने के लिए

बूढ़ी दाई कहती है,
यह परम्परा ना जाने कब से चली आ रही है
उस स्त्री के दबे हाथ
मिट्टी से बाहर आकर
कथक का ह्स्तसंचालन कर रहे हैं
कलाप्रेमी उसका रस ले रहे हैं

साँस लेने को तड़प रही है
मिट्टी में लथ – पथ उसकी नाभि
उसके शरीर के बालों ने
फैला दी हैं मिट्टी में अपनी जड़ें
रूप – लावण्य की फसल पैदा करने के लिए

काटो — काटो
जल्दी काटो इस फसल को
कहीं यहाँ सूख न जाए

बड़े जतन से
धैर्य और भावनाऑं के
लोहे को प्रशंसा की आग में पिघलाकर
तैयार किए जाते हैं हंसिये
फसल काटने के लिए

भिड़ गए हैं युद्ध –स्तर पर
सभी धर्म… कयदे – कानून
यहाँ तक कि प्रेम भी
कहीं फसल बरबाद न हो जाए

चुपचाप कटती रहती है स्त्री
प्रेम में, गृहस्थी में
और समय में

किसी को पता नहीं चलता
उसका बीतना
फिर – फिर जन्मते हुए

प्रतिपल बोई जाती है उसकी फसल
प्रतिपल काटने के लिए
जमींदार भी बन गए हैं मजदूर

यह सबसे बड़ा समाचार
सुनाना नहीं चाहता कोई भी
स्त्री इसके सुनने के पहले ही
कर लेती है आत्महत्या

बिना यह जाने
उसकी फसल उसी ने काट ली है

काटने की मेहनत किए बिना
समूची दुनिया
उसका स्वाद लेती रही है

कबीर को होना था स्त्री
कुछ और लिखने के लिए
मीरा तो दीवानी ही मर गई

पुल्लिंग है, शब्द का लिंग भी
लपलपाते विष – वीर्य को समाते हुए

आओ…खेलो मुझसे
आओ…
रचो मेरे साथ सारे उपनिषद….पुराण
नित नई महान रचनाएं और आचार – संहिताएं

होगा तो वही जो चला आ रहा है
इस सृष्टि की शुरुआत से

बरगद के बूढे पेड़ पर बैठकर
कोयल कब से यहाँ गीत सुना रही है

ऎसा कोई नहीं
जो उसकी लय को पकड़ पाए

राकेश श्रीमाल हिन्दी के प्रमुख समकालीन साहित्यकारों में एक हैं. संपर्क: 9831742543

लिंक पर  जाकर सहयोग करें , सदस्यता लें :  डोनेशन/ सदस्यता
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह ‘द मार्जिनलाइज्ड’ नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. ‘द मार्जिनलाइज्ड’ के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  अमेजन ,   फ्लिपकार्ट से ऑनलाइन  खरीदें 
संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016, themarginalisedpublication@gmail.com

Related Articles

ISSN 2394-093X
418FansLike
783FollowersFollow
73,600SubscribersSubscribe

Latest Articles