हम क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं:क्रूरता की विरासत वाले देश में विधवाओं की स्थिति

भारत में घूमकर रहकर लिखी गयी कैथरीन मेयो की इस किताब के प्रकाशन (1927) के बाद राष्ट्रवादियों की भृकुटियाँ तन गयी थीं, जो आज भी तनी हैं. मिस्टर गांधी ने इसे तब ‘गटर इंस्पेक्टर्स रिपोर्ट’ कहा था. यह किताब तत्कालीन भारत में महिलाओं की दुर्दशा का आइना है, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के रेशे उधेड़ देती है. हाल में प्रसिद्द लेखक कँवल भारती ने इसका अनुवाद किया है, प्रकाशन फॉरवर्ड प्रेस ने किया है. इसका एक अंश पढ़ें और महसूस करें कि हम किस तरह महिलाओं के प्रति क्रूर और कामातुर पूर्वजों की संतानें हैं. वे 6 साल की बच्ची से विवाह और विवाह के संरक्षण में उसका बलात्कार कर सकते थे:

मिस कैथरीन मेयो/ अनुवाद: कँवल भारती

बायें से दायें किताब का कवर और लेखिका

अभिशप्त हिंदू विधवा का चित्र एक दूसरा ही दृश्य दिखाता है। स्त्री का वैधव्य उसकी इतनी भयानक नियति है कि उसे उसके पूर्व जन्म के पापों का फल माना जाता है। उसे अपने पति की मृत्यु के समय से अपने खुद के जीवन के अंतिम समय तक उन पापों का प्रायश्चित करना पड़ता है। कभी लांछन सहकर, कभी यंत्रणा झेलकर और कभी आत्मबलिदान देकर। उसके हर विचार में उसके मृत पति की आत्मा की सेवा ही उसका उद्देश्य है। वह चाहे तीन साल की बच्ची हो, जो विवाह के बंधनों के बारे में कुछ भी नहीं जानती है या अपने पति के संग रहने वाली वयस्क पत्नी-दोनों की स्थिति समान है। पति की मृत्यु होते ही वह पापी और मनहूस करार दे दी जाती है। उसे खुद भी यही लगने लगता है और जब वह सोचने की उम्र में पहुंचती है, तो मान लेती है कि उसके भाग्य में यही लिखा है। मिस सोराबजी इस विषय में कहती हैं-1

‘एक सनातनी हिंदू विधवा अपने वैधव्य के दुःख को उसी तरह खुशी-खुशी सहन करती है, जैसे कोई शहीद अपना बलिदान देता है। किन्तु ऐसी कोई चीज नहीं है, जो उसके दुःखों को कम कर सकती है। उसके स्वीकार करने से भी उसके दुःख कम नहीं होते हैं। क्योंकि, (यह माना जाता है कि) पिछले जन्म में उसने कुछ पाप किए थे; उसी के कारण देवताओं ने उससे उसका पति छीन लिया है। अब उसके लिए यही काम रह गया है कि वह अपने शेष जीवन में पति के मोक्ष के लिए प्रार्थना और प्रायश्चित करे, ताकि अगले जन्म में उसके पति को अच्छा स्थान मिल सके। और सास के लिए भी उसे कोसने का ही काम रह गया है-यह अभागी अगर नहीं आती, तो उसका पुत्र अभी भी जिंदा होता। हालांकि, सास के इस व्यवहार में विधवा के लिए कोई द्वेषभाव नहीं रहता है। क्योंकि, कोसने वाली सास भी उतनी ही अभागी है, जितनी कि बहू; जिसे वह कोसती है। यह कहना आसान है कि विधवा के प्रति कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं होता है। पर, उसे बुरा-भला कहते रहना भी विशेषाधिकार समझा जाता है और उससे हर अच्छा-बुरा काम भी खूब लिया जाता है।’

एक विधवा स्त्री अपने स्वर्गीय पति के घर में हर व्यक्ति के लिए दासी की तरह काम करती है। सारे ही कठोर और गंदे काम उसी से कराए जाते हैं। उसे न आराम करने दिया जाता है और न उसे सुख मिलता है। उसे दिन में एक बार खाने को दिया जाता है और वह भी घटिया। उसे कठोर व्रत रखने पड़ते हैं। उसके सिर के बाल मुड़वा दिए जाते हैं उसे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह किसी समारोह, मांगलिक कार्य, वैवाहिक या धार्मिक अनुष्ठान में शामिल न हो। और किसी गर्भवती स्त्री तथा उस व्यक्ति के सामने न आए, जिस पर उसकी झलक पड़ने से उनका नुकसान हो सकता है। अगर किसी को उससे बोलना या बात करना होता है, तो वे उसे उलाहना भरे शब्दों से ही बोलते-पूछते हैं। वह खुद ही अपने दुःखों की पुजारिन होती है और इसी दुःखमय जीवन को जारी रखना उसका एकमात्र पुण्य कार्य रह जाता है।

19 वीं सदी में सती प्रथा

एक प्राचीन फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखता है कि ‘विधवाओं को इसलिए कष्ट दिए जाते थे, ताकि आसानी से पत्नियों को नियंत्रण में रखा जा सके। वे पतियों की बीमारी के समय उनकी खूब सेवा करें और अपने पतियों को जहर देने से डरें।’2

किन्तु, एक बार मैंने भी यह बात एक हिंदू के मुंह से सुनी थी। उसने खुलकर कहा था-‘हम अपनी पत्नियों को अक्सर इसलिए, दुःखी रखते हैं, क्योंकि हमें यह डर रहता है कि कहीं वे हमें जहर न दे दें। इसलिए हमारे ज्ञानी पुरखों ने विधवाओं को भयानक रूप से दंडनीय बनाया था, ताकि कोई भी स्त्री जहर देने का साहस न कर सके।’

भारत के अनेक भागों की जेलों में मैंने महिला कैदियों के वार्डों में कुछ ऐसी महिलाओं को देखा है, जो अपने पतियों की हत्या के जुर्म में सजा काट रही थीं। ऐसे मामले दुर्लभ मानसिकता के हो सकते हैं और शायद उन्माद (हिस्टीरिया) के भी। क्योंकि, सती की घटनाएं भी यहीं पर होती हैं, जहां नई विधवा अपने कपड़ों पर तेल उड़ेलकर आग लगाकर मर जाती है। और इस काम को वह सबसे छिपकर करती है। ऐसा शायद वह इसलिए करती है, क्योंकि वह विधवाओं की नियति देख चुकी है। वह जानती है कि उसे नौकरानी और दासी बना दिया जाएगा। उसे भूखा रखा जाएगा। उस पर तमाम पाबंदियां लगाई जाएंगी और उसका यौन-शोषण भी होगा। और इससे बचने का उसके पास एक पवित्र उपाय यही है कि वह ‘इस दैवी नियम को अपना ले।’ विदेशियों के बनाए हुए तमाम कानूनी निषेधों के बावजूद वह सती की धर्मसम्मत प्रथा को अपनाकर वर्तमान नरक से बच जाती है और अपने अच्छे पुनर्जन्म की आशा करती है।

यद्यपि शास्त्रों के अनुसार (जिसका हम ऊपर उल्लेख कर चुके हैं), मृतक पति के शव के साथ जीवित पत्नी को जलाना आवश्यक है। परंतु, आजकल यह गैर-कानूनी है। किन्तु, ध्यान देने योग्य है कि यह परिवर्तन केवल एक अपवाद स्वरूप है। इससे यह न समझना चाहिए कि जनता का मत बदल गया है। यह असल में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय धर्मों के क्षेत्र में असाधारण हस्तक्षेप किया है। ब्रिटिश गवर्नर ने लगभग 29 वर्ष पहले ही-जब भारत का शासन प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटेन के ताज के अधीन नहीं आया था-सती प्रथा पर रोक लगा दी थी।3 तब प्रगतिशील भारतीय नेता राजा राममोहन राय ने उस कानून का समर्थन किया था। लेकिन, बंगाल के अन्य भद्रजनों ने उसका भारी विरोध किया था। यहां तक कि उन्होंने सती प्रथा के पक्ष में अंतिम उपाय के रूप में लंदन की प्रिवी काउंसिल में भी लड़ने में संकोच नहीं किया था।

क्या यह सोचा जा सकता है कि अगर अवसर दिए जाएं, तो इस प्रथा की सूख चुकी जड़ें फिर से हरी-भरी हो सकती हैं? मि. गांधी के 11 नवंबर 1926 के साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ में एक हिंदू लेखक लिखता है कि अगर मरते समय पति अनुमति न दे, तो आज भी विधवा का पुनर्विवाह संभव नहीं है। कोई भी धर्मपरायण पति ऐसी अनुमति नहीं देगा। यही लेखक आगे लिखता है-‘विवाह की अनुमति देने के बजाय यदि उसकी पत्नी सती होना चाहे, तो वह इसे ज्यादा पसंद करेगा।’

पति की मृत्यु के समय पत्नी पति के घर में रहती थी। पर, विधवा हो जाने के बाद पति के घर में रहने का उसका कोई कानूनी दावा नहीं रह जाता है। वह वहां ऊपर वर्णित शर्तों के अधीन ही रह सकती है या उसे असहाय अवस्था में बाहर निकाला जा सकता है। तब उसे दूसरों के दान पर जिंदा रहना होगा या वह वेश्यावृत्ति से जीविका चलाएगी; जैसा कि अक्सर होता है। प्रायः ये विधवाएं मंदिर की भीड़ में या तीर्थ स्थलों की गलियों में, सूखे चेहरे ओर घुटे हुए सिरों में-जिन पर अभागे बुढ़ापे के कारण सफेद घूंटी वाले सख्त बाल दिखाई देते हैं-भीख मांगती हुई मिल जाती हैं जहां कभी-कभी कुछ कंजूस भक्त उन्हें मुट्ठी भर चावल खैरात कर देते हैं।

जहां तक विधवा के पुनर्विवाह का प्रश्न है, तो वह सनातनी हिंदू धर्म में असंभव है। विवाह वहां व्यक्तिगत चीज नहीं है, बल्कि एक शाश्वत बंधन है। और यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुओं का विशाल बहुमत मूल रूप से सनातनी है। वह विधवा भले ही छोटी बच्ची हो, जिसके लिए मरने वाला व्यक्ति अजनबी हो। यानी जिसे उसने देखा तक न हो, तो भीउ से यह बताया जाएगा कि उसके पापों के कारण ही उसके पति की मृत्यु हुई है। अथवा वह विधवा 20 साल की हो और वह पति के साथ सहवास कर चुकी हो और साथ खा चुकी हो, तो भी सनातनी हिंदू उसका पुनर्विवाह नहीं होने देंगे। हालांकि, चाहे उसे कोई न माने, किन्तु हाल के वर्षों में पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव ने धीरे-धीरे कुछ जागृति पैदा की है। भारत के विभिनन भागों में अनेक संस्थाएं प्रकट हुई हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कुंवारी विधवाओं का पुनर्विवाह कराना है। किन्तु, यह आंदोलन हिंदू समाज के प्रगतिशील तबके तक ही सीमित है। और उनका प्रभाव इतना कम है कि उससे विधवाओं की संख्या में कोई कमी आई है-यह नहीं कहा जा सकता।

इस विषय में आबे दुब्बा के एक शताब्दी पहले के विचार आज भी सही लगते हैं। उन्होंने कहा था कि 60 वर्ष के पुरुष के साथ एक छोटी बच्ची का विवाह करने और उस पुरुष की मृत्यु के बाद उस बच्ची का पुनर्विवाह न होने देने का मतलब यही होगा कि उसे विधवा के रूप में एक दुराचारी जीवन में धकेल दिया जाएगा। फिर भी विधवा के पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। एब कहते हैं-‘अगर पुनर्विवाह की अनुमति मिलती भी, तो यह अजीब बात है कि इसमें ब्राह्मण छोटी उम्र की बाल-विधवाओं को ही पुनर्विवाह के लिए पसंद करते, जिससे इस तरह की अनुमति से विधवाओं को ही लाभ नहीं होता।’4

जिस सामाजिक ढांचे की युवा विधवा अंग है, उसमें युवा विधवा के प्रभाव का आकलन करने के लिए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह बचपन से काम-उत्तेजना के उसी वातावरण में पली है, जिसमें उसके भाई पले हैं। जो लड़की इस तरह के वातावरण में पाली गई हो और जिसकी कामवासना को इस प्रकार तेज किया गया हो, फिर उसके विधवा होने पर उसके पुनर्विवाह पर रोक लगाकर अगर उसकी कामाग्नि को रोका जाएगा; तो क्या यह आश्चर्यजनक न होगा कि वह अपनी कामवासना की तृप्ति के लिए सामाजिक मान-मर्यादा और नियमों की परवाह नहीं करेगी? इसलिए, मृतक पति के परिवार के लोग अपनी इज्जत की खातिर उस पर रोक लगाते हैं। और बहुत शायद ही ऐसा होता हो, जब उस पर नियंत्रण करने की जरूरत न पड़ती हो। क्योंकि, उसके भीतर आत्मबलिदान की भावना ही उसे रोकने के लिए पर्याप्त हो। किन्तु, भारतीय नेता बार-बार इसके विरुद्ध ही उदाहरण देते हैं। स्वराजवादी नेता लाला लाजपत राय कहते हैं-5

‘बाल-विधवाओं की स्थिति वर्णन से परे है। ईश्वर उनका भला करे, जो उनके पुनर्विवाह के विरोधी हैं। किन्तु, उनके अंधविश्वास के कारण बहुत-सी बुराइयां पैदा होती हैं और इतना नैतिक तथा शारीरिक कष्ट बढ़ता है कि संपूर्ण समाज में अपंगता आ गई है, जो उसके जीवन के संघर्ष में बाधा है।’

मि. गांधी बाल-विवाह तथा बाल-विधवा के संबंध में एक अन्य भारतीय लेखक से सहमत होते हुए अपना मत इस प्रकार व्यक्ति करते हैं-‘इस प्रथा से प्रतिवर्ष हजारों बाल-विधवाएं पैदा हो रही हैं, जिनके कारण समाज में व्यभिचार और घातक बीमारियां फैल रही हैं।’6

लोग इस प्रथा के विरुद्ध बातें करते हैं और इस प्रथा को बंद करने के लिए अपनी जातीय तथा अन्य संस्थाओं के सम्मेलनों में प्रस्ताव भी पास करते हैं। किन्तु, उनमें भा बाल विधवाओं का पुनर्विवाह इतना कम होता है कि एकाध पुनर्विवाह की खबर भी सुधारवादी अखबारों में सुर्खी बन जाती है। जबकि, हिंदू-विधवा पत्नी के पुनर्विवाह का विचार अभी भी अकल्पनीय ही है।

यह दिलचस्प है कि एक ओर जिन विचारों का प्रभाव अत्यंत मजबूती के साथ स्त्री की स्वतंत्रता की दिशा में बढ़ता है, तो दूसरी ओर उसका जोर उसे और ज्यादा गुलाम बनाने पर भी रहता है। यद्यपि, ब्रिटिश रिवाज और पश्चिम की शिक्षा के कारण उच्च स्तर के नेताओं में प्राचीन अंधविश्वासों के खिलाफ असंतोष बढ़ता जाता है। परंतु, अंग्रेजों के सार्वजनिक कार्यों, उनकी सफाई व्यवस्था और कृषि क्षेत्र के विकास के कारण निम्न वर्गों की आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे उन्नति हो रही है; जिससे उनमें अपना सामाजिक स्तर ऊपर उठाने वाले लोगों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। इसी कारण से, जैसा कि 1921 की जनगणना से मालूम होता है-समाज के निम्न वर्गों में भी-विधवा के पुनर्विवाह पर धीरे-धीरे रोक लगती जा रही है। जबकि यह प्रतिबंध उनमें पहले नहीं था। हिंदू जाति के अमीर लोग पूरी तरह सांसारिक संपत्ति पर आत्मनिर्भर होते हैं। किन्तु, निचले स्तर से जो आदमी अचानक ऊपर उठ जाता है और सुख से रहने लगता है, वह पहला काम यही करता है कि संपन्न लोगों के व्यवहार का अनुकरण करना शुरू कर देता है। वह सामाजिक नकलची हो जाता है। ऐसे नकलची भारत में भी अमेरिका से कम नहीं हैं। पर दुर्भाग्य से ऐसे लोग उच्च वर्ग के लोगों की बेड़ियां भी ग्रहण कर लेते हैं।

मथुरा में विधवायें 1974

एक भारतीय अधिकारी, बड़ौदा के मि. मुकर्जी अनिवार्य वैधव्य की प्रथा को ध्वस्त करने के लिए इस प्रकार सुझाव देते हैं-7

‘ऐसे सभी प्रयास तब तक असफल रहेंगे, जब तक कि हिंदुओं में विधवा-पुनर्विवाह का विरोध सम्मान का प्रतीक बना रहेगा। निम्न हिंदू जातियों में भी जो लोग सामाजिक रूप से समृद्ध हो गए हैं, वे विधवा-पुनर्विवाह का विरोध उसी तरह करते हैं, जिस तरह ब्राह्मण।’

बंगाल में प्रसिद्ध पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने भारतीयों में बाल-विधवाओं के पुनर्विवाह का आंदोलन चलाया था और उसे कानूनन वैध बनाने के लिए सरकार का समर्थन किया था। किन्तु, उन पर और उनके इस कार्य के परिणाम पर एक दूसरे प्रमुख भारतीय ने इस प्रकार अफसोस किया-8

‘मुझे खूब याद है कि उनके आंदोलन ने कितनी हलचल पैदा कर दी थी और किस तरह सनातनी हिंदू उसके विरोध में उठ खड़े हुए थे। हिंदू विधवाओं के उस नायक की मृत्यु उसी तरह निराशा में हुई, जिस तरह अन्य बहुत-से लोग, जो समय से पहले पैदा होते हैं अपना अधूरा संदेश छोड़कर मर जाते हैं उनका आंदोलन 1891 में उनकी मृत्यु के बाद से ही धीमा हो गया है। अब नई पीढ़ी उभरी है। पर, उसमें उनके कार्य का उत्तराधिकारी कोई नहीं है। इसलिए, आज भी हिंदू विधवा की दशा बहुत कुछ वैसी ही है, जैसे 50 साल पहले थी। आज शायद ही उनके आंसुओं को पोंछने वाला और उनके जबरन वैधव्य को मिटाने वाला कोई हो। ऐसे लोगों की संख्या जरूर बढ़ गई है, जो विधवाओं के प्रति भावुक सहानुभूति रखते हैं और विद्यासागर की जयंती की सभाओं में चिल्लाकर बोलते हैं। परंतु, हिंदू विधवा के उस महान नायक के संदेश को पूरा करने का कोई प्रयत्न नहीं करते हैं।’ हमेशा सत्य बोलने वाले मि. गांधी कहते हैं-9

‘छोटी लड़की पर जबरन वैधव्य लादना एक बर्बर अपराध है, जिसके लिए हम हिंदुओं को रोज दंड भोगना पड़ रहा है। ऐसे वैधव्य का किसी शास्त्र में कोई प्रमाण नहीं है।10 यदि कोई स्त्री अपने मृतक पति से स्नेह के कारण स्वेच्छा से वैधव्य स्वीकार करती है, तो ऐसा वैधव्य जीवन की सुंदरता और गरिमा बढ़ाता है और घर की शुद्धि करता है और धर्म को भी ऊपर उठाता है। पर धर्म या प्रथा के द्वारा वैधव्य को लादना असह्य गुलामी है। ऐसा वैधव्य घर को अशुद्ध करता है और धर्म का पतन करता है। जब 50 से ऊपर के वृद्ध और बीमार पुरुष छोटी लड़कियों के साथ विवाह करते हैं या उन्हें खरीदते हैं-और कभी-कभी एक-दूसरे से बढ़कर ऊंची कीमत लगाकर भी-तो क्या उनमें से किसी को भी हिंदू विधवाओं की हालत पर शर्म महसूस नहीं होती है?’

किन्तु, फिर भी यह एक व्यक्तिगत मत है; जनता का मत नहीं है। एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता ने मुझसे कहा-‘हमें अब गांधी के सिद्धांत नहीं चाहिए। गांधी एक भ्रमित व्यक्ति हैं।’

एक प्रख्यात भारतीय सर गंगा राम (सी.आई.ई., सी.वी.ओ.) ने सरकार की कुछ मदद से हिंदू विधवाओं के लिए लाहौर शहर में एक सुंदर आश्रम और स्कूल का निर्माण कराया है। 1926 में इस संस्था में 50 से अधिक विधवाएं थीं। बंबई प्रेसीडेंसी में विधवाओं और परित्यक्ता पत्नियों के लिए सरकारी सहायता प्राप्त पांच संस्थान हैं, जिनका संचालन लोकहित में भारतीय भद्रजन करते हैं। इस तरह की कुछ अन्य संस्थाएं भी हो सकती हैं। किन्तु अगर हैं, तो सरकार को अभी उनके बारे में जानकारी नहीं है। मैंने स्वयं बंगाल में नवद्वीप नामक तीर्थ नगरी में एक विधवा आश्रम देखा था, जो स्थानीय लोगों के चंदे और तीर्थ में आने वाले यात्रियों के दान से चलता है। वह 14 साल पुराना था और उसमें आठ विधवाएं थीं। लगता है, उसकी क्षमता इससे ज्यादा की नहीं थी।

नवीनतम सरकारी गणना के अनुसार भारत में विधवाओं की कुल संख्या 2,68,34,838 है।11

संदर्भ :

  1. बिटवीन दि टिवलाइट्स, पृष्ठ-144 से 146
  2. ट्रेवल्स इन दि मुगल इंपायर, 1656-1668 ई. प., फ्रोंस्वा बर्नियर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1916, पृष्ठ-310, 311
  3. देखिए, 1829 का रिजोल्यूशन
  4. हिंदू मैनर्स, कस्टम्स एंड, पृष्ठ-212
  5. दिसंबर 1925 में बंबई में हिंदू महासभा के सम्मेलन में दिया गया अध्यक्षीय भाषण
  6. यंग इंडिया, 26 अगस्त 1926, पृष्ठ-302
  7. सेन्सस ऑफ इंडिया, 1921, वॉल्यूम-1, अध्याय-7, पैरा-134
  8. एनेशन इन दि मेकिंग, सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1925, पृष्ठ-8, 9
  9. यंग इंडिया, 5 अगस्त 1926, पृष्ठ-276
  10. पवित्र हिंदू धर्मशास्त्र
  11. स्टेटिस्टिकल एबस्ट्रेक्ट फॉर ब्रिटिश इंडिया, 1914-15, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया पब्लिकेशन, 1925, पृष्ठ-20