भेदभाव की कानूनी बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री: रख्माबाई

“क्या मैं ही पहला आदमी हूँ जो इस पुकार को सुनकर ऐसा व्याकुल हो उठा हूँ या औरों ने भी इस आवाज़ को सुना है और सुनकर अनसुना कर दिया है? और क्या सचमुच जवान लड़की की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?”
(‘जहाँ लक्ष्मी क़ैद है’ 1957, राजेन्द्र यादव, पृष्ठ 228)

सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने 5 मार्च, 2019 को वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑफ कंजुगल राइट्स) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती एक जनहित याचिका (ओजस्व पाठक बनाम भारत सरकार) सुनवाई के लिए तीन न्यायमूर्तियों की खंडपीठ को सौंपी है। इस संदर्भ में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानना जरूरी है और दादाजी बनाम रख्माबाई केस (1884-88) की चर्चा के बिना बात अधूरी रहेगी।

रख्माबाई उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जन्मी एक ऐसी भारतीय स्त्री थी, जिसे अपने विरोध में तैनात परिवार, समय और समाज की कुप्रथाओं, परम्पराओं और मनमाने कानूनों का उम्रभर सामना करना पड़ा। तब सहमति से सहवास या वैवाहिक सहवास की उम्र सिर्फ दस साल तय थी। (भारतीय दंड संहिता,1860) परिणाम स्वरूप ‘बाल विवाह’ कानून सम्मत माने जाते थे। दहेज और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों की वजह से उन दिनों, उत्तर भारत में तो लड़कियों का पैदा होते ही गला घोंट कर मार दिया जाता था या कुपोषण के कारण मर जाती थी। तभी तो ‘द फीमेल इंफेंटसाइड प्रिवेंशन एक्ट,1870’ पारित हुआ था। 

रख्माबाई ढाई साल की थी कि पिता जनार्दन पांडुरंग का देहांत हो गया। वसीयत के हिसाब से मिली लगभग पच्चीस हजार की संपत्ति, उसकी माँ ने रख्माबाई के नाम कर दी थी। छह साल बाद ही विधवा माँ जयंतीबाई ने, डॉ सखाराम अर्जुन से  दूसरा विवाह कर लिया। सौतेले पिता ने ग्यारह साल की उम्र में ही रख्मा का (बाल) विवाह, अपने ही गरीब रिश्तेदार दादाजी भीकाजी (उम्र बीस साल) से करवा दिया। पढ़ना-लिखना बंद। दादाजी (पति) लगातार यह दबाव बनाते रहे कि रख्माबाई (पत्नी) को उसके साथ रहने दिया जाए, लेकिन रख्माबाई उसके साथ रहने या ससुराल जाने को राजी नहीं। ग्यारह साल बाद (1884) अंततः मामला वकीलों, कानून और अदालत की तारीखों और अपील दर अपील में उलझता चला गया।

बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पिनी ने मुकदमा रद्द करते हुए, अपने ऐतिहासिक निर्णय (दादाजी बनाम रख्माबाई,1885 आईएलआर 9 बम्बई 529, दिनांक 21 सिंतबर,1885) में लिखा “वर्तमान मुकदमे के पक्षकार ग्यारह साल पहले विवाह के धार्मिक समारोह से गुजरे थे। जब प्रतिवादी ग्यारह वर्ष की बालिका थी। उन्होंने कभी सहवास नहीं किया। और अब जब प्रतिवादी बीस-बाईस की महिला है, तो वादी अदालत से उसे घर ले जाने के लिए विवश करने को कह रहा है। प्रतिवादी बचपन में हुए विवाह को मानने के लिए राजी नहीं। उसकी सहमति कहाँ है! मुझे ऐसा लगता है कि  इन परिस्थितियों में युवा महिला को इस व्यक्ति के पास जाने के लिए विवश करना, जिसे वह बेहद नापसंद करती है ताकि वह उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सहवास कर सके। नहीं! यह एक बर्बर, क्रूर और घृणित कार्य होगा। मैं इस युवा स्त्री को वादी के साथ रहने और सहवास करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।”

न्यायमूर्ति पिनी के फैसले से देश भर में (बाल) विवाह की वैधता, परिवार की पवित्रता, हिन्दू संस्कृति की रक्षा और स्त्री स्वतंत्रता, अस्मिता और अधिकारों पर बहस आमने-सामने आ खड़ी हुई। विस्तार के लिए देखें ‘एनस्लेवड डॉटरस, सुधीर चंद्र, ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस, 1997)

न्यायमूर्ति पिनी के फैसले के विरुद्ध दायर अपील की सुनवाई बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सर चार्ल्स सार्जेंट (मुख्य-न्यायाधीश) और सर लिटिलटन होल्योक बेली की पीठ ने की। विद्वान वकीलों (लैथम और मैक्फर्सन) की बहस सुनने के बाद न्यायमूर्तियों ने (2 अप्रैल,1886) न्यायमूर्ति पिनी का फैसला उलट दिया और मुकदमा वापिस एकल जज के पास भेज दिया गया ताकि दोनों पक्षों की गवाही और वकीलों  की बहस के बाद योग्यता के आधार पर निर्णय हो सके।

इस बीच न्यायमूर्ति पिनी इंग्लैंड लौट गए। उनकी जगह न्यायमूर्ति फैरन ने ली। बहस समाप्त होने के बाद न्यायमूर्ति फैरन ने रख्माबाई को निर्देश दिया कि वो एक महीने के भीतर अपने पति दादाजी के घर लौट जाए, अन्यथा छह महीने जेल जाने के के लिए तैयार रहे। उन दिनों वैवाहिक पुनर्स्थापना (रेस्टीट्यूशन ऑव कंजुगल राइट्स) मामले में अदालत की डिक्री के उल्लंघन की सज़ा छह महीने सज़ा होती थी।

रख्माबाई

रख्माबाई ने भी सार्वजनिक रूप से अपना संकल्प दोहराया “ऐसे निक्कमे और बीमार पति के साथ कभी नहीं रहूँगी, भले ही छह महीने जेल जाना पड़े।” रख्माबाई के इस फैसले से ब्रिटिश शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था के पहिये डगमगाने लगे थे। सम्बंधित कानून-नियम बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई। देश-दुनिया के अखबारों में बहस गर्म होने लगी। पक्ष-विपक्ष में लेख, रिपोर्ट, पत्र, साक्षात्कार छपने लगे। रख्माबाई को जेल भेजने का सम्भावित परिणाम, देश भर में विरोध प्रदर्शन और ‘स्त्री विद्रोह’ हो सकता था। रख्माबाई के बचाव में गठित समिति ने प्रिवी कौंसिल में अपील दायर करने के लिए फण्ड जमा करना शुरू कर दिया। 

नैतिकता, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, कानून और स्त्री अधिकारों पर बहस के साथ-साथ, कट्टरपंथी और सुधारवादी नेता बीच का रास्ता भी तलाशते रहे। प्रिवी कौंसिल में अपील दायर होने से सज़ा का खतरा टल गया। दोनों तरफ के बिचौलियों ने समझौते के बात भी जारी रखी। भारी दबाव-तनाव में सभी पक्ष टकराव से बचना चाहते थे। लंबी कानूनी लड़ाई और अनिश्चित भविष्य की भावना से रख्माबाई भी थक गई थी। फिर एक दिन रख्माबाई इस बात पर राजी हो गई कि वह दादाजी को दो हज़ार रुपये देगी और दादाजी ‘डिक्री’ को लेकर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करेगा। समझौते के बाद रख्माबाई आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चली गई। बाद में वह भारत की पहली महिला डॉक्टर बनी। दादाजी की 1904 में मृत्यु होने के बाद रख्माबाई ने शेष जीवन विधवा के वेश में बिताया। 

दरअसल अदालत तक आई (लाई) अधिकांश स्त्रियाँ कानून नहीं जानती और न्याय व्यवस्था (अधिकांश पुरुष) उनकी पीड़ा को महसूस ही नहीं करते (कर सकते)। स्त्री व्यथा-कथा को उसकी नज़र से कैसे देखें, समझें, महसूस करें? समय-समाज ने कभी परिचित ही नहीं होने दिया। हम तो उसे माँ, बहन, पत्नी, बेटी, प्रिया और (खल) नायिका के रिश्तों-रूपों में ही (थोड़ा-बहुत) जानते हैं, व्यक्ति के रूप में जानना कभी सीखा-सिखाया ही नहीं गया। सो करना भी चाहें, तो महसूस कर नहीं (सकते) पाते । बात क्षणिक भावुकता या संवेदनशीलता की नहीं… उसकी पीड़ा को स्वयं की पीड़ा की तरह, आत्मसात करने की है। यह बिना प्रशिक्षित गहन संवेदना के संभव नहीं। स्त्री-पुरुष समानता पर, उपदेशात्मक आदेश सुनाना अलग बात है। न्याय के ऐसे हज़ारों निर्णय बताए-गिनाए जा सकते हैं। न्यायशास्त्र की अवधारणाएँ पुरुषों द्वारा, पुरुषों के संदर्भ में ही रची-रचाई गई हैं, ना कि स्त्रियों के संदर्भ में। मगर बदलाव की ऐतिहासिक प्रक्रिया में अनिवार्य न्यायशास्त्र के नए शस्त्र (तर्क-वितर्क, विचार और अवधारणाएं) भी, एक न एक दिन अवश्य विकसित होंगे। ‘आधी दुनिया’ अन्याय, दमन या विकल्पहीनता का बोझ, अधिक दिन तक ढो नहीं सकती। हर व्यक्ति या समाज का अपना एक सपना और संकल्प होता है, सो वो भविष्यहीन नहीं हो सकते।

कहना ना होगा कि न्यायमूर्ति पिनी का फैसला ना बदलता, तो शायद भारत की करोड़ों बेटियों को विवाह संस्था की गुलामी से राहत मिलती। यह कहना गलत नहीं कि अगर रख्माबाई के पास इतनी ‘संपत्ति’ ना होती, तो शायद मुकदमा ही नहीं होता।1884 के बाद भारत में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का  कानून कुछ फेर-बदल के साथ आज भी बना हुआ है, जबकि इंग्लैंड में 1970 में ही खत्म हो गया। यहाँ महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज़ादी के बाद बने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 में वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का कानून शामिल ही क्यों किया गया। जवाब स्पष्ट और सीधा है कि यह विवाहित स्त्रियों पर नियंत्रण रखने में, पुरुष हितों को पोषित करता था। विधायिका की भाषा को, न्यायपालिका की परिभाषा लगातार मजबूत करती रही। धर्म, विवाह और परिवार जैसी व्यक्तिगत आस्था में धर्म-निरपेक्ष संविधान और मौलिक अधिकारों का क्या काम! 

रख्माबाई केस के लगभग सौ साल बाद आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.ए.चौधरी ने टी. सरिता बनाम वेंकट सुब्बयया (एआईआर 1983 आंध्र प्रदेश 356, दिनांक 1जुलाई, 1983) केस में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 (वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना) को भेदभाव पूर्ण, बर्बर और मानवीय गरिमा का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक करार दिया। लेकिन साढ़े चार महीनें बाद ही  को दिल्ली उच्चन्यायालय के न्यायमूर्ति अवध बिहारी रोहतगी ने हरविंदर कौर बनाम हरमंदर सिंह (ए आईआर 1984 दिल्ली 66, दिनांक 15 नवंबर,1983) मामले में इसे संविधान सम्मत माना। न्यायमूर्ति रोहतगी ने न्यायमूर्ति चौधरी के तर्कों की खुले शब्दों में आलोचना की और कहा कि विवाह संस्था में संवैधानिक अधिकारों का हस्ताक्षेप, चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में साँड़ घुसने (घुसाने) जैसा होगा। यह प्रावधान बनाने का उद्देश्य विवाह और परिवार बचाना है। यौन संबंध विवाह का मात्र एक हिस्सा है, सब कुछ नहीं। संवैधानिक वैधता पर बहस के लिए, अटॉर्नी जनरल (के. पारासरन) अदालत में स्वयं मौजूद रहे। 

सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार (एआईआर 1984 सुप्रीम कोर्ट 1562, दिनांक 8 अगस्त,1984) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एस. मुर्तजा फ़ज़ल अली और सव्यसाची मुखर्जी ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को सही मानते हुए, वैधता के सवाल पर पूर्ण विराम लगा दिया। न्यायमूर्तियों ने कहा कि यह अधिकार तो विवाह संस्था में ही अंतर्निहित है और हिन्दू कानून पर विषय के विद्वान् मुल्ला की किताब पढ़वाई। मतलब इस कानून को असंवैधानिक भी मान लें, तो धर्मशास्त्रों से कैसे बचेंगे! “स्त्री का धर्म है कि हमेशा अपने पति की छत्रछाया (घर) में आज्ञाकारी पत्नी बन कर रहेगी।” आश्चर्यजनक है कि तीनों अदालतों के फैसलों में, दादाजी बनाम रख्माबाई केस का कहीं कोई उल्लेख तक नहीं है। (विस्तार के लिए देखें ‘पिता पुत्री संवाद, औरत होने की सज़ा, अरविंद जैन)

इस बीच देश की अनेक अदालतों ने  बाल विवाह के मामलों भी, इसे बचाव का उचित कारण नहीं माना। रख्माबाई से लेकर सरोज रानी और अभी तक, भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी पति की संपत्ति और ‘यौन-दासी’ बनी हुई है। बाल विवाह और वैवाहिक बलात्कार कानून की संवैधानिक वैधता के  मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पूर्णपीठ के समक्ष (2008-12) बहस के दौरान, इस लेख के लेखक ने न्याय के रखवालों की हिन्दू धर्म, विवाह, परिवार और धर्मशास्त्रों में अटूट आस्था, निष्ठा और पूर्ण समर्पण को विशुद्ध रूप में उबलते-उफनते देखा (महसूस) किया है। चारों तरफ से ज़हर बुझे तर्क-बाणों के घाव, अभी तक सालते हैं। अक्सर लगता था कि शायद मैं तांबे की ठोस दीवार में कील ठोंकने का प्रयास (दुःसाहस) कर रहा हूँ। 

परिणाम स्वरूप 2013 में हुए संशोधन के बाद भी, पति को अपनी पत्नी से वैवाहिक बलात्कार का कानूनी अधिकार बना-बचा हुआ है। बाल विवाह पूर्ण रूप से अवैध नही। विचित्र स्थिति यह है कि भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने 8 अप्रैल, 2019 को बंगलुरू में कहा कि पुरुषों के लिए वैवाहिक बलात्कार की छूट का प्रावधान हटाने से ग्रामीण परिवारों में अराजकता फैल जाएगी। परिवार संस्था बिखर जाएगी… नैतिक मूल्य नष्ट हो जाएंगे। 

खैर.. अब देखना यह है कि वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती विचाराधीन जनहित याचिका पर, सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ कब और क्या फैसला सुनाती है। विवाह और (संयुक्त) परिवार के किले में कैद स्त्री की बेड़ियाँ टूटेंगी या नहीं।  न्यायिक विवेक फिर कोई नया समाजशास्त्र-न्यायशास्त्र रचेगा या कोई उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक राग अलापने लगेगा। “क्या सचमुच स्त्री की आवाज़ को सुनकर अनसुना किया जा सकता है?” 

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ISSN 2394-093X
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