किन्नर से अपने बेटे का विवाह कराने वाली एक दिलेर माँ की कहानी, उसी की जुबानी


किन्नरों का सामूहिक विवाह ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज हो चुका है। इससे पूर्व किन्नरों का इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक विवाह दुनिया के किसी कोने में नहीं हुआ था। यह सामूहिक विवाह देश के छत्तीसगढ़ प्रांत की राजधानी रायपुर में 30 मार्च, 2019 को समारोह पूर्वक संपन्न हुआ। इस सामूहिक विवाह की खास बात यह थी कि इसमें शामिल सभी पंद्रह जोड़े में सभी वधु ‘किन्नर’ यानी ‘ट्रांसवुमेन’ थी। यह सामूहिक विवाह बैंड-बाजा और बाराती के साथ पूरे धूम-धाम से संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ में कार्यरत ट्रांसजेंडरों की संस्था ‘मितवा समिति’ की इस पूरे आयोजन में अग्रणी भूमिका रही। देश के कई राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से पंद्रह जोड़े इस सामूहिक विवाह में शामिल हुए। यह सामूहिक विवाह कई मायनों में सम्पूर्ण विश्व में अपने-आपमें अनूठा था। किन्नरों को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियों को बदलने की मुहिम के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के बतौर ही इसे देखा जाना चाहिए। इस सामूहिक विवाह में जहां राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भी वर-वधु को आशीर्वाद देने के लिए आए। वहीं ज़्यादातर वर पक्ष के परिजन भी इस मौके पर उपस्थित हुए, यह भी अपने आपमें अहम बदलाव की तरफ ही इशारा करता है। भारतीय समाज में आज भी जहां ज़्यादातर लोग या तो किन्नरों को‘देवी’ का रूप मानते हैं या फिर उसे हास्य-व्यंग्य और अपमान का पात्र ही समझते हैं। इस दो किस्म के अतिरेकों के बीच आज यह समझने की आवश्यकता है कि किन्नर भी हमारी-आपकी तरह इंसान ही हैं। पुरुष शरीर में पैदा हुआ कोई व्यक्ति जब अपने आपको स्त्रियों जैसा महसूस करता है और स्त्री के रूप में रहने लगता है, तो उसे ही किन्नर के तौर पर जाना जाता है। विज्ञान ने आज ऐसे लोगों के लिए अपने लिंग को परिवर्तित कर लेने की राह को भी सुगम बना दिया है। लिंग परिवर्तित करा लेने के बाद ये किन्नर पूरी तरह स्त्री ही बन जाती है। एक स्त्री और एक ट्रांसवुमन में बस केवल इतना ही फर्क रह जाता है कि ट्रांसवुमन में बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं पाई जाती। इस सामूहिक विवाह में रायपुर के एक जोड़े- पंकज और ईशिता ने भी शादी रचाई। इसी मौके पर पंकज की माँ से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र के समाज कार्य विषय के प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार ने इस पूरे मुद्दे पर बातचीत की। पंकज की माँ की ही जुबानी यह पूरी बातचीत नीचे प्रस्तुत की जा रही है…..  

पंकज नागवानी की माँ राधा नागवानी से बात करते हुए मुकेश कुमार

पंकज नागवानी मेरा बेटा है और ईशिता मेरी बहु है। ईशिता ट्रांसवुमन है। आज हम सास-बहु साथ में बहुत अच्छी तरह से रहते हैं।हमारी एक बेटी भी है, जिसकी शादी पहले ही हो चुकी है और वह ससुराल में रहती है। हमारे काफी रिश्तेदार हैं और हमारा परिवार बहुत बड़ा है। हम मूलतः छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं, किन्तु अब रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में ही बस गए हैं। हमारे परिवार को किन्नर होने के बावजूद ईशिता को अपनाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। क्योंकि हमारे परिवार में ऐसी कोई बात ही नहीं होती कि ईशिता किन्नर है अथवा क्या है। आज हमारे पूरे परिवार को इस बात को लेकर किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं है। बात रही औलाद की, कि किन्नर बच्चे पैदा नहीं कर सकती, तो फिर वंश कैसे आगे बढ़ेगा! मगर यह तो साधारण सी बात है। कई बार यह देखने में आता है कि हममें से कई स्त्रियोंके भी बच्चे पैदा नहीं होते। तो ऐसी स्थिति में हम क्या करते हैं! किसी परिवार से अथवा अनाथालय से बच्चे गोद ले लेते हैं। तो मैं भी अपने बेटे और बहु को एक बच्चा गोद ले दूँगी, पूरा हो जाएगा हमारा परिवार! और क्या चाहिए! संसार में, जिंदगी में, हमारी कितनी पीढ़ियाँ आईं और चली गईं। जरूरी तो नहीं कि हमारी सारी पीढ़ीयों की ही औलादें हुई ही हों! तब फिर इस कारण रिश्ते में समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए?

जब मेरे बेटे ने ट्रांसवुमन ईशिता से विवाह के अपने फैसले के बारे में मुझे बताया, तो मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाया और उनसे इस बारे में बात की। उन सभी ने इसपर और तो कोई आपत्ति नहीं जताई, किन्तु औलाद को लेकर ही उनकी आपत्ति थी। फिर मैंने अपने रिश्तेदारों को समझाया कि तुमलोगों की यह बात तो सही है। किन्तु स्त्री-पुरुष में भी शादी होती है, तो किसी-किसी के बाल-बच्चे नहीं होते हैं, तो उस वक्त हम क्या करते हैं! उसे तो समाज भी कुछ नहीं कहता।

पंकज की माँ ईशिता से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में बताते हुए वह कहती हैं कि कुछ वर्ष पूर्व एक बार मैं काफी बीमार पड़ गई थी। धनतेरश का दिन था। बेटा उस वक्त कपड़े की दुकान में काम करता था, उसे अपने काम पर जाना होता था, त्योहार के कारण उसेछुट्टीभी नहीं मिल रही थी। सो बेटे ने कहा कि बहन को ससुराल से बुला लेते हैं। लेकिन बेटी की शादी के बाद वह पहली दीपावली थी और मैं चाहती थी कि वह अपनी पहली दीपावली ससुराल में ही मनाए। इसलिए मैंने बेटे से कहा कि उसे मेरी बीमारी के बारे में बताना भी मत। तब बेटे ने ईशिता को फोन करके घर बुला लिया। उसने दो दिनों तक मेरी खूब सेवा की। उस वक्त तक मुझे पता भी नहीं चला था कि वह किन्नर है या लड़की है। दो-तीन में मैं जब चंगी (स्वस्थ्य) हो गई और चलने-फिरने लायक हो गई तो बेटे ने मुझे ईशिता के किन्नर होने की बात बताई और उसे घर में साथ रखने की बात कहने लगा। उस वक्त मैंने बेटे को समझाया कि बिना शादी किए इसे साथ में रखने पर पास-पड़ोस और समाज के लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। यह ठीक नहीं होगा। बाद में बेटे ने मुझे बताया कि दोनों ने डोंगरगढ़ में बगैर किसी को बताए शादी भी कर ली है। तब मैंने अपने रिश्तेदारों को बुलाया, उन्हें सबकुछ बताया। सबको तैयार कर भैया-दूज के दिन गुरुद्वारे में ले जाकर दोनों की शादी करा दी। आज रायपुर में इस बड़े आयोजन में एक बार फिर मेरे बेटे और बहु की शादी का समाजीकरण होते देख काफी अच्छा लग रहा है। परिवार-समाज दोनों जगह इन दोनों को वैवाहिक जोड़े का दर्जा मिल गया है। ताकि कोई उंगली न उठा सके कि पराई लड़की को हमने अपने घर में बिन ब्याहे रख लिया है। यह हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता।

वह आगे बताती हैं कि मैं यह सोचते हुए इस रिश्ते के लिए तैयार हुई कि यदि इस शादी से इंकार करती हूँ तो बेटे का प्यार छिन जाएगा। हो सकता है इससे बेटा भटक जाए, बिगड़ जाए। यदि ऐसा होता तो आखिर मेरी ही तो औलाद बिगड़ती! यही सोचकर हमने इस रिश्ते को कबूल कर लिया। इससे मेरे बेटे को उसका प्यार मिला। उसी की खुशी में तो मेरी खुशी है। मेरा बेटा खुश है तो मैं भी खुश हूँ। यही सोचते हुए मैंने अपने बेटे की खुशी का रास्ता चुना।

चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लिए वह कहती है कि मुझे इस बात की खुशी है कि न तो मेरे रिश्तेदारों ने और न ही समाज के दूसरे लोगों ने हमारे इस निर्णय को लेकर हमें कभी परेशान किया। होना भी यही चाहिए कि जब हमने अपने बेटे के इस रिश्ते को कबूल कर लिया तो किसी को इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मेरा बेटा आज अच्छे से कमाता है। कमाई के पैसे पहले मुझे लाकर देता था। शादी के बाद मैंने उससे कहा कि अब अपनी बीबी को दे, उसे भी लगना चाहिए कि तूने उसे बीबी का दर्जा दिया है। आज दोनों मेरी अच्छी तरह से देखभाल करते हैं। और मुझे क्या चाहिए!

अंत में वह कहती है कि मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं हूँ। अपना नाम लिख लेना और थोड़ा-बहुत पढ़ना जानती हूँ। किन्तु मैं यह जरूर कहूँगी कि सभी माँ-बाप को अगर उनका बच्चा ऐसे फैसले लेता है तो अपने बच्चों की खुशी के लिए ऐसे रिश्ते को खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए। ट्रांसवुमन और स्त्री में कोई फर्क नहीं है, वह भी अपने पति को हर खुशी देती है। बस केवल वह बच्चे पैदा नहीं कर सकती। किन्तु देश में अनाथालयों तो बच्चे भरे पड़े हुए हैं, वे वहाँ से बच्चे गोद ले सकते हैं। इससे उस अनाथ बच्चे को भी परिवार मिल जाएगा। ऐसे रिश्ते में किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है। किन्नरों का जन्म भी तो हम स्त्रियों के ही पेट से हुआ है। तो फिर उसे अपनाने में क्या दिक्कत है! समाज को यह समझना होगा कि किन्नर कोई आसमान से नहीं टपका है। इसलिए किन्नरों को न तो गलत निगाह से ही देखा जाना चाहिए और न तो उसे हीन ही मानना चाहिए।