ट्रोजन की औरतें’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व

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शशांक शुक्ला
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्रोफेसर सह विभागाध्यक्ष हैं.

परिपार्श्व – एथेंस और ट्रॉय का युद्द पश्चिमी सभ्यता का आदि विमर्श बिंदु है। अधिकांश पश्चिमी साहित्य , कला, दर्शन, राजनीति सिद्धांत इस युद्ध की छाया तले विकसित हुए हैं। आप चाहें तो होमर के ‘इलियड’, ‘ओडिसी’ की बात करें या अरस्तु के राजनीतिक-दर्शन या काव्य-सिद्धांत की। यह बड़ा विचित्र है कि किसी सभ्यता का आदि-विमर्श युद्ध बन रहा हो, किन्तु यह केवल पश्चिमी सभ्यता का सच नहीं है; अपितु भारतीय परंपरा का भी सच है। वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ केवल राम-रावण युद्ध मात्र न था, अपितु दो संस्कृतियों का आंतरिक संघर्ष भी था। किन्तु यह संघर्ष सांस्कृतिक संघर्ष था, कहीं बहुत भीतरी संघर्ष , या मनुष्य की आंतरिक वृत्तियों का संघर्ष… । प्रश्न है कि क्या यह सांस्कृतिक संघर्ष था या साभ्यतिक संघर्ष? क्या ‘महाभारत’ का युद्ध सभ्यता का संघर्ष था? हालांकि ‘महाभारत’ का युद्ध पारिवारिक युद्ध था- एक ही कुल-गोत्र के बीच का युद्ध। फिर वह सांस्कृतिक संघर्ष क्यों न बना? बात थोड़ी और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। ‘रामायण’ पर जिस आर्य-अनार्य संघर्ष की छाया देखी गयी है, वैसा संघर्ष किसी रूप में ‘महाभारत’ के सन्दर्भ में नहीं देखा गया। ‘रामायण’ के पात्रों का जिस प्रकार प्रतीकीकरण किया गया…जिस प्रकार ‘रामायण’ पर आधारित रामलीलाओं का मंचन हुआ…जिस प्रकार आदर्श गढ़ने की सम्भावना ‘रामायण’ में छिपी हुई थी…या कहें कि आंतरिक वृत्तियों को उद्घाटित करने की सामर्थ्य ‘रामायण’ में जिस प्रकार थी, वैसा ‘महाभारत’ में नहीं। देव-असुर के द्वैत के लिए जिस प्रकार का स्पेस ‘रामायण’ में था, उस प्रकार का स्पेस ‘महाभारत’ में नहीं था। ‘महाभारत’ आंतरिक संघर्ष नहीं है, बावजूद पारिवारिक संघर्ष है और ‘रामायण’ आंतरिक संघर्ष है, बावजूद सांस्कृतिक संघर्ष है। यही कारण है कि ‘रामायण’ सांस्कृतिक संघर्ष का महाकाव्य है और ‘महाभारत’ साभ्यतिक संघर्ष का महाकाव्य। हालांकि ‘महाभारत’ के मूल में , केंद्र में धर्म रहा है, सत्य रहा है; किन्तु अपनी व्यंजना में वह सभ्य-असभ्य या कहें कि ‘सभ्यता का विमर्श’ रहा है। युधिष्ठिर और दुर्योधन सभ्य और असभ्य के रूपान्तर हैं, जिन्हें क्रमशः सत्य [ कृष्ण ] और असत्य [ शकुनि ] का संबल है। हालांकि ‘महाभारत’ की संरचना जटिल है। वह विभिन्न प्रकार के अंतर्विरोधों को समेटे हुए है। धर्म की ढेरों कथाएं, विभिन्न प्रसंग, घटनाएँ , आख्यान, चरित्र….ये सब मिलकर ‘महाभारत’ को ‘सम्पूर्ण मानस का प्रतिनिधि’ बनाते हैं। दरअसल ‘रामायणकार’ की तरह ‘महाभारतकार’ के सामने ग्रन्थ को दो भिन्न संस्कृतियों के संघर्ष के रूप में चित्रित करने की साहित्यिक/सांस्कृतिक बाध्यता न थी। इसलिए भी  उसे सम्पूर्ण भारतीय मानस के बिम्ब के रूप में चित्रित करने के लिए अतिरिक्त स्पेस मिला। ]

‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक युद्ध के निष्कर्ष [ ? ] पर आधारित नाटक है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ और ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की व्यंजना में फ़र्क है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ एक पक्ष की विजय और शान्ति स्थापना से जुड़ा हुआ है तो ‘युद्ध के निष्कर्ष’ भयावहता, संत्रास, पीड़ा, रुदन…में। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ थोड़ा दार्शनिक है, सामजिक है , राष्ट्रीय है..मानवतावादी है तो ‘युद्ध के निष्कर्ष’ थोड़ा पारिवारिक है, व्यक्तिगत है, आत्मिक है, मनोसंघर्ष के स्तर पर है। ‘युद्ध से निष्कर्ष’ के पश्चात ‘युद्ध के निष्कर्ष’ की विभीषिका प्रारंभ होती है। बड़े फलक के संघर्ष वस्तुतः आंतरिक संघर्षों को जन्म देते हैं। एक बड़ा युद्ध सांस्कृतिक विजय-पराजय का दंभ-अभिशाप तो देता ही है, साथ ही अपने पीछे विलाप करती मानव-आत्माओं के चित्र भी हमें पकड़ा देता है।  ‘ट्रोजन की औरतें’ ग्रीक ट्रेजडी [ युद्ध ] को हम इसी रूप में देख सकते हैं। उसी प्रकार जैसे ‘महाभारत’ में युद्ध के पश्चात गांधारी तथा अन्य स्त्रियों के विलाप दृश्य। यह बड़ा आश्चर्य है कि ‘वाल्मीकि’ ने युद्ध की समाप्ति पर मंदोदरी-सुलोचना या अन्य स्त्रियों के ‘विलाप दृश्य’ उस प्रकार सघनित रूप में चित्रित नहीं किये। इसके पीछे कहीं यह वजह तो नहीं रही कि वहां सांस्कृतिक संघर्ष में विजय का प्राप्य इतना बड़ा था कि व्यक्तिगत संताप तक हमारी दृष्टि आसानी से नहीं पहुंचती? सुलोचना जैसी स्त्रियों के करुण दृश्य यदा-कदा संकेतात्मक रूप में आये हैं, किन्तु वे कथा की संरचना में अपना विशेष अर्थ नहीं रख पाते।

फोटो- विकिपीडिया

‘द ट्रोजन विमेन’/ ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक यूरिपिडीज द्वारा 416 ईसापूर्व में लिखा गया था। यह नाटक यूनान की विजय तथा ट्रॉय की पराजय के कथ्य पर केन्द्रित है। किन्तु इसका मूल कथ्य विजय के पश्चात की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ‘ट्रोजन की औरतें’ युद्ध के पश्चात के उन्माद, पाशविकता, व्यभिचार, हिंसा पर आधारित है। यह नाटक मुख्य रूप से हैक्युबा के विलाप और उस बहाने महान यूनान की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ में विभिन्न प्रकार के ‘विलाप दृश्य’ रखे गए हैं। जैसे धृतराष्ट्र का विलाप, कौरववंश की युवतियों के सामूहिक विलाप। इसके अतिरिक्त विभिन्न अध्याय केवल विलाप की  विभिन्न भंगिमाओं के निमित्त रचे गए हैं। दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधू को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप, अपने अन्य पुत्रों तथा दुशासन को देखकर गांधारी के श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 18 ] । विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति तथा दु:सह को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 19 ]  । गांधारी तथा श्रीकृष्ण के प्रति उत्तरा और विराट कुल की स्त्रियों के शोक एवं विलाप का वर्णन [ अध्याय 20 ] । गांधारी के द्वारा कर्ण को देखकर उसके शौर्य तथा उसकी स्तुति के विलाप का श्रीकृष्ण के सम्मुख वर्णन [ अध्याय 21 ]  । अपनी-अपनी स्त्रियों से घिरे हुए अवन्ती नरेश और जयद्रथ को देखकर तथा दु:शला पर दृष्टिपात करके गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख विलाप [ अध्याय 22 ]  । शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोण को देखकर श्रीकृष्ण के सम्मुख गांधारी का विलाप [ अध्याय 23 ] । भूरिश्रवा के पास उसकी पत्नियों का विलाप , उन सबको तथा शकुनि को देखकर गांधारी का श्रीकृष्ण के सम्मुख शोकोदगार [ अध्याय 24 ] । तथा अन्यान्य वीरों को मरा देखकर गांधारी का शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्ण को यदुवंशविनाश विषयक श्राप देना [ अध्याय 25 ] । यह बड़ा विचित्र संयोग यह कि हैक्युबा और गांधारी के वर्णन/ विलाप में अद्भुत रूप से साम्य है । ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक के केंद्र में हैक्युबा है, ठीक उसी प्रकार जैसे ‘स्त्री पर्व’ तथा ‘स्त्री विलाप पर्व’ के केंद्र में गांधारी। जिस प्रकार गांधारी समस्त कुरुवंश के लिए विलाप कर रही है, उसी प्रकार  हैक्युबा ट्रोजन के लिए। 

क्या ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व’ से ग्रीक त्रासदी ‘ट्रोजन की औरतें’ के बीच किसी प्रकार की तुलना की जा सकती है? ‘ट्रोजन को औरतें’ पश्चिमी सभ्यता/आख्यान का एक हिस्सा भर है। जबकि ‘महाभारत’ एक रचयिता की स्वतंत्र अनुकृति। फिर ‘महाभारत’ की अपनी जटिल-विस्तृत संरचना है, जहाँ ‘कथ्य’ को व्यापक रूप दिया गया है; वहीँ ‘ट्रोजन की औरतें’ एक या कुछ-एक दृश्यों में रचित नाटक है। ‘महाभारत’ में ‘स्त्री विलाप पर्व’ के अतिरिक्त भी विलाप के ढेरों दृश्य हैं, जिसमें केवल स्त्रियाँ ही विलाप नहीं करतीं , अपितु पुरुष भी विलाप करते हैं। ‘ऐषीक पर्व’ के दसवें अध्याय में पुत्रों तथा पांचालों के वध पर युधिष्ठिर का विलाप, धृतराष्ट्र के अग्नि प्रवेश पर युधिष्ठिर का विलाप, अर्जुन की मृत्यु पर चित्रागंदा का विलाप, वभ्रुवाहन का शोकोदगार, ‘शल्य पर्व’ के 63 वें अध्याय में दुर्योधन का विलाप, ‘सौप्तिक पर्व’ के आठवें अध्याय में दुर्योधन की दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामा का विलाप… ।  ‘स्त्री पर्व’ में पुत्र की मृत्यु पर द्रौपदी का विलाप, धृतराष्ट्र का विलाप आदि । इसके अतिरिक्त भी महाभारत युद्ध में विभिन्न प्रकार के विलाप दृश्य चित्रित किये गए हैं। जैसे एकलव्य की मृत्यु पर सुभद्रा, अर्जुन तथा उत्तरा का विलाप , घटोत्कच की मृत्यु पर भीम का विलाप…आदि । कहने का अर्थ यह कि इसी प्रकार महाभारत में अन्य दृश्य भी चित्रित किये गए हैं।  महाभारत में विलाप के विभिन्न दृश्य उसे व्यापक कारुणिक आधार देते हैं , किन्तु बावजूद उसके विलाप दृश्य महाकाव्य की धार्मिक-सैद्धांतिक ऊँचाइयों के नीचे दब जाते हैं। धृतराष्ट्र के विलाप पर विदुर के धर्म-मोक्ष एवं सैद्धांतिक स्थापनाओं का स्मरण करें। इस प्रकार के धर्मयुक्त कथन ‘ट्रोजन की औरतें’ में नहीं है। ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ज्यादा कारुणिक एवं मार्मिक बन गया है, क्योंकि इसमें विशुद्ध मानवीय पीड़ा-करुणा की सृष्टि की गयी है। यहाँ ‘पुरुषों के विलाप’ दृश्य नहीं हैं। अत: पुरुष और स्त्री के मध्य के द्वंद्व की सृष्टि के लिए नाटककार को पर्याप्त स्पेस मिला है। ‘ट्रोजन की औरतें’ इसीलिए एक ‘विमर्शात्मक कृति’ बन उठा है, क्योंकि यह एक स्त्री की पीड़ा के आर्त्त स्वर में पुरुष की सामंती मानसिकता, हिंस व्यवहार , व्यभिचार ….को व्यंग्यात्मक लहजे में हमारे सामने रखता है। नाटक के मध्य इस प्रकार के संवाद रखे गए हैं, जो स्त्री पीड़ा को और गहन करते हैं। नाटक में आये कोरस का कथन देखिये-“ मैं दुखियारी किसकी दाश्ता बनूँगी। मुझे कौन यहाँ से ले जाएगा? क्या मुझे ट्रॉय की सरज़मीन से दूर, किसी यूनानी के घर जाना होगा ?”  हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि कथन में स्त्री पराधीनता की पीड़ा भी है और राष्ट्र के ध्वंश का दुःख भी । हैक्युबा प्रति-प्रश्न करते हुए कहती है- “क्या ट्रॉय की मल्लिका को किसी ग़ैर के बच्चों की आया बनना पडेगा?”। हैक्युबा के टेलथीबीयस से यह पूछने पर कि- “ मेरी दुखियारी बेटी [ एन्द्रोमके ] को लैकेडेमोनियन औरत की गुलामी करनी होगी” ।  टेलथिबीयस उत्तर देता है- “ नहीं । वो बीबी की तरह , बादशाह के बिस्तर की जीनत बनेगी …हर औरत को किसी एक मर्द की गुलामी करनी होगी”।  ‘ट्रोजन की औरतें’ इस प्रकार ‘रुदन के बीच विमर्श’ पैदा करता है। संभवतः स्त्री विमर्श का आदि आख्यान। ‘स्त्री विलाप पर्व’ में विलाप है, करुणा है…पूर्व की सुखद स्मृति के बीच वर्तमान की भयावहता है …अतीत की स्मृति और वर्तमान के विनाश से रचनाकार ने करुणा को घनीभूत करने का प्रयास किया है , जो अंततः एक विसंगति को जन्म देता है ; जिसमें युधिष्ठिर का राज्य प्राप्ति छोटा लगने लगता है। इस नाटक में पीड़ा, घुटन, छटपटाहट, विडंबना की सृष्टि की गयी है। ‘महाभारत’ का विलाप दृश्य युद्ध की निरर्थकता को घनीभूत करते हैं। [ जिस संकेत पर घर्मवीर भारती ने ‘अँधा युग’ लिखा …] , किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ में युद्ध की विभीषिका…. युद्ध विजय के बाद का दर्द तो है ही , साथ ही युद्ध विजय के उन्माद के बीच लूट, हिंसा, बलात्कार, जबरदस्ती, दुश्चिंता….इत्यादि भी है। ‘स्त्री पर्व’ में घटनाएँ पूर्व में घट चुकी हैं …अब उनका प्रभाव है, उससे उत्पन्न करुणा है। यहाँ युद्ध की समाप्ति पर भी हिंस घटनाओं का घटना ज़ारी है। वहां अतीत और वर्तमान है, यहाँ वर्तमान और भविष्य। वहां अतीत की भयावहता का संक्रमण वर्तमान में हो रहा है तो यहाँ अतीत की भयावहता वर्तमान से होते हुई भविष्य तक जा रही है। वहां युद्ध के बाद का पश्चाताप है, यहाँ युद्ध के बाद का उन्माद है; जो परिस्थिति को भय, जुगुप्सा और हैवानियत से भर दे रहा है। ‘महाभारत’ की मूल संरचना में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का द्वंद्व है, किन्तु ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक में सैन्य विभीषिका-आतंकवाद है…और है अंध राष्ट्रवाद । नाटक में सभ्यता-उपनिवेश का संघर्ष भी है। यह नाटक क्रूरता, पाशविकता, अश्लीलता के मध्य युद्ध की निस्सारता भी रेखांकित करता है, किन्तु उसका मुख्य फ़ोकस/ बल युद्ध की विभीषिका से संत्रस्त स्त्रियों की पीड़ा को उकेरना है। हैक्युबा, एन्द्रोमके , कसान्द्रा और ढेरों स्त्रियों की पीड़ा को समवेत रूप में नाटककार यूरिपिडीज ने गहनतापूर्वक उकेरा है। यूनान के सैनिकों ने जिस तरह ट्रोजन को तबाह किया, स्त्रियों और बच्चों को मारा, बंधक बनाया, शोषण किया, बलात्कार किया ….यही घटनाक्रम इस नाटक के केंद्र में है। ज़ाहिर है कि सत्ता की विध्वंशकारी नीतियों के प्रतिकार में ही यह महान नाटक रचा गया है। एथेंस और  ट्रॉय के महान [ ? ] युद्ध पर प्रश्न चिह्न लगाता यह नाटक हमारे सामने …हमारी मानवता पर एक प्रश्न चिह्न अंकित करता है । ट्रोजन शहर को ध्वंश करना …या उसे आग के हवाले कर देना एक सभ्यता को नष्ट करना भी है। युद्ध तो मनुष्य के उन्माद का प्रतिरूप है ही , किन्तु शहर को ध्वस्त करना सभ्यता और मानव जाति के सृजनात्मक तत्वों को ध्वस्त करना है । स्त्री पीड़ा को केंद्र में रख नाटककार ने सम्पूर्ण मानव सभ्यता को कटघरे में खड़ा किया है। ऐसी स्थिति में महान यूनान की शौर्य/विजय गाथाएं घूमिल पड़ने लगती हैं…झूठी जान पड़ती हैं।

‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक में सीमित दृश्य हैं। इन सीमित दृश्यों में नाटककार ने संवेदना को घनीभूत किया है। अल्प दृश्य और सीमित पात्र रखने के पीछे नाटककार की मंशा संवेदना का घनीभूतिकरण करना ही हो सकता है। हैक्युबा-एन्द्रोमके संवाद हों या हैक्युबा-हेलेन संवाद सभी परिस्थिति की गहनता उकेरने में सफ़ल रहे हैं। हेलेन का चरित्र नाटक में एक नए प्रकार का विमर्श खड़ा करता है, किन्तु नाटककार ने उसे सीमित रूप में रखा है। हेलेन की सुन्दरता और उस सुन्दरता के प्रभाव की भयावहता इस युद्ध-विनाश के मूल में है… । यही कारण है कि इस नाटक की प्रतिनिधि पात्र हैक्युबा है , न कि हेलेन। हालांकि हेलेन के वचन संकेत रूप में पुरुषों के व्यभिचारी रूप का पर्दाफाश कर देते हैं। हेलेन और हैक्युबा परस्पर विरोधी ध्रुव पर खड़ी हैं, किन्तु स्त्री पराधीनता के बिंदु पर एक हैं और यही नाटककार की सफलता है ।

‘ट्रोजन की औरतें’ स्त्रियों के चीत्कार के बीच सभ्यता का विमर्श है। हैक्युबा इस चीत्कार का प्रतिनिधि है, प्रतीक है। उसके सामने बर्बर साम्राज्यवाद और राजतन्त्र बौने लगने लगते हैं। यह बौना लगने लगना  नाटककार की सफलता हो सकती है। हैक्युबा के प्रश्नों का उत्तर बर्बर साम्राज्यवाद के पास नहीं है…और क्या हमारे पास भी है?

‘महाभारत’ सम्पूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा का निचोड़ है, ऐसी स्थिति में उसका ‘स्त्री विलाप पर्व’ मार्मिक, कारुणिक होते हुए भी उसकी मूल व्यंजन से भिन्न [ सत्य/ धर्म की विजय …] नहीं हो पाता । ‘स्त्रियों के विलाप’ यहाँ युद्ध के विनाश को तो सूचित करते हैं, किन्तु वे महान लक्ष्य [ शान्ति स्थापना ] की पूर्ति में सहायक भी होते हैं। बावजूद महाकवि व्यास ने ‘स्त्री विलाप पर्व’ की रचना कर पुरुषों के मिथ्या दंभ को प्रश्नांकित कर दिया है। महाकवि अपनी रचना में ऐसे संकेत स्थल छोड़ जाता है, जो व्यापक विमर्श की आधार भूमि बनते हैं। क्लासिक कृतियाँ यही कार्य किया करती हैं।