अमृता प्रीतम की पिंजर: पुरुष पात्र रशीद के अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

औरतों के शरीर पर देश का बंटवारा हुआ

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 “[…] मैं अंदर कूद पड़ी, लेकिन … जब आप तंदूर में रोटी डालते हैं और वह पूरी तरह भरा होता है तो जो रोटियां ऊपर रह जाती हैं वो पकती नहीं है और उन्हें बाहर निकालना पड़ता है. इसी तरह कुआं पूरी तरह भर गया था और हम डूब नहीं सके […]”.[1]

यह कहना है बसंत कौर का, जिनकी आपबीती को उर्वशी बुटालिया ने अपनी बहुचर्चित किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India (1998) में डॉक्यूमेंट किया है. 1947 के विभाजन की त्रासदी के 73 वर्ष बाद भी इसके घाव उतने ही ताज़ा है, जितनी इनके बारे में चर्चा. औरतों के शरीर पर देश का बंटवारा हुआ, यह बात जाने कितनी ही बार कितने लेखकों/लेखिकाओं और आम जनों ने अलग अलग-अलग भारतीय भाषों में कही और आने वाली पीढ़ी को इस पहलु से रूबरू करवाया और उन्हीं में से एक हैं बसंत कौर. बसंत कौर कहती हैं कि उनके गाँव में जब हमला हुआ तो उनके घर की अमूमन सारी औरतों को मार दिया गया, जिसमे उनकी अपनी बेटी भी शामिल थी. उनको उनके ही परिवार के मर्दों ने इसलिए मार दिया गया ताकि वो दुश्मनों के हत्थे ना लगे. बसंत कौर खुद लगभग सौ लोगों के साथ कुँए में कूद पड़ी थीं, जिसमे औरतें बच्चे और लड़के भी थे. इतने लोगों के वजह से कुआँ भर गया था और जो ऊपर रह गए वो डूब ना सके, जिनमे एक बसंत कौर भी थी.[2] अमृता प्रीतम की पिंजर (1950) बसंत कौर जैसी ही हजारों-लाखों महिलाओं की व्यथा की दास्तान है, जब विभाजन की लकीर औरतों के लहू से सींची गयी. बसंत कौर और उनके साथ की महिलाएं जिस अनदेखे दुश्मन के डर से कुँए में कूदकर जान देने के लिए मजबूर कर दी गयीं, उसकी झलक पिंजर उपन्यास के रशीद के चरित्र में मिलता है. इस लेख में रशीद के पात्र को नैतिकता और अनैतिकता के लेंस से देखने का प्रयास किया गया है. एक औरत को अगवा कर लेने जैसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने वाला रशीद का पात्र अमृता प्रीतम ने बारीकी से रचा है इस पात्र के जटिल मनोविज्ञान से पाठकों को रूबरू करवाया है: कौन सी बात/परिस्थिति/सन्दर्भ उसे अनैतिक कृत्य को अंजाम देने की प्रेरणा देती है और कैसे उपन्यास के अंत आते आते वह पात्र नैतिकता की पगडंडी पर डगमगाते हुए ही सही, कदम रखता है.

रशीद: अनैतिक से नैतिक बनने के प्रयास की यात्रा

“सुनना जी !कभी भूल से भी लाजो का निरादर न करना !” (…) लाजो के पति का मुंह  नीचा था, लाजो के भाई का मुंह नीचा था (…)” (पिंजर: 116)[3]

बंटवारे के दौरान दंगाईयों द्वारा लाजो का अपहरण कर लिया जाता है और अमृता प्रीतम के पिंजर की केंद्रीय पात्र  पूरो अपने पति रशीद के सहयोग से अपनी भाभी लाजो को ढूंढ कर उसे अपने परिवार से मिलवाती है. पूरो उपरांकित बात अपने भाई और लाजो के भाई से कहती है, ताकि लाजो को उसके घर में वही सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है.

पिंजर की कहानी की शुरुवात बंटवारे से कई साल पहले 1935 में होती है. गाँव में साम्प्रदायिक कट्टरता के परिणामस्वरूप हिन्दू परिवार में जन्मी पूरो को उसकी शादी से पहले ही उसके गाँव का मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाला लड़का रशीद उसका अपहरण कर लेता है. पूरो जब उसके चंगुल के किसी तरह भाग कर अपने माता पिता के घर वापस जाती है तो पूरो के माँ बाप उसे अपनाने से इनकार कर देते है, उसकी माँ कहती है: “: “हम तुझे कहाँ रखेंगे ? तुझे कौन ब्याहकर ले जायेगा ? तेरा धर्म गया, तेरा जन्म गया.”( पिंजर: 23). पिंजर में सर्वव्यापी नैरेटर पात्र पुरो की इस पल की मनोस्थिति को बहुत संवेदना से लिखता है, जब पूरो का उसके अपने ही घर में तिरस्कार कर दिया गया हो और उस पर ही अपहरण का दोष मढ दिया गया हो: : “पुरो निर्दोष थी, वह कैसे समझ लेती कि उसकी माँ का दिल पत्थर हो जायेगा, उसके पिता का दिल लोहे का बन जायेगा, वे अपनी बेटी को घर से निकाल देंगे, उनके घर की दीवारें उसे अंदर लेने से इंकार कर देगी.” (पिंजर: 23). बाद के वर्षों में पूरो और रशीद का निकाह हो जाता है पर पूरो कभी अपनी स्थिति से समझौता नहीं कर पाती है और खुद को पिंजर यानी बिना हाड़-मांस का शरीर कहती है. वक़्त यूँ ही बीतता है और 1947 यानि बंटवारे की त्रासद घटना का वक़्त आता है और पूरो की भाभी लाजो को दंगाई उठा कर ले जाते हैं. पूरो अपने पति रशीद की मदद से लाजो को वापस उसके परिवार से मिलवाती है और मिलन के इसी पल में पूरो लाजो के पति यानि अपने भाई और लाजो के भाई से लाजो का आदर करने करने की बात करती है. यहाँ दोनों मर्दों के चेहरे नीचे झुके हुए हैं, इसलिए भी क्यूंकि पूरो को वापस ना अपनाकर उन्होंने सालों पहले उसका अपमान किया था. इस सन्दर्भ में मुंह नीचा होना उन दोनों के अंदर के शर्म अथवा लज्जा को बयां करता है. उनकी लज्जा शारीरिक परिलक्षित होती है. लाजो का भाई इस पल में कहता है: “पूरो हमें लज्जित न कर” (पिंजर: 116). अमृता प्रीतम की लेखनी में इन दोनों पुरुष पात्रों की लज्जा पूरो के पात्र के प्रति संवेदना, न्याय और समझ को दर्शाते है.

आगे इस लेख में पुरुष पात्र रशीद की चर्चा की गयी है, जहाँ इस उपन्यास में उसकी यात्रा को बारीकी से समझने की जरुरत है. रशीद का चरित्र अनैतिक से नैतिक बनाने के प्रयास की कहानी है. रशीद के चरित्र के अंदर एक बदलाव को दर्शाया गया है. पूरो को अगवा करने का पछतावा उसे सालता है. वह अपने अनैतिक कृत्य यानि एक औरत को बिना उसकी मर्जी के अपहरण करने और जबरन उसे अपने घर में रखने को अंजाम देता है. यहाँ से उसकी यात्रा शुरू होती है. इस लेख में रशीद के चरित्र में आये परिवर्तन का विश्लेषण किया गया है और साथ ही उन परिस्थितिओं और सवालों का भी, जो रशीद में आये बदलाव को अंजाम देते हैं. पर सबसे पहले चर्चा इस बात पर होगी कि रशीद पूरो को अपहरण करने जैसा एक अनैतिक कदम क्यूँ उठाता है?

समुदायों के बीच बदले की आग: रशीद और ‘टेलिओलॉजिकल सस्पेंशन ऑफ़ द एथिकल’ (teleological suspension of the ethical[4])

जब पूरो रशीद के पूछती है कि “तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया है?” (पिंजर: 19) तो रशीद उसे पारिवारिक दुश्मनी की कहानी सुनाता है. रशीद के दादा की लड़की को पूरो के दादा के लड़के ने अगवा कर रशीद के दादा के परिवार को बेइज्जतकिया था. सालों बाद रशीद के चाचा और ताऊ ने रशीद को उस बात का बदला लेने के लिए उकसाया और इसी उकसावे में वो पूरो को अगवा करता है. रशीद कहता है: “[…] मेरे दादा ने मेरे चाचा-ताऊओं को और मेरे पिता को कुरान उठवाकर कसमें दिलवाई थी, कि वे इसका बदला लेकर ही रहेंगे. […] अब जब तेरा काज इसी गांव में रचा जाने लगा, मेरे चाचा-ताऊओं के लहू में पुराना बदला खौलने लगा. उन्होंने मुझे कसमें दिलाईं, मेरे लहू को ललकारा और मुझसे कौल कराये कि मैं शाहों की लड़की को ब्याह से पहले किसी भी दिन उठा ले जाऊँ.” (पिंजर: 19). जब कुरान की कसमें दिलाई गयीं तब यह मसला रशीद के लिए आस्था का मसला बन गया. रशीद यहाँ तर्क नहीं करता है और उसके अनैतिक होने की यात्रा शुरू हो जाती है, जहाँ उसे अपने कृत्य के दूरगामी प्रभाव की चिंता नहीं थी. इसे ही स्योरण किर्केगार्ड (Søren Kierkegaard, 1813-1855) अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ कहते हैं. ग्रीक भाषा के दो शब्द ‘telos’, जिसका अर्थ होता है ‘अंत’ और ‘logos’, जिसका अर्थ होता है ‘तर्क’ अथवा ‘विज्ञान’, के मिलने से ‘teleology’ शब्द बनता है. अतः ‘teleological suspension of the ethical’ का मतलब हुआ किसी नैतिक कृत्य के अंत या परिणाम या प्रभाव को ख़ारिज कर देना, ठीक वैसे ही जैसे किसी अनैतिक कृत्य के अंत परिणाम या प्रभाव को भी ख़ारिज कर देना. ओल्ड टेस्टामेंट की अब्राहम और इस्सक की कहानी को केंद्र में रख कर किर्केगार्ड नैतिकता की बात करते हैं. कहानी में अब्राहम आस्था की तरफ खड़ा होता है और नैतिकता को किनारे कर देता है. किर्केगार्ड अपनी किताब के चौथे भाग में ओल्ड टेस्टामेंट के अब्राहम को फिर से रचते हैं और अब्राहम को सोचने और तर्क करने वाले पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जहाँ अब्राहम यह तर्क करता है कि ईश्वर और उसकी आस्था किसी अनैतिक कृत्य के लिए कैसे हामी भर सकता है? ठीक इसी तरह पिंजर उपन्यास के पहले भाग में रशीद का चरित्र अनैतिकता की तरफ हो लेता है जब उसे कुरान की कसमे याद दिलाई जाती है और उसे परिवार और समुदाय के इज्जत के लिए बदला लेने के लिए उकसाया जाता है. पूरो को अगवा करने के वक़्त उसके मन में नैतिक और अनैतिक का द्वन्द नहीं चलता है और ना ही वह इस बदले की भावना के दूरगामी प्रभाव के बारे में सोचता है.

उपन्यास में स्त्रियों को ‘घर की इज्जत’ बताकर नवाजने वाले समाज में रशीद की बुआ पर अत्याचार होता है और उसका बदला पूरो को अगवा कर लिया जाता है. मर्दों की इस लड़ाई में इन दोनों परिवारों की औरतों की बलि चढ़ाई जाती है. उपन्यास में रशीद द्वारा पूरो को अगवा करने की घटना 1935 में घटती है यानि 1947 के बंटवारे से पहले. अमृता प्रीतम इसके द्वारा इस बात की तरफ इशारा करती है, कि बिभाजन के दौरान हुए बृहत् पैमाने पर औरतों का जबरन अपहरण, उनके ऊपर यौन हिंसा अथवा उन्हें बीभत्स यातना का शिकार बनाना इत्यादि एक अचानक की घटना नहीं थी, इसके बीज पहले से ही सामाज में थे जहाँ औरतों के शरीर पर परिवार और समुदाय की लड़ाईयां लड़ी जाती थी. पूरो का पात्र इस अत्याचार के खिलाफ रशीद से तर्क करता है:

“तेरी बुआ को मेरे ताऊ के लड़के ने उठा लिया, पर रशीद, इसमें मेरा क्या दोष ?” […]

“यही तो मैं कहता था, पर मेरे चाचा मुझपर फिटकार बरसाते थे.”

“तो रशीद, उनके उकसाने से तूने मुझे मार डाला ?”     (पिंजर: 20)

पूरो के तर्क के सामने रशीद निरुत्तर हो जाता है. पूरो का सवाल हर उन औरतों का सवाल है जो समुदायों के झगड़े में इस तरह की हिंसा का शिकार हुई है. वो देश, काल और इतिहास से पूछ रही हैं: “इसमें मेरा क्या दोष ?”.

रशीद द्वारा इस अनैतिक कृत्य को अंजाम देने के दो कारण हैं: बहकाबे और उकसावे का शिकार होना और बदले की भावना का होना. बाईस-चौबीस साल का रशीद के पात्र के बारे में उपन्यास का सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है: “शायद उसके दिल में पुराने बदले की आग धधक उठी थी.” (पिंजर: 21). बदले का भाव एक नकारात्मक भाव है जो इंसान के अंदर की बुराई को बाहर ले आता है और यही रशीद के चरित्र को अनैतिकता की तरफ ले जाता है. किर्केगार्ड के शब्दों में कहें तो रशीद द्वारा पूरो के अपहरण में ‘teleological suspension of the ethical’ निहित है. यह करकर वह अपने परिवार और समुदाय की नज़रों में ऊपर उठना चाहता है और यह उसकी निजी इच्छा है. उसका कृत्य उसके न्याय के सामने अपराधी बनाता है और न्याय प्रणाली के लेंस से देखें तो रशीद को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. साथ ही रशीद के चरित्र में ‘सोचने’ की प्रक्रिया पूरी तरह से अनुपस्थित है. उसके अंदर की वैचारिक गरीबी और सोचने की क्षमता का ना होना ही उसे उकसावे और बदले की भावना का शिकार बनाता है. चूँकि परिवार और समुदाय की नज़रों में स्वीकृत होना और खुद को ऊँचा देखना उसकी अपनी इच्छा है, इसलिए अपने अनैतिक काम के लिए उसे खुद ही त्राण के लिए प्रयास करना पड़ेगा. आगे लेख में उसके इसी प्रयास और उसके चरित्र में आये सकारात्मक बदलाव पर चर्चा की गयी है. साथ ही इस बात की भी चर्चा की गयी है कि कौन सी बातें और परिस्थितियां उसे अनैतिक से नैतिक तक लेकर जाती है.

रशीद: नैतिकता की पगडंडी

“The ethical is the universal and as such, in turn, the divine.“

“A tragic hero can become a human being by his own strength […]“. (Søren Kierkegaard: Fear and Trembling: 96, 95)

प्रेम, शर्म और पश्चाताप, ये तीन भाव रशीद के अंदर आये सकारात्मक बदलाव के कारण हैं. रशीद का पूरो के प्रति आदर और प्रेम का भाव, उसे बार बार अपने अनैतिक कृत्य पर सोचने को मजबूर करते हैं. उपन्यास में सर्वव्यापी नैरेटर के द्वारा पाठकों को रशीद के अंतर्मन में चल रहे द्वंदों और पूरो के प्रति प्रेम का पता चलता है, जैसे कि: “रशीद को शायद सचमुच ही पूरो से प्रेम था […]“ (पिंजर: 26), “उसका मन कर रहा था, पूरो के बदन में से बहुत नहीं तो कम-से-कम आधी पीड़ा निकाल कर अपने में डाल ले.“ (पिंजर: 31).“अब रशीद का दिल बुझने लगा था. दिन-रात उतरता हुआ पूरो का चेहरा रशीद से देखा न जाता था. उसके घर में वीरानी ने अपने पैर जमा दिए थे. रशीद के चेहरे पर भी एक वेदना, एक मौन दीख पड़ने लगा था.” (पिंजर: 46). रशीद के प्रेम में पूरो के लिए करुणा और संवेदना थी और वह यह बात जितनी अधिक महसूस करता उसे अपने ऊपर उतनी ज्यादा शर्मिंदगी होती.

अगवा करने की घटना का गहरा असर पूरो के जीवन पर पड़ा था. वो रहती तो रशीद के साथ थी, पर पूरो ने  मन से रशीद को स्वीकार नहीं किया था. रशीद को पूरो का यह तिरस्कार बीमार कर देता है. तेज़ बुखार में वह बडबडाता है: “पूरो, मेरा गुनाह बख्श दे ! मेरा कसूर माफ़ कर !“(पिंजर: 46). वह अपने किये पर शर्मिंदा था और वह पश्चाताप की अग्नि में दिन रात जलता है. उसके इसी शर्म और पश्चाताप में बदलाव के बीज हैं, जो उसे नैतिकता की तरफ खड़ा करते हैं.

बंटवारे के दौरान हुए दंगे में जब पूरो की भाभी लाजो का दंगाई अगवा कर लेते हैं तब रशीद उसे पूरो की मदद से  छुड़ावाने का बीड़ा उठता है. जब रशीद लाजो को सफलतापूर्वक उसे अगवा करने वाले के घर से अपनी घोड़ी पर बिठाकर चल पड़ता है तब सर्वव्यापी नैरेटर रशीद के अंतर्मन की बात यूँ लिखता है:

“घोड़ी को पहली एड़ लगाते ही रशीद को वह समय याद आ गया, जब उसने पुरो को छत्तोआनी के कच्चे रस्ते से उठाकर अपनी घोड़ी पर डाल लिया था. रशीद आज हैरान था, उसे फिर एक बार अपनी घोड़ी दौड़ानी पड़ी. गांव की एक और लड़की फिर एक बार भगानी पड़ी. जवानी का उत्साह आज रशीद की बाँहों में नहीं था, पर रशीद सोच रहा था, पूरो को उठाने के बाद ज्यों-ज्यों वह अपनी घोड़ी दौड़ता जाता था, मनों भर का एक पत्थर जैसे उसकी आत्मा पर बैठता जाता था. कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था. आज ज्यों-ज्यों रशीद की घोड़ी रत्तोवाल की सीमाओं को दूर छोड़ती जाती थी, रशीद को लगता था कि उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है.” (पिंजर: 100).

रशीद का पहला कृत्य अनैतिक था, जब उसने अपनी घोड़ी पर लादकर पूरो को अगवा किया था और दूसरा कृत्य नैतिक था जब उसने लाजो को घोड़ी पर बिठाकर उसे दंगाइयों के चंगुल से छुड़ाया था. अपने अनैतिक कृत्य के लिए रशीद के अंदर पश्चाताप था, जो सालों तक उसके अंदर पलता रहा (“कई वर्षों से वह बोझ उसकी आत्मा पर पड़ा रहा था.”). सर्वव्यापी नैरेटर लिखता है, “उसकी आत्मा पर पड़ा वह भारी बोझ सरकता जा रहा है”, जब सालों बाद वह लाजो को छुड़ाने में कामयाब रहा और खुद को पश्चाताप के बोझ से मुक्त करने का प्रयास किया. रशीद को यह भी पता है कि चाहे वह कुछ भी कर ले, लेकिन पूरो को अगवा करने वाले अनैतिक कृत्य से कभी पार नहीं पा सकता है. सर्वव्यापी नैरेटर उसकी इस मनोस्थिति को यूँ व्यक्त करता है: “रशीद की आंखें लाजो को बचाने के बाद भी लज्जित थी. उसे पूरो को उठाकर भगा लाना याद आ रहा था, फिर भी उसे लग रहा था कि उसके सर का क़र्ज़ कुछ न कुछ कम हो रहा था.” (पिंजर: 117). जैसे स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling के चौथे भाग में अब्राहम को एक तार्किक पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं उसी तरह अगर रशीद को जब कुरान की कसमें खिलाई गयी थी और कौल पढवाए गए थे, तब अगर उसने तर्क किया होता कि, क्या खुदा एक निर्दोष लड़की को अगवा करने का अनैतिक आदेश दे सकता है ?, तो इतिहास में रशीद के किरदार को नैतिकता की पगडण्डी पर खड़ा पाते.

बंटवारे के बाद जाने कितने ही रशीद शर्म और पश्चाताप के ज्वर में अपने गुनाहों से मुक्ति की फ़रियाद लगा रहे होंगे. एक सभ्य समाज के लिए लज्जा की बात तब होगी जब गुनाह को अंजाम देने वाले अपने अनैतिक होने की चेतना से मुक्त हो समय का पहिया घूमता देख रहे होंगे. रशीद के पात्र में उसके अनैतिक होने की चेतना का होना ही बेहतर समाज की आशा है. पुरो को पिंजर बना देने वाला रशीद अपने गुनाहों से कभी मुक्त नहीं हो सकता, लेकिन मुक्ति की पगडण्डी पर चलता हुआ वह इसकी कामना जरूर कर सकता है.

 

सन्दर्भ:

  • Butalia, Urvashi: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. New Delhi: Penguin 1998.
  • Kierkegaard, Søren: Fear and Trembling. By Alastair Hannay. London: Penguin Books 1985.
  • Pritram, Amrita: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003.

[1]बसंत कौर की इस आपबीती को उर्वशी बुटालिया अपनी किताब The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India. Penguin. (1998) में डॉक्यूमेंट करती है. बसंत कौर की आपबीती के इस अंश का मूल अंग्रेजी से हिंदी में मेरा अनुवाद. पृष्ठ सं.: 200.

[2]देखें, Urvashi Butalia: The Other Side of Silence. Voices from the Partition of India.Penguin.(1998). पृष्ठ सं.: 198-200.

[3] Amrita Pritram: Pinjar, New Delhi: Hindi Pocket Books 2003. आगे सभी उद्धरण इसी अंक से लिए गए हैं.

 

[4]स्योरण किर्केगार्ड अपनी किताब Fear and Trembling में ‘teleological suspension of the ethical’ की बात करते हैं, जिसके अनुसार आस्था मानवों को यह विस्वास दिलाकर अनैतिक कृत्य की तरफ ले जा सकता है कि उस अनैतिक कृत्य के परिणामस्वरुप कुछ अच्छा ही होगा. अंत में जो अच्छा होगा वह सिर्फ ईश्वर जान सकता है, मनुष्य नहीं.