सोजर्नर ट्रूथ: साहस और विवेक की मूर्ति

विजय शर्मा

अनुवादक और आलोचक विजय शर्मा की पांचवी किताब ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ हाल में प्रकाशित हुई है . संपर्क :vijshain@gmail.com .

19 वीं  शताब्दी  में  ब्लैक  स्त्रीवादी  सोजर्नर भी  वैसे  ही  तिहरे स्तर पर  संघर्ष करती  रही  हैं , जिन स्तरों पर  आज  दलित  स्त्रीवादी  स्त्रियों  को जूझना  पड़ता  है . सोजर्नर ट्रूथ की  कहानी आलोचक  विजय  शर्मा  की  नई  पुस्तक  ‘अफ्रो-अमरीकन साहित्य : स्त्री स्वर’ से . 


अश्वेत पुरुषों के अपने अधिकार पाने का खूब शोर है, लेकिन अश्वेत स्त्री के लिए एक शब्द नहीं; और अगर अश्वेत आदमी अपने अधिकार पा गए, और अश्वेत स्त्री अपने नहीं पाती है तो आप देखेंगे कि अश्वेत आदमी औरतों के मालिक बन जाएँगे, और यह बुरा होगा। –   सोजर्नर ट्रूथ, हिस्ट्री ऑफ़ वूमन सफ़रेज

बौद्धिक अकादमीय प्रशिक्षित व्यक्ति शक्ति समूहों के फ़ायदे की बात प्रस्तुत करते हैं। इसके विपरीत सहज (ऑर्गैनिक) बौद्धिकता सामान्य ज्ञान (कॉमन सेंस) पर निर्भर करती है और उनके अपने समूह के हित का प्रतिनिधित्व करती है। सोजर्नर ट्रूथ इसी प्रकार की सहज बौद्धिकता संपन्न स्त्री थी। उसकी बौद्धिकता अपने अनुभवों से विकसित हुई थी। उसके समय के लोग उसे खारिज करना चाहते थे, उसकी बौद्धिकता को मानने का अर्थ था, सामाजिक ऑर्डर को चुनौती देना स्वीकार करना। इसलिए जब वह बोलने खड़ी हुई तो बहुत लोगों को आपत्ति थी। न केवल पुरुषों को आपत्ति थी बल्कि स्त्रियाँ, स्त्री के अधिकारों की बात करने वाली स्त्रियाँ भी नहीं चाहती थीं कि वह उनके मंच को साझा करे। नस्ल को लिंग के ऊपर प्राथमिकता से इंकार करके ट्रूथ ने एक बहुत विद्रोही विचार को जन्म दिया, उसने स्त्री को एक नई परिभाषा दी। आज की स्त्री विशेषकर अश्वेत स्त्री अस्मिता के बीज डाले।

एंटोनिओ ग्राम्सी के अनुसार प्रत्येक सामाजिक समूह बौद्धिकों का एक या एक से अधिक स्तर उत्पन्न करता है, जो समरूपता देते हैं और अपने कार्यों को जागरुकता प्रदान करते हैं, न केवल आर्थिक मामलों में वरन सामाजिक और राजनैतिक मामलों में भी। सोजर्नर ट्रूथ एक ऐसी ही बौद्धिक स्त्री थी,  जिसने न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक और राजनैतिक मामलों को नया मोड़ दिया और स्त्री-पुरुष समानता की बात की, वरन उसके लिए संघर्ष भी किया। सोजर्नर ट्रूथ का जन्म का नाम इसाबेला था। उसका जन्म कब हुआ ठीक पता नहीं, पर स्वीकारा गया है कि वह १७९७ में पैदा हुई थी। न्यू यॉर्क के अल्सटर काउन्टी में एक गुलाम परिवार में उसका जन्म हुआ था। उसके पिता का नाम जेम्स और माता का नाम एलीज़ाबेथ बोम्फ़्री था। उसका परिवार डच भाषा-भाषी था। बाद में थॉमस नामक एक गुलाम से उसका संबंध हुआ, जिसके पहले से चार या पाँच बच्चे थे। वह सदा तेरह बच्चों की बात करती थी। कदाचित बलात्कार और दूसरे लोगों के द्वारा किए गए अत्याचार को वह इस रूप में बताती थी।

सोजर्नर का सारा जीवन संघर्ष और साहस की कहानी है। १८२६ में वह गुलामी से भाग निकली। संयोग से इसके एक साल बाद न्यू यॉर्क में गुलामी प्रथा समाप्त हो गई और इस तरह १८२७ में वह पूरी तरह स्वतंत्र हो गई। गुलामी प्रथा कानूनन समाप्त हो गई थी , मगर गैरकानूनी तरीके से गुलामों की खरीद-फ़रोख्त जारी थी। सोजर्नर के बेटे पीटर को इसी तरह बेच दिया गया। वह चुप बैठने वाली नहीं थी, उसके ‘सोसाइटी ऑफ़ फ़्रेंड्स’ (क्वेकर्स) की सहायता से दावा ठोंक दिया। उस समय यह बहुत हिम्मत वाला काम था।

१८२९ में वह रहने के लिए न्यू यॉर्क चली आई। यहाँ उसने कुक, नौकरानी और धोबन का काम किया। वह मेथोडिस्ट और एपिस्कोपल ज़िओन दोनों चर्च में जाती थी। १८४३ में उसने एक और अभूतपूर्व काम किया, खुद अपना नाम बदल कर सोजर्नर ट्रूथ कर लिया। इसके साथ वह प्रवचन देने लगी। उसने दासता विरोधी आंदोलन में जोश के साथ काम करना शुरु किया। वह बोलने में कुशल थी, सीधी-सादी भाषा में अपनी बात कहती थी, उसके बातें अनुभवजन्य होतीं अत: लोगों के दिल पर असर करतीं। कुछ सालों तक वह देश में घूम-घूम कर दासता विरोधी भाषण देती रही। उसकी बात सुनने लोग बड़ी संख्या में जमा होते। वह पढ़ी-लिखी न हो कर भी असाधारण थी। वह खुद लिख नहीं सकती थी, पर उसने ऑलिव गिल्बर्ट को बोल कर १८४० में अपनी आत्मकथा ‘नरेटिव ऑफ़ सोजर्नर ट्रूथ’ लिखवाई। १८५० से उसने स्त्री अधिकारों के लिए संघर्ष को अपना मिशन बना लिया। अमेरिकी गृह युद्ध के समय उसके किए गए कार्यों से खुश हो कर राष्ट्रपति एब्राहम लिंकन ने उसे १८६४ में व्हाइट हाउस में बुला कर सम्मानित किया। युद्ध के बाद वह स्वतंत्र गुलामों को काम खोजने में सहायता देने लगी। इतना ही नहीं उसने सरकार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह पश्चिम में पहले गुलाम रहे लोगों को भूमि आवंटित करेगी।

सोजर्नर ट्रूथ ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। लेकिन उसकी ख्याति एक खास घटना के कारण है। आज से डेढ़ सौ साल पहले एक दिन इंडियाना की गुलामी विरोधी एक सभा में श्वेत स्त्री-पुरुषों के सामने सोजोर्नर ट्रूथ ने अपनी छाती खोल कर सिद्ध किया कि वह एक औरत है। जो स्त्री गुलामी से स्वतंत्रता की लंबी यात्रा कर  के आई थी उसके लिए अपनी छाती खोल कर दिखाना एक सामान्य बात थी। उसे दर्शकों से कोई भय या शर्म नहीं थी। उसे इस बात का गर्व था कि वह अश्वेत है और एक स्त्री के रूप में जन्मी है। लोगों का पूर्वाग्रह बहुत प्रबल होता है। उस समय अमेरिका में अधिकाँश श्वेत लोगों के मन में अश्वेत स्त्री के प्रति घृणा और अनादर का भाव था। उनकी निगाह में अश्वेत स्त्री मात्र पशु थी, केवल एक जिंस थी। जब वह बोलने खड़ी हुई तो कुछ श्वेत पुरुष चाहते थे कि उसे अलग ले जा कर पहले जाँच लिया जाए कि वह एक स्त्री है। सोजर्नर ट्रूथ ने कहा कि उसने उनके बच्चों को अपनी इसी छाती का दूध पिलाया है और वे जानना चाहते हैं क्या वह एक स्त्री है? छाती खोल कर दिखाने के बावजूद श्वेत पुरुष चीख-चिल्ला रहे थे। वे चीख-चीख कर कह रहे थे कि उन्हें विश्वास नहीं है कि वह वास्तव में एक औरत है।

श्वेत पुरुष ही नहीं श्वेत स्त्रियाँ भी अश्वेत स्त्री के प्रति मन में कोई अच्छा भाव नहीं रखती थीं। इसे वे बिना किसी शर्म और झिझक के कहती थीं। जब ओहाओ के एक्रोन नामक स्थान में १८५२ में स्त्री अधिकारों के आंदोलन के द्वितीय सालाना जलसे में बोलने के लिए सोजर्नर ट्रूथ खड़ी हुई तो श्वेत स्त्रियों को यह अपना अपमान लगा। वे एक अश्वेत स्त्री को सुनना नहीं चाहती थीं और वे बार-बार चिल्लाने लगीं, ‘उसे मत बोलने दो! उसे मत बोलने दो!’ ट्रूथ ने उनके विरोध की परवाह नहीं की और अपनी बात कहती गई। वह पहली नारीवादी है जिसने लोगों का ध्यान अश्वेत स्त्री की ओर खींचा और बताया कि परिस्थितियों से मजबूर हो कर अश्वेत स्त्री ने बहुत सहा है और वह अश्वेत पुरुष के जितनी मेहनत करती है और स्त्री को पुरुष के बराबर का अधिकार मिलना चाहिए।

यह संयोग था कि सोजर्नर के बोलने से ठीक पहले जो वक्ता मंच पर था। उसने दावा किया था कि स्त्री शारीरिक रूप से आदमी से कमजोर होती है, अत: वह उससे हीन है और उसे बराबरी का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उसे सदैव पुरुष की सहायता की जरूरत पड़ती है। बग्घी में चढ़ना-उतरना हो अथवा चहबच्चा पार करना हो, उसे पुरुष की सहायता चाहिए होती है। ट्रूथ ने उसकी बातों का मुँहतोड़ जवाब देते हुए जो कहा वह आज इतिहास में दर्ज है।

ट्रूथ ने कहा कि वह आदमी ने कह रहा कि औरतों को बग्घी में चढ़ने-उतरने में सहायता चाहिए होती है, गड्ढ़ों-चहबच्चों को पार करवाना होता है। मुझे किसी ने बग्घी में चढ़ने में हाथ बढ़ा कर सहायता नहीं दी, किसी ने हाथ पकड़ कर गड्ढ़े-चहबच्चे पार नहीं करवाए। मुझे किसी ने सम्मानजनक स्थान पर नहीं बिठाया। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मेरी ओर देखो! मेरी बाहों को देखो!… मैंने हल चलाया है, खेती की है, फ़सल इकट्ठा करके खलिहान में पहुँचाई है। कोई पुरुष मुझसे अधिक काम नहीं कर सकता है और क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मौका मिलने पर मैं आदमी के बराबर काम कर सकती हूँ, उतने ही कोड़े खा सकती हूँ। क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? मैंने पाँच बच्चे पैदा किए और अपनी आँखों के सामने उन्हें गुलाम के रूप में बिकते देखा और जब माँ के दु:ख से रोती हूँ तो केवल जीसेस सुनता है – क्या मैं एक औरत नहीं हूँ? अंत में जो बात ट्रूथ ने कही वह बात सोचना और उसे कहना उसकी बुद्धि और साहस का परिचायक है। उसने कहा कि जब जीसेस पैदा हुए तो स्त्री और ईश्वर था, उसमें आदमी कहाँ था? उसने कहा यदि ईश्वर की बनाई प्रथम स्त्री इतनी मजबूत थी कि उसने अकेले दुनिया ऊपर से नीचे कर दी, उल्टी कर दी तो आज ये सारी औरतें मिल कर उसे वापस सीधा कर सकती हैं।


सोजर्नर ट्रूथ शारीरिक बनावट में एक मजबूत स्त्री थी, उसकी कद-काठी खासी थी। वह पाँच फ़ुट ग्यारह इंच लम्बी थी। जो लोग स्त्री को नाजुक और कमजोर मानते थे उनके सामने एक प्रत्यक्ष विपरीत तस्वीर के रूप में वह उपस्थित थी। जो लोग सोचते थे कि स्त्री अपने निर्णय लेने में समर्थ नहीं है उनके लिए ट्रूथ एक मजबूत स्तम्भ के रूप में खड़ी थी। उसने अपने काम, कोड़ों की मार का हवाला दे कर तथा अपने बच्चों और उनके गुलाम के रूप में बिकने की बात कह कर लोगों को स्त्री की सहनशक्ति पर सोचने के लिए मजबूर किया। उसने नई अश्वेत स्त्री को मूर्तिमान किया। अगले दिन ओहिओ के अखबार एंटी-स्लेवरी बिगुल ने इसकी रिपोर्टिंग की। सोजर्नर ट्रूथ के बोलने का उसके दर्शकों पर जो प्रभाव पड़ा उसके बारे में लिखा।

नारी अधिकारों की बात करने वाली कोई श्वेत स्त्री ऐसे निजी अनुभव नहीं रखती थी। किसी के पास ऐसी खरी बातें कहने का न तो मुँह था और न ही साहस। अमेरिकन इतिहासकारों ने नस्ल और लिंग को ऐसे प्रस्तुत किया हुआ था कि काफ़ी समय तक अमेरिकन अश्वेत स्त्री के प्रयासों और योगदान को स्त्री अधिकारों के आंदोलन में शामिल नहीं किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। उनके योगदान को अनदेखा करके नारी अधिकारों की बात नहीं की जा सकती है। इस स्थिति के लिए सोजोर्नर ट्रूथ जैसी अश्वेत स्त्रियाँ जिम्मेदार हैं। स्त्री अधिकारों के आंदोलन में इनके शामिल होने की बात सबसे पहले एलीनॉर फ़्लेक्सनर की १९५९ में आई किताब में दिखाई देती है। ट्रूथ अपने अनुभवों के आधार पर बोलती थी। उन्होंने शारीरिक अपमान, शोषण, क्रूरता, बलात्कार सहा था।  वे न केवल बची रहीं वरन विजयी हो कर निकली तथा दूसरों की मुक्ति में सहायक बनीं। वह एक माँ, एक गुलाम के रूप में मिले अपने अनुभव साझा करती थीं। सामाजिक विरोध की परवाह न करते हुए उनके बोलने से अन्य कई स्त्रियों को बोलने का साहस, प्रेरणा और उत्साह मिला।

जब आंदोलन चल रहा था तो उसमें अश्वेत पुरुष आगे-आगे थे। अश्वेत पुरुष खुद लीडर बने हुए थे और  अपनी स्त्रियों को पीछे ढ़केला हुआ था। उन्हें सेक्रेटरी, चाय-पानी बनाने-देने का काम सौंप रखा था। जन-सभाओं, रैलियों, लंच-डिनर के समय ये पुरुष बड़ी-बड़ी बातें करते लेकिन पुरुष वर्चस्व को पूरी तरह कायम रखते। कभी खुल कर स्त्री के प्रति भेदभाव के विषय में नहीं बोलते। उनके यहाँ पितृसत्तात्मकता का पूरा बोलबाला था। सोजोर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों ने इस सिस्टम को चुनौती दी। कहने को १९ वीं सदी में स्त्री कार्यकर्ता श्वेत-अश्वेत स्त्रियों की एकता की बात करतीं, आंदोलन में सोजर्नर ट्रूथ जैसी स्त्रियों की उपस्थिति को रेखांकित करतीं, दिखाती कि वे नस्लवाद के खिलाफ़ हैं। लेकिन जब भी ट्रूथ बोलने खड़ी होती वे उसका विरोध करतीं। जब जनरल फ़ेडरेशन ऑफ़ वीमेन्स क्लब के सामने रंग का प्रश्न उठा तो जॉर्जिया वीमेन्स प्रेस क्लब की सदस्यों का कहना था यदि अश्वेत लोगों को सदस्य बनाया गया तो वे फ़ेडरेशन से हट जाएँगी।

ट्रूथ के विषय में हमें दूसरों के द्वारा लिखे से ज्ञात होता है। उसके प्रसिद्ध भाषण “अयंट आई अ वूमन” को उस घटना के बाद एक फ़ेमिनिस्ट एबोलिसनिस्ट ने रिपोर्ट के रूप में लिखा था। असल में उसने क्या कहा था आज हमें मालूम नहीं। इसके बावजूद यह तय है कि उसने स्त्री की नई परिभाषा गढ़ी। भले ही वह अनपढ़ थी पर उसने जो तर्क दिए वे किसी बौद्धिक तर्क से कम नहीं थे। वह अपने समय से आगे की स्त्री थी। उसने अश्वेत पुरुष की चालाकी को पकड़ लिया था। वह वोट देने के बराबरी के अधिकार की हिमायत कर रही थी। वह श्वेत-अश्वेत, स्त्री-पुरुष सबको आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक बराबरी देने की बात कर रही थी। वह शोषण के खिलाफ़ आवाज बुलंद कर रही थी।

बाद में सोजर्नर ट्रूथ की बात बता कर अन्य आंदोलनकारी खुद प्रेरणा पाते और दूसरे लोगों को आंदोलन में भागीदारी करने के लिए तैयार करते। करीब सौ साल बाद जब माया एंजेलो लोगों को उसकी बात बताती तो लोग मंत्रमुग्ध हो कर सुनते। १८८३ में गुजरने वाली इस अश्वेत स्त्री पर अश्वेत स्त्रियों को गर्व है। ऐसी साहसी और निर्भीक स्त्री पर न केवल अश्वेत स्त्री बल्कि समस्त स्त्री जाति को इतना ही नहीं समूची मानवता को गर्व होना चाहिए।

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