आपातकाल के दौरान उनका तबादला ओडिशा कर दिया गया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और जयप्रकाश नारायण के साथ काम करने लगे। यह उनके संघर्ष का दौर था। इसी समय उन्होंने पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की और उसके लिए मगध विश्वविद्यालय से स्वीकृति प्राप्त की। उनके संस्थान के पहले बैच के छात्र राजेश शुक्ला थे। रामवचन राय ने कहा कि राजेश शुक्ला ने इस पुस्तक का प्रकाशन कर गुरु-ऋण और पितृ-ऋण, दोनों से उऋण होने का प्रयास किया है।
वे बचपन में अपनी ही माँ के उस अनपेक्षित गुस्से और ज़हनी तौर पर बिठाए गए तानाशाही पहरे से किस क़दर ख़ौफ़ खाती थीं। यह रिश्ता महज़ ममता का कोई मखमली झूला नहीं था, बल्कि कलेजे को कुतर देने वाला, नियंत्रण, डर और अपने वजूद को जिंदा रखने की एक बेहद कड़वी जद्दोजहद का मैदान बन गया था। इसी दमघोंटू माहौल और माँ के उस सख़्त, निष्ठुर ढर्रे से तंग आकर आखि़रकार उन्होंने महज़ 18 बरस की उम्र में उस घर की दहलीज को हमेशा के लिए लांघ दिया।