चंद्रकांत देवताले की याद में उनकी कविताएं : बाई दरद ले ले और अन्य

साठोत्तरी हिन्दी हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर चंद्रकांत देवताले नहीं रहे. उन्हें आदरांजलि देते हुए उनकी कुछ स्त्रीवादी कविताएं: 

माँ पर नहीं लिख सकता कविता 

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा

घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

मैं अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ 

वहाँ जैसे सभी कुछ आइने के भीतर बसा था
मै वहीं से अभी-अभी माँ के पास से आया हूँ
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे
और वह वैसी परेशान-खटकरम में जुटी हुई नहीं थी
जैसी हम लोगों को बड़ा करते
इस दुनिया के उस चार कमरों वाले घर में ताज़िन्दगी रही

उसने मुझसे कुछ भी जानने की कोशिश नहीं की
जैसे उसे पता था सब कुछ
उसने मुझे उन निगाहों से भी देखा
जो सारे अपराधों को मुआफ़ी देती है

एक बार मर चुकने के बाद वह अमर हो गई थी
मैं उसके लिए सिर्फ़ एक भुक्ति हुई गूँज था
जो कभी उसके अतीत की धड़कन थी
उस थोड़े से बेआवाज़ वक़्त में
पत्थर का एक घोड़ा और दो कुत्ते ज़रूर दिखे
कुत्तों के प्रति अपने प्रेम के कारण
हाथ फेरा एक के माथे पर
तो उसका उतना हिस्सा रेत की तरह बिखर गया

चाहते हुए भी माँ को नहीं छुआ मैंने
पता नहीं किन-किन दुखों-स्मृतियों से भरी थी उसकी देह
मैंने चाहा किसी भी तरह मै देख पाऊँ
उन स्तनों को चूसते हुए अपने होंठ
कैसे युद्ध, मंदी और फाका-मस्ती के उन दिनों में
चिपटे हुए उसके पेड़ का पक्षी बन जाता था मैं

मैं उसे नहीं बता पाया
की कसाईख़ाने में काम करते शाकाहारी की तरह
मै ज़िन्दा हूँ इस दुनिया में
और शामिल हूँ उन्ही में जो
अपनी करुणा की तबाही और
अपने साहस की हत्या के लिए
दूसरों को अपराधी समझ रहे हैं

मै अभी-अभी माँ से मिलकर आया हूँ
और पुरखों की प्यास को चाट रहा हूँ
माँ से अपने ढंग की इस अकेली-अधूरी मुलाक़ात के बारे में

कोई सबूत देना संभव नहीं
यह न तो सपने में हुई
और न इसके लिए मुझे मृतकों में शामिल होना पड़ा ।

बाई दरद ले ले 

तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्थर तोड़ने वाले दिन उस सबके बाद
इस वक़्त तेरे बदन में धरती की हलचल है
घास की ज़मीन पर लेटी
तू एक भरी पूरी औरत आंखों को मींच कर
काया को चट्टान क्यों बना रही है

बाई तुझे दरद लेना हैं
जिन्दगी भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए दरद लेना

जल्दी कर होश में आ वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए या ना भी रोए
फटी आंख से मत देख
भूल जा जोर जबरदस्ती की रात
अँधेरे के हमले को भूल जा बाई

याद कर खेत और पानी का रिश्ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस किस हिस्से में कहॉ कहॉ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्थर हो जाता कोख तक का पानी

याद मत कर अपने दुखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता
इतने हैं आंसुओं के सूखे धब्बे

सीता ने कहा था – फट जा धरती
ना जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया
बाई दरद ले!
सुन बहते पानी की आवाज़
हाँ ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियां
सुन ले उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
जिंदा हो जायेगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध दो नन्हें होंठों के लिए

बाई! दरद ले

बेटी के घर लौटना।

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारीश आँखो से टकराती नमी
भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का

सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर लौटना।

दो लड़कियों का पिता होने से 

पपीते के पेड़ की तरह मेरी पत्नी

मैं पिता हूँ

दो चिड़ियाओं का जो चोंच में धान के कनके दबाए

पपीते की गोद में बैठी हैं

सिर्फ़ बेटियों का पिता होने से भर से ही

कितनी हया भर जाती है

शब्दों में

मेरे देश में होता तो है ऐसा

कि फिर धरती को बाँचती हैं

पिता की कवि-आंखें…….

बेटियों को गुड़ियों की तरह गोद में खिलाते हैं हाथ

बेटियों का भविष्य सोच बादलों से भर जाता है

कवि का हृदय

एक सुबह पहाड़-सी दिखती हैं बेटियाँ

कलेजा कवि का चट्टान-सा होकर भी थर्राता है

पत्तियों की तरह

और अचानक डर जाता है कवि चिड़ियाओं से

चाहते हुए उन्हें इतना

करते हुए बेहद प्यार।

वह औरत 

वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,

पछीट रही है शताब्दिशें से
धूप के तार पर सुखा रही है,
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूंध रही है?
गूंध रही है मानों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है,

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक़्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है,

एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है,
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है,

एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसर जागती
शताब्दियों से सोयी है,

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं

घर में अकेली औरत के लिए 

तुम्हें भूल जाना होगा समुद्र की मित्रता
और जाड़े के दिनों को
जिन्हें छल्ले की तरह अंगुली में पहनकर
तुमने हवा और आकाश में उछाला था
पंखों में बसन्त को बांधकर
उड़ने वाली चिडिया को पहचानने से
मुकर जाना ही अच्छा होगा……

तुम्हारा पति अभी बाहर है तुम नहाओ जी भर कर
आइने के सामने कपड़े उतारो
आइने के सामने पहनो
फिर आइने को देखो इतना कि वह तड़कने को हो जाए
पर तड़कने के पहले अपनी परछाई हटा लो
घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है
क्योंकि वह हमेशा के लिए नहीं
सिर्फ़ शाम तक के लिए बाहर है
फिर याद करते हुए सो जाओ या चाहो तो अपनी पेटी को
उलट दो बीचोंबीच फ़र्श पर
फिर एक-एक चीज़ को देखते हुए सोचो
और उन्हें जमाओ अपनी-अपनी जगह पर

अब वह आएगा
तुम्हें कुछ बना लेना चाहिए
खाने के लिए और ठीक से
हो जाना होगा सुथरे घर की तरह
तुम्हारा पति
एक पालतू आदमी है या नहीं
यह बात बेमानी है
पर वह शक्की हो सकता है
इसलिए उसकी प्रतीक्षा करो
पर छज्जे पर खड़े होकर नहीं
कमरे के भीतर वक्त का ठीक हिसाब रखते हुए
उसके आने के पहले
प्याज मत काटो
प्याज काटने से शक की सुरसुराहट हो सकती है
बिस्तर पर अच्छी किताबें पटक दो
जिन्हें पढ़ना कतई आवश्यक नहीं होगा
पर यह विचार पैदा करना अच्छा है
कि अकेले में तुम इन्हें पढ़ती हो…….

बालम  ककड़ी बेचने वाली लडकियां

कोई लय नहीं थिरकती उनके होंठों पर

नहीं चमकती आंखों में

ज़रा-सी भी कोई चीज़

गठरी-सी बनी बैठी हैं सटकर

लड़कियाँ सात सयानी और कच्ची उमर की

फैलाकर चीथड़े पर

अपने-अपने आगे सैलाना वाली मशहूर

बालम ककड़ियों की ढीग

सैलाना की बालम ककड़ियाँ केसरिया और खट्टी-मीठी नरम

– जैसा कुछ नहीं कहती

फ़क़त भयभीत चिड़ियों-सी देखती रहती हैं

वे लड़कियाँ सात

बड़ी फ़जर से आकर बैठ गई हैं पत्थर के घोड़े के पास

बैठी होंगी डाट की पुलिया के पीछे

चौमुखी पुल के पास

होंगी अभी भी सड़क नापती बाजना वाली

चाँदी के कड़े ज़रूर कीचड़ में सने

पाँवों में पुश्तैनी चमक वाले

होंगी और भी दूर-दूर

समुद्र के किनारे पहाड़ों पर

बस्तर के शाल-वनों की छाया में

माँडू-धार की सड़क पर

झाबुआ की झोपड़ियों से निकलती हुई

पीले फूल के ख़यालों के साथ

होंगी अंधेरे के कई-कई मोड़ पर इस वक्त

मेरे देश की

कितनी ही आदिवासी बेटियाँ

शहर-क़स्बों के घरों में

पसरी है अभी तक

अन्तिम पहर के बाद की नींद

बस शुरू होने को है थोड़ी ही देर में

कप-बसी की आवाज़ों के साथ दिन

लोटा भर चाय पीकर आवेंगे धोती खोंसते

अंगोछा फटकारते

खरीदने ककड़ी

उम्रदराज़ सेठ-साहूकार

बनिया-बक्काल

आंखों से तोलते-भाँपते ककड़ियाँ

बंडी की जेबों से खनकाते रेजगी

ककड़ियों को नहीं पर लड़कियों को मुग्ध कर देगी

रेजगी की खनक आवाज़

कवि लोग अख़बार ही पढ़ते लेटे होंगे

अभी भी कुढ़ते ख़बरों पर

दुनिया पर हँसते चिलम भर रहे होंगे सन्त

शुरू हो गया होगा मस्तिष्क में हाकिमों के

दिन भर की बैठकों-मुलाक़ातों

और शाम के क्लब-डिनर का हिसाब

सनसनीख़ेज ख़बरों की दाढ़ी बनाने का कमाल

सोच विहँस रहे होंगे मुग्ध पत्रकार

धोती पकड़ फहराती कार पर चढ़ने से पहले

किधर देखते होंगे मंत्री

सर्किट हाउस के बाद दो बत्ती फिर घोड़ा

पर नहीं मुसकाकर पढ़ने लगता है मंत्री काग़ज़

काग़ज़ के बीचोंबीच गढ़ने लगता है अपना कोई फ़ोटू चिंन्तातुर

नहीं दिखती उसे कभी नहीं दिखतीं

बिजली के तार पर बैठी हुई चिड़ियाएँ सात

मैं सवारी के इन्तज़ार में खड़ा हूं

और

ये ग्राहक के इन्तज़ार में बैठी हैं

सोचता हूँ

बैठी रह सकेंगी क्या ये अंतिम ककड़ी बिकने तक भी

ये भेड़ो-सी खदेड़ी जाएंगी

थोड़ा-सा दिन चलने के बाद फोकट में ले जाएगा ककड़ी

संतरी

एक से एक नहीं सातों से एक-एक कुल सात

फिर पहुँचा देगा कहीं-कहीं कुल पाँच

बीवी खाएगी थानेदार की

हँसते हुए

छोटे थानेदार ख़ुद काटेंगे

फोकट की ककड़ी

कितना रौब गाँठेंगी

घर-भर में

आस-पड़ोस तक महकेगा सैलाना की ककड़ी का स्वाद

याद नहीं आएंगी किसी को

लड़कियाँ सात

कित्ते अंधेरे उठी होंगी

चली होंगे कित्ते कोस

ये ही ककड़ियाँ पहुँचती होंगी संभाग से भी आगे

रजधानी तक भूपाल

पीठवाले हिस्से के चमकते काँच से

कभी-कभी देख सकते हैं

इन ककड़ियों का भाग्य

जो कारों की मुसाफ़िर बन पहुँच जाती हैं कहाँ-कहाँ

राजभवन में भी पहुँची होंगी कभी न कभी

जगा होगा इनका भाग

सातों लड़कियाँ ये

सात सिर्फ़ यहाँ अभी इत्ती सुबह

दोपहर तक भिंडी, तोरू के ढीग के साथ हो जाएगी इनकी

लम्बी क़तार

कहीं गोल झुंड

ये सपने की तरह देखती रहेंगी

सब कुछ बीच-बीच में

ओढ़नी को कसती हँसती आपस में

गिनती रहेंगी खुदरा

सोचतीं मिट्टी का तेल गुड़

इनकी ज़ुबान पर नहीं आएगा कभी

शक्कर का नाम

बीस पैसे में पूरी ढीग भिंडी की

दस पैसे में तोरू की

हज़ारपती-लखपती करेंगे इनसे मोल-तोल

ककड़ी तीस से पचास पैसे के बीच ऐंठकर

ख़ुश-ख़ुश जाएंगे घर

जैसे जीता जहान

साँझ के झुटपुटे के पहले लौट चलेंगे इनके पाँव

उसी रास्ते

इतनी स्वतंत्रता में यहाँ शेष नहीं रहेगा

दुख की परछाई का झीना निशान

गंध डोचरा-ककड़ी की

देह के साथ

लय किसी गीत की के टुकड़े की होंठों पर

पहुँच मकई के आटे को गूँधेंगे इनके हाथ

आग के हिस्से जलेंगे

यहाँ-वहाँ कुछ-कुछ दूरी पर

अंधेरा फटेगा उतनी आग भर

फिर सन्नाटा गूँजेगा थोड़ी देर बाद

फिर जंगलों के झोपड़ी-भर अंधेरे में

धरती का इतना जीवन सो जाएगा गठरी बनकर

बाहर रोते रहेंगे सियार

मैं भी लौट आऊँगा देर रात तक

सोते वक्त भी

क्या काँटों की तरह मुझमें चुभती रहेंगी

अभी इत्ती सुबह की

ये लड़कियाँ सात

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