मेट्रो-किराया-माफ़: मोवलिटी और सुरक्षा की ओर एक कदम

पेशे से इंजीनियर कनुप्रिया इंजीनियरिंग पढ़ाने और कुछ सालों तक यूनाइटेड नेशन के लिए काम करने के बाद आजकल सोशल सेक्टर से जुड़ी हैं. संपर्क: [email protected]

कनुप्रिया

दिल्ली में DTC बस और मेट्रो की सुविधा स्त्रियों के लिये नि: शुल्क कर देने के बाबत एक स्कीम दिल्ली सरकार लाने की सोच रही है, ऐसा दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा. इस प्रपोजल पर काम करने के लिये सरकारी अफसरों को एक हफ्ते का समय दिया गया है, दिल्ली सरकार का कहना है कि हालाँकि दिल्ली ट्रांसपोर्ट में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की बराबर की भागीदारी है, मगर यदि ये प्रपोज़ल लागू होता है तो इस स्कीम के कारण होने वाले अतिरिक्त आर्थिक भार को दिल्ली सरकार वहन करेगी. 

भाजपा समर्थक धड़ा इस मामले को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सीधे-सीधे वोट की राजनीति कहकर ख़ारिज कर रहा है, वहीं अन्य पार्टी समर्थक जो केजरीवाल की राजनीति के समर्थक नहीं है इस पर चुप हैं या हास्य व्यंग्य में मामले को रफ़ा-दफ़ा कर रहे हैं. चूँकि ये क़दम एक राजनीतिक पार्टी द्वारा उठाया गया है इसलिये इसपर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आनी स्वाभाविक हैं, मगर राजनीतिक नज़रिए से अलग इस मुद्दे को सामाजिक नज़रिए से देखने की भी ज़रूरत है.

महानगरों की बात की जाए तो दिल्ली राजधानी होने के बावजूद स्त्रियों के लिये विशेष रूप से असुरक्षित शहर माना जाता है, निर्भया बलात्कार के बाद इसे रेप कैपिटल कहा जाने लगा, पूर्व सरकारें भी लॉ एंड आर्डर दिल्ली सरकार के अधीन न होने के कारण स्त्रियों की असुरक्षा पर अपनी असमर्थता बयान कर चुकी हैं वहीं ख़ुद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पुलिस  नियंत्रण को लेकर समय-समय पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज़ कर चुके हैं, ख़ुद उनकी सुरक्षा में चुनाव के दौरान चूक देखी गई.

सुरक्षा के लिये पुलिस और निजी सुरक्षा एजेंसियों पर निर्भरता से भी पहले और उनके अतिरिक्त भी एक किस्म की सुरक्षा होती है जो ख़ुद समाज प्रदान करता है. मुहल्लों में दोपहर को धूप खाते बुज़ुर्ग, स्वेटर बुनती या बातें करती स्त्रियाँ जिस तरह की सुरक्षा मुहल्ले के बच्चों को दे दिया करते थे वो सोसायटी के अच्छी सैलरी वाले सिक्योरिटी गार्ड भी नही दे सकते. जो सुविधा और सुरक्षा समाज की पारस्परिकता से आती है वो पैसे देकर ख़रीदे हुए बंदोबस्त से नहीं. कमोबेश यही बात ट्रांसपोर्ट के मामले में भी लागू होती है. पुलिस की गश्त लगाती वैन्स की अपनी सीमाएँ हैं मगर स्त्रियों की उपस्थिति यदि पब्लिक यातायात में बढ़ती है किसी भी समय तो वो ख़ुद एक सुरक्षा का अप्रत्यक्ष वातावरण रचती हैं.

स्त्रियों के लिये असुरक्षा कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं, अपितु उनके पूरे जीवन को बुरी तरह नष्ट करने की क्षमता रखने वाली समस्या है. छोटी- छोटी लड़कियों का दिल मचलता है बाहर मैदानों में हैंड बॉल खेलने का मगर वो खेल नही सकतीं, असमय बाज़ार नही निकल नही सकतीं, यहाँ तक कि ग़रीब मुहल्लों में अड्डा जमाए लड़के ये नौबत तक ला सकते हैं कि काम पर जाने वाले माँ -बाप बेटियों का स्कूल जाना बंद कर दें. स्कूल के मास्टर, कर्मचारी भी भरोसे लायक़ नहीं. ऐसे में लड़कियों की सुरक्षा से परेशान अभिभावक किसी दुर्घटना की आशंका में बेटी का कैसे भी ब्याह करने का सोचते हैं, ब्याह होगा तो एक ही होगा वो चाहे जैसे भी व्यवहार करे, बलात्कार भी हो तो उसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है. यूँ एक लड़की के सुरक्षा कारणों से सपने छोड़िये छोटी-छोटी इच्छाएँ तक नष्ट हो जाती हैं, कभी वो जीवन और प्रेम की कामना में भागी हुई लड़कियों तक मे शामिल हो जाती हैं फिर भी राहत नही मिलती और पीछे छूटी परिवार की लड़की पर सुरक्षा नज़र कड़ी हो जाती है. रक्षा बंधन भी ऐसी सुरक्षा के मद्देनज़र किया गया समाज का उपाय ही है जिसमें भक्षक प्रजाति से ही रक्षा की कामना है, ये स्त्री को समाज मे अपने तईं सुरक्षित होने का बोध नही कराता, एक बहन के लिये एक भाई सदा चाहिए.

इस तरह स्त्री सुरक्षा समाज के कई स्तरों और जीवन की कई परतों में फैला एक जटिल मामला है, एक सुरक्षित समाज बनाने के लिये समाज मे न जाने कितने बदलावों और उपायों की ज़रूरत है. स्त्रियों की दुकानों, दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों, सड़को, सिनेमाघरों, रेस्टोरेंट में बढ़ी हुई उपस्थिति एक ऐसा ही उपाय है जो असुरक्षा की भावना को कम कर सकता है. 

हाल के वर्षों में निजी ट्रांसपोर्ट कंपनियों जैसे ओला और ऊबर द्वारा स्त्रियों के लिये सुरक्षित सफ़र के बंदोबस्त ने स्त्रियों को बड़ी राहत दी है, मगर ये व्यवस्थाएँ एक वर्ग तक सीमित हैं, हर कोई इन व्यवस्थाओं का शुल्क नही चुका सकता. तब ग़रीब महिलाओं के लिये क्या रास्ता बचता है सिवा इसके कि वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ही इस्तेमाल करें. 

यह व्यवस्था नि: शुल्क होने से ग़रीब महिलाओं और लड़कियों द्वारा अधिक संख्या में इन साधनों के उपयोग की सम्भावना बढ़ती है. ट्रांसपोर्ट शुल्क से महीने के बजट पर बढ़ने वाले स्थाई भार के कारण स्त्रियों द्वारा जहाँ नौकरी और शिक्षा के कई विकल्पों पर विचार तक ख़ारिज हो जाया करता है वहाँ उन विकल्पों के चुने जाने के अवसर बढ़ेंगे. न सिर्फ़ ज़रूरी कामों के लिये बल्कि सैर सपाटे, मनोरंजन, शॉपिंग आदि के लिये भी ऐसी व्यवस्था से प्रोत्साहन ही होगा. स्त्रियों के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सुरक्षा के मद्देनजर ये व्यवस्था किस तरह बदलाव को अंजाम दे सकती है  फ़िलहाल उसकी कल्पना ही की जा सकती है. 

सोशल मीडिया में इस क़दम पर बहस चल रही है, वहाँ ज़ाहिर कुछ आपत्तियों में एक आपत्ति ये भी है कि जो महिलाएँ टिकट का पैसा दे सकती हैं उन्हें ये सब्सिडी क्यो? इस बारे में दिल्ली सरकार का कहना है कि ये सब्सिडी आरोपित नही है, मतलब जो महिलाएँ शुल्क  चुका सकती हैं वो ये सब्सिडी छोड़ सकती हैं. 

जहाँ तक इस व्यवस्था में सरकार को होने वाली दिक्कतों की बात है दिल्ली ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट का कहना है कि DTC में ऐसी व्यवस्था होने में तो कोई दिक़्क़त नही होगी मगर मेट्रो के मामले में ये निर्णय निश्चयी चुनौतीपूर्ण होगा.

जो भी है, जब हम पिछले सालों में सरकारों द्वारा नोटबन्दी जैसे अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती क़दम उठाते हुए देख चुके हैं तो जनहित में किये जाने वाले ऐसे प्रयोगों के लिये स्पेस भी होना चाहिये. आख़िर हम सरकारें चुनते किसलिये हैं, मन्दिर मस्ज़िद, श्मशान क़ब्रिस्तान बनाने के लिये? 

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