भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

साधना अग्रवाल, आलोचक, प्राध्यापिका: कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय: agrawalsadhna2000@gmail.com

साधना अग्रवाल

20वीं शताब्दी के अंतिम दशक से मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहानियों से अपने लेखन की शुरूआत की। उनकी आरंभिक कहानियां— कठपुतलियां, स्वांग और बिगड़ैल बच्चे थीं। बहुत जल्द मनीषा कुलश्रेष्ठ को इन कहानियों से एक खास पहचान मिली। कहना चाहिए अपनी पीढ़ी की लेखिकाओं में सृजनात्मक दृष्टि से वे सबसे ज्यादा संभावनाशील हैं। बाद में वह उपन्यास की ओर प्रवृत्त हुईं। उनके उपन्यास— शिगाफ, पंचकन्या, स्वप्नपाश और किरदार छपकर चर्चित हुए।

एक बातचीत के क्रम में मुझे किसी ने बताया था कि हंस संपादक राजेन्द्र यादव की अतिरिक्त रुचि लेखकों के प्रेम—प्रसंग में थी। चूंकि प्रतिभा अग्रवाल का संबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र के परिवार से था इसलिए राजेन्द्र जी ने प्रतिभा जी को उकसाया कि तुम भारतेंदु हरिश्चंद्र पर लिखो ही नहीं बल्कि उनके प्रेम—प्रसंग को भी उजागर करो। स्पष्टत: उनका संकेत भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका की ओर था। लेकिन राजेन्द्र जी निराश हुए जब प्रतिभा अग्रवाल की पुस्तक —’ प्यारे हरिश्चंद्र की कहानी रह जाएगी’ छपकर आई तो उसमें मल्लिका का उल्लेख तो था, लेकिन जैसा राजेन्द्र जी चाहते थे, उस रूप में नहीं था।

मनीषा कुलश्रेष्ठ प्राक्कथन में इस उपन्यास के लिखने की समस्या और स्रोत के संबंध में कुछ स्रोत सामग्री का उल्लेख करते हुए लिखती हैं— जब उपन्यास लिखा जाता है, उपन्यासकार के भीतर कृतिकार ईश्वर चुपके से आ बैठता है।’ उदाहरण के लिए महान लेखक टॉल्स्टॉय के उपन्यास ‘अन्ना करेनिना’ का उल्लेख करते हुए वह कहती हैं—’अन्ना करेनिना को गढ़ते हुए कि जब वे आन्ना को समाज की स्त्रियों के समक्ष ‘चरित्रहीनता’ का प्रतिफलन बनाने बैठे तो वह उनके हाथ से निकल ‘मास्टरपीस’ ही बन गई।’  

मनीषा अच्छी तरह जानती हैं कि मल्लिका पर जितनी स्रोत सामग्री उपलब्ध है, बहुत कम है। इसलिए उन्होंने गल्प का सहारा लिया। पुस्तक के अंतिम आवरण पृष्ठ पर बिल्कुल ठीक लिखा गया है—’इतिहास के धुंधलके से गल्प के सहारे मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उसी विस्मृत और उपेक्षित नायिका को खोज निकाला है और उसके जीवन पर एक काल्पनिक जीवनीपरक उपन्यास रचा है।’

उपन्यास का आरंभ भोर में मल्लिका की नींद उचटने से होता है और यहीं से भारतेंदु हरिश्चंद्र से परिचय और उनकी स्मृति का इतिहास शुरू होता है। हम जानते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के कुल में उत्पन्न कवि गोपालचंद गिरधरचंद के ज्येष्ठ पुत्र थे और उनका जन्म 9 सितम्बर 1850 ई. में हुआ था। उन्हें लंबी उम्र नहीं मिली। मात्र 34 वर्ष 4 महीने की आयु में 6 जवरी 1885 ई. की रात 9 बजकर 45 मिनट पर हिंदी का भारतेंदु अस्त हो गया।

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी। मल्लिका पढ़ी—लिखी थी और बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की संबंधी थी। शुरू से ही मल्लिका भारतेंदु की आत्मीय बन गई। यही कारण है कि भारतेंदु ने अपना दिल उसके सामने खोल दिया। मल्लिका विधवा थी लेकिन वह प्रगतिशील विचारों की थी। शुरू में ही भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका ‘बाला —बोधिनी’ का उल्लेख हुआ है। मल्लिका को अपने पूर्वजों और संबंधियों से साहित्यिक संस्कार मिले थे। यही कारण है कि बंकिमचंद्र की कृतियों के किए हुए उसके अनुवादों पर उसे सराहना मिलती है। बेशक यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखा गया है लेकिन उपन्यास की संरचना में भारतेंदु के जीवन और रचनाओं को छोड़ नहीं दिया गया है- जैसे भारतेंदु की पत्नी का नाम सचमुच मन्नो देवी था और मल्लिका की बहन का नाम शेफालिका था, जिसे वह शिउली कहा करती थी। प्राक्कथन में ही मनीषा ने उल्लेख किया है—’कथादेश जुलाई 2007 में भारतेंदु की प्रेमिका मल्लिका पर लेख और उनके उपन्यास कुमुदिनी के अंश छपे थे।

यह पूरा उपन्यास मल्लिका और भारतेंदु के बीच प्रेम की दिलचस्प कहानी की तरह है और अंत बेहद मार्मिक। गल्प के सहारे भी ऐसा उपन्यास लिखा जा सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता। हम जानते हैं कि भारतेंदु का जन्म एक अमीर घराने में हुआ था। वह उन्हीं अमीचंद के वंशज हैं जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार में से अपने लिए लाखों बना लिए थे। लेकिन भारतेंदु ने इन पैसों को अपनी शाहखर्ची के चलते लुटा दिया था। मल्लिका के जीवन के संबंध में उपन्यास में जहां—तहां संकेत किए गए हैं। मल्लिका के पिता मिताई बाबू ने अपनी दोनों पुत्रियों के नामकरण फूलों के उपर किए थे— शेफालिका और मल्लिका। अपने बचपन में ही मां की मृत्यु के कारण मल्लिका अपने पिता से ही लिपटी रहती। पिता के अध्यापक होने के कारण वह भी उनके साथ स्कूल जाती। उसकी रुचि को देखकर गणित और अन्य विषयों के साथ उसे साहित्य भी पढ़ाया गया। मल्लिका का एक बहुत होनहार भाई भी था—अनिर्बान चटर्जी, जो क्रांतिकारी हो गया था। मल्लिका की शादी अपनी मौसी के देवर के बेटे सुब्रत से बचपन में ही हो गई थी। उपन्यास में मल्लिका हरिचंद ज्यू को हंसकर बताती है—’न हमने उसे देखा, न उसने हमें। आठ साल के हम थे, दस साल के वो, जब हमारी शादी हुई। चेहरा किसे याद रहा ? शिउली और जीजा तो शादी की रस्मों को टुकुर—टुकुर देखते थे। हम दोनों तो उंघ रहे थ. बाल विधवा मल्लिका की साहित्यिक रुचि थी जिसका संकेत उपर किया जा चुका है। मल्लिका सांवली थी लेकिन उसके नैन—नक्श बेहद आकर्षक थे। यह अकारण नहीं है कि बनारस आने के पूर्व उसके पास विवाह के प्रस्ताव आये जिसे उसने झटक दिया। बनारस में मल्लिका का संबंध बहुत मधुर था। उसने एक तोता पाल रखा था—भुवनमोहिनी, जो मनुष्यों की तरह बोलता था। मल्लिका ने भारतेंदु को बांग्ला सिखाई और भारतेंदु ने उसे हिंदी साहित्य की ओर मोड़ा। भारतेंदु ने उसे कवि—वचन सुधा पत्रिका में लिखने के लिए कहा, अनुवाद तो वह कर ही रही थी। हरिचंद ज्यू और मल्लिका का लगाव ऐसे ही बढ़ता रहा और वह कवि गोष्ठी और साहित्यिक गोष्ठियों में भी जाने लगी। कजरी, जो मल्लिका की दासी थी,एक अद्भुत चरित्र है। उसमें मनुष्यता के भाव ही नहीं, मल्लिका के लिए चिंता भी है। वह बराबर मल्लिका को संभालती रहती थी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

एक प्रसंग है भारतेंदु द्वारा चाय की पत्ती की पुड़िया लाने का और मल्लिका द्वारा उसे गलत समझ लिए जाने का। दोनों ओर से मजाक होने लगता है—’तभी अजाने ही हरिश्चंद्र ने मल्लिका की हथेली थाम कर कहा,” कल तुम्हारी काव्य—पंक्तियों ने मुझे रुला दिया, उसे पूरी करो ना और हिंदी में लिखो। उसे कवि—वचन सुधा में छापेंगे।” इस तरह मल्लिका की रुचि साहित्य में होने लगी और वह भारतेंदु द्वारा संपादित पत्रिका को देखने ही नहीं लगी बल्कि उसके लिए लिखने भी लगी। भारतेंदु की स्थिति परिवार की दृष्टि में ऐय्याश और लापरवाह व्यक्ति की थी लेकिन मल्लिका से प्रेम के बीच भी अपनी पत्नी मन्नो देवी के लिए उनके मन में करुणा और सहानुभति थी। कभी—कभी भारतेंदु मल्लिका से रूठ जाते थे और मल्लिका उनसे। लेकिन यह क्षणिक होता था। भारतेंदु और मल्लिका के बीच यह प्रणय संबंध लगातार गहराता जा रहा था। कभी—कभी भारतेंदु जब मौज में आते थे तो मल्लिका को चंद्रिका कहते थे। खुद हरिश्चंद्र थे इसलिए अपनी प्रेमिका को चंद्रिका कहते थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम हरिश्चंद्रिका कर दिया। सब जानते थे कि चंद्रिका के नाम से मल्लिका की कविताएं, कवि—वचन सुधा में प्रकाशित हुई हैं।

जिस तरह इन दोनों के बीच तेजी से प्रेम पनपा,उसी तेजी के साथ इसका अंत भी हो गया। भारतेंदु के प्रेम का यह एक आत्मीय प्रसंग है—’आप, तुम, हरिश्चंद्र जी। ये शब्द बहुत रूखे हैं। हम तुम्हें चंद्रिका कहेंगे, तुम हमें ज्यू! ठीक है ?” मल्लिका ने उल्लास से गर्दन हिला दी।’ ऐसा नहीं है कि भारतेंदु में विरोधाभास नहीं था। जिन अंग्रेजों के चलते अनिर्बान दा छिपते भटक रहे हैं उनके लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र का भक्तिभाव उसे असमंजस में डालता था। मल्लिका निरावरण, निर्वसन भरे—भरे वक्ष लिए,मसनद पर लेटे हरिचंद ज्यू के सम्मुख थी। टोपी का स्वांग न जाने कहां जा गिरा था। भाल पर रचित ढंग का टीका भी मिट गया था। लंबं केश सर्प सरीखे ज्यू के वक्ष पर लहरा रहे थे। एक जगह भारतेंदु कहते हैं—’ज्यादा न सही मैंने तुम्हारे नाम भी अपनी किताबों की आय सुरक्षित कर दी है न जाने कब ‘। भारतेंदु के अंतिम दिनों का चित्र बहुत मार्मिक है। भारतेंदु बिस्तर पर पड़े थे मगर किसी को पहचान नहीं पा रहे थे। वे मतिभ्रम में थे। अंतिम समय मल्लिका पास थी, ‘ सूखे होंठों पर एक स्मित आया और चंद्र अस्त हो गया। चंद्रिका चंद्र के साथ अंधियारे की गैल उतर गई। समस्त—ज्ञान श्वासों की कड़ी के साथ टूटकर बिखर गया और विज्ञान का प्रदीप बुझकर वाष्प हो गया। वाह रे समय ! आह रे काल! मन्नो दहाड़ कर रो पड़ी। मल्लिका को सिसकियां भी भारी पड़ती थीं। उसने आहिस्ता से चरण छू लिए मृत—देह के। उसका अंतस सुन्न था।’ मल्लिका का यह वाक्य सचमुच किसी पाठक को झकझोरने के लिए काफी है—’ज्यू ! आपने तो मुझसे प्रतीक्षा तक छीन ली । आगे कजरी कहती है—’मलिकिनी, अर्थी की तैयारी है,दर्सन कर लेव।’ काशी के उस घाट पर चंदन की लकड़ियों में जलती चिता के ओज से चहुंदिस प्रकाशमान थी।    

भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका सोचती है—’ अभी जाने कितने बिछोह शेष हैं मेरे भाग्य में। सबका हिसाब चुका आउं। तब भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू ! अपनी डोंगी लिए।’ मल्लिका के लिए भारतेंदु ने अपनी वसीयत में लिखा था— ‘कंपनी,पांडुलिपियां, पुस्तकों का अधिकार और हर माह पचास रुपए की रकम मल्लिका के पास जाए।’

भारतेंदु के निधन के बाद मल्लिका के लिए काशी में कुछ नहीं बच गया था। उसने अपनी स्वरचित उपन्यासों की  पांडुलिपियां भारतेंदु के भाई गोकुलचंद्र को दे दीं। पुस्तकें पुस्तकालय को दे दीं। ज्यू की पुस्तकों की एक—एक प्रति रख ली और कहा — ‘इन्हें किसी छापेखाने से छपवा दीजिएगा। अब काशी से मुझे विदा दें। मैं वृंदावन जाना चाहती हूं गोकुल।’

मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह उपन्यास गल्प के सहारे लिखे जाने के बावजूद संरचना की दृष्टि से खूब कसा हुआ और भाषा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। एक उदाहरण देखिए—’रात्रि का अवसानकाल निकट था। पूनो का आकाश शंख—सा चमकता था। प्रभात की धूमिल रेखाएं क्षितिज पर खिंची थीं। एक महाराज प्रभाती गा रहा था कि नींद खुल गई, स्वप्न खंडित होकर विस्मृत हो गया।’यहां शमशेर की काव्य—पंक्ति — ‘प्रात: नभ था शंख जैसा’ की सहसा याद आ जाती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इस उपन्यास को लिखने के लिए पर्याप्त शोध किया है और मल्लिका और भारतेंदु के जीवन के व्यक्तिगत निजी प्रसंगों को भी विश्वसनीयता के साथ उठाया है। लेकिन इस उपन्यास में एक बात अखरती है और वह है भारतेंदु द्वारा अपनी पुस्तकों का कॉपी राइट मल्लिका को देना जबकि हकीकत यह है कि भारतेंदु ने बाबू रामदीन सिंह (खड्गविलास प्रेस बांकीपुर पटना के मालिक) द्वारा बार—बार आर्थिक मदद देने की कृतज्ञता से उऋण होने के लिए अपनी तमाम पुस्तकों के कॉपी राइट उन्हें सौंप दिए थे। भारतेंदु उनसे मिलने खड्गविलास प्रेस भी गए थे और वहां रात में रुके भी थे। ‘तब बाबू रामदीन सिंह ने उन्हें एक पगड़ी, एक थान कपड़ा और 501 रु. नकद से उनकी विदाई की। खड्गविलास प्रेस के मैनेजर बाबू साहबप्रसाद सिंह ने अपनी ओर से 75 रु. विदाई में दिए।’ (आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका पृ. 194)

अंत में, बस यही कहना बचा रह जाता है कि यह उपन्यास भारतेंदु और मल्लिका  की मात्र प्रेम कहानी नहीं है बल्कि उनके भीतर उठने वाले अंतर्द्वंद्वों की प्रतिध्वनि भी है। पठनीय और उल्लेखनीय तो यह उपन्यास है ही।

उपन्यास: “मल्लिका”
लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशन: राजपाल एण्ड सन्ज़ 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट दिल्ली 110006
मूल्य: 235रु.
प्रथम संस्करण 2019   

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ISSN 2394-093X
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