भारतीय स्त्री अधिकार : एक ऐतिहासिक यात्रा

 

सुमुत्तिका, सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकाम्हि मुसलस्स|

अहिरिको में छ्त्तकं वा पि, उक्खलिका मे देड्डुभं वा ति|| थेरी सुमंगलमाता

अहो! मैं मुक्त नारी हूँ! मेरी मुक्ति कितनी धन्य है!पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थी, आज मैं उनसे मुक्त हो गई हूँ| मेरी दरिद्रवस्था के वे छोटे-छोटे भांडे-बरतन, जिनके बीच में मैं मैली-कुचैली बैठती थी और मेरा निर्ल्लज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था. पृष्ठ 63

को नु ते इदमक्खासि, अजानन्तस्स अजानको|

दकाभिसेचना नाम, पापकम्मा पमुच्चति|| थेरी पुण्णा  पृष्ठ 204

गंगा-स्नान-शुद्धि से पाप-मुक्ति होती है, यह तुझसे किसने कहा? यह तो अज्ञानी, मूर्ख व्यक्ति का अज्ञानी मूर्ख के प्रति उपदेश है|

यह बारम्बार रेखांकित किये जाने योग्य है कि इसी देश की बौद्ध भिक्खुनियों ने इस पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध न केवल कदम उठाया अपितु अपनी गाथा लिखकर स्त्री स्वातंत्र्य का पहला लिखित दस्तावेज़ हमें उपलब्ध कराया.

समूचा वैश्विक परिदृश्य ही स्त्री विरोधी था वरना इस पर चिंतन न हो रहा होता और जॉन स्टुअर्ट मिल को यह न लिखना पड़ता –“सामाजिक और प्राकृतिक – सभी कारण मिलकर यह असंभव कर देते हैं कि महिलाएं संगठित तौर पर पुरुषों की सत्ता का विरोध कर सकें. वे इस अर्थ में पराधीन वर्ग से भिन्न स्थिति में हैं कि उनके मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और भी चाहते हैं. पुरुष केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता ही नहीं चाहते, वे उनकी भावनाएं भी चाहते हैं. सबसे क्रूर और निर्दयी पुरुष को छोड़कर सभी पुरुष अपनी निकटतम सम्बन्धी महिला में जबरन बनाये गये दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं. अत: उन्होंने महिलाओं के मस्तिष्क को दास बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल किया है. अन्य दासों के मालिक आज्ञाकारिता को बनाये रखने के लिए भय का प्रयोग करते हैं—उनका खुद का भय या फिर धार्मिक भय. स्त्रियों के मालिक साधारण आज्ञाकारिता से कुछ अधिक चाहते थे. और उन्होंने शिक्षा के पूरे बल का इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया. बचपन से स्त्रियों को यह सिखाया जाता कि उनका आदर्श चरित्र पुरुष के चरित्र से बिलकुल विपरीत होना चाहिए. इच्छा शक्ति और आत्म-नियंत्रण नहीं, बल्कि नियंत्रण और दूसरों के नियंत्रण के समक्ष झुक जाना उनका गुण होना चाहिए. सारी नैतिकता उन्हें यह बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जियें, पूर्ण आत्म त्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो. स्नेह सम्बन्धों से तात्पर्य सिर्फ उन सम्बन्धों से है, जिनकी उन्हें इज़ाजत है—वे पुरुष जिनसे स्त्री सम्बन्धित हो या वे बच्चे जो पुरुष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं.” विद्रोही स्त्री- जर्मेन ग्रीयर पृष्ठ 65

एक सुदीर्घ परम्परा के माध्यम से जड़ता की निर्मिती करते हुए स्त्री को अधिक से अधिक ग़ुलाम बनाकर रखने की साज़िश ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने क़ायम कर रखी थी. यह पुरुष अपने स्त्री नाते को मनुष्य की तरह नहीं बल्कि एक ऐसे रोबोट के तौर पर देखता है जो उसके संकेतों पर बगैर किसी देरी के, बगैर कोई दर्द महसूस किये ‘हुकुम मेरे आक़ा’ की तर्ज़ पर संचालित होता रहे. जर्मन ग्रीयर का उक्त कथन नि:संदेह स्त्री के पक्ष में है. तब भी यह चिंतन की माँग करता है. उन्होंने जिसे ‘सामाजिक और प्राकृतिक कारण’ कहा है, यहीं वह पेंच है जिसमें सुधार की आवश्यकता है. जिस कारण को सामाजिक के साथ प्राकृतिक बताया गया है, वह क्या है? प्राकृतिक बताते ही आपने दबाव को, डिस्क्रिमिनेशन को न्याय संगत बता दिया. चलिए मान लिया कि माहवारी और गर्भावस्था और आगे बढ़ें तो क्या इसमें धात्री को भी शामिल करेंगे(?) को प्राकृतिक कारण कहा जा रहा है तो बीमारी भी प्राकृतिक कारण है ही. कितने पुरुष बीमार नहीं पड़ते होंगे? क्या यह बीमारी अतिरिक्त देख-भाल की माँग नहीं करती? पर तब तो ‘स्त्री सत्ता’ जैसा कोई पद पुरुष के विरुद्ध सांगठनिक तौर पर कोई दमनात्मक व्यवहार नहीं करता. तो माहवारी या गर्भावस्था को कारण बताकर किसी भी तरह की छूट नहीं ली जा सकती.

स्त्री को सहज मानवोचित अधिकारों से लैस करने की लडाई लम्बी है. कानूनन हक़ सुरक्षित करने का सिलसिला आरम्भिक तौर पर देखा जाये तो एक सौ दस-पन्द्रह वर्ष दिखाई देते हैं. 28 नवम्बर 1890 जोतिबा फुले की मृत्यु और 14 अप्रेल 1891 डॉ आंबेडकर का जन्म लगभग 116 दिनों का अन्तराल है. स्त्री को मनुष्य के तौर पर स्वीकार्यता दिलाने के आन्दोलन का आरम्भ यानि सोचा जाये तो सन 1842 से सन 1955-56 तक अंजाम में ले आना एक महत्वपूर्ण यात्रा है. नि:संदेह इसके लिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के तौर पर पण्डित जवाहरलाल नेहरु की भूमिका भी असंदिग्ध है. किन्तु यह तय है कि महाराष्ट्र से स्त्री हक़ के लिए पुरजोर न केवल आवाज़ उठी अपितु वैधानिक काम भी किये गए. चित्तपावन ब्राह्मणों की सांस्कृतिक नगरी, पेशवाओं के  कार्यस्थल में अपने दम पर समस्त खतरों को उठाते हुए स्त्री को शिक्षा देने का कार्य फुले दंपत्ति ने किया था. यही कारण था कि फुले दंपत्ति को सार्वजनिक तौर पर 16 नवम्बर 1852 को मि. कैंडी ने सम्मानित किया. शिक्षित स्त्री कैसे समाज की मार्गदर्शक हो सकती है, यह सावित्री बाई फुले ने दिखा दिया.

नि:संदेह मनुस्मृति के माध्यम से भारतीय स्त्री ही नहीं, पुरुष को भी स्त्री विरोधी शिक्षा दी गई है जिसके संस्कार अब तक नहीं छूते हैं. आज तो हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना के साथ और भी सांसे भरते दिखाई दे रहे हैं. डॉ आंबेडकर ने ‘नारी और प्रतिक्रांति’ में स्त्री के समग्र विकास में अवरोध उत्पन्न करने वाले उन श्लोकों का संदर्भ दिया है जो मनुस्मृति में भी दर्ज़ हैं. इसके खिलाफ़ डॉ आंबेडकर ने हुंकार भरी थी. 19-20 मार्च 1927 को महाड चवदार तालाब के जल सत्याग्रह करने के बाद जो हालत निर्मित हुए थे, उसी का परिणाम था कि दिनांक 25 दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया गया था.

27 दिसम्बर सन 1927 को दलित महिलाओं को सम्बोधित करते हुए बाबा साहेब ने उनसे मनुष्य की तरह बने रहने की अपील की. उन्होंने कहा-अस्पृश्यता निवारण की समस्या पुरुषों की न होकर स्त्रियों की ही है. आपने हम पुरुषों को जन्म दिया है. दुसरे लोग हमें जानवरों से भी गया-गुजरा समझते हैं. … आपको सोचना चाहिए कि ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना शील है, उतना ही आपमें भी है. ब्राह्मणों की स्त्रियों में जितना पातिव्रत्य है, उतना ही आपमें भी है और तुम्हारे भीतर जितना धैर्य, संकल्प और उत्साह है, वह ब्राह्मण स्त्रियों में नहीं है. ऐसे में तुम्हारे पेट से जन्म लेनेवाले बच्चे की अवमानना होती है. … यदि आपने सोचा होता तो पुरुषों के पहले आपने सत्याग्रह किया होता. … आप संकल्प लें कि ऐसी कलंकित स्थिति में हम जीवन नहीं गुजारेंगे. … दूसरे यह कि सारी पुरानी और गलीज़ परम्पराएँ छोड़ देंगे. ढ़ंग से साडी बांधे, गले भर और हाथ भर गिलट या चांदी के गहने न पहनें, एक ही काफ़ी है. और पहनना ही है तो सोने के आभूषण पहनें. गहनों के बदले कपड़े अच्छे पहनें. अपने पहनावे से ही आप अलग दिखाई देती हैं, सुरुचिपूर्ण रहें. पिछले मार्च से लोगों ने मरे हुए जानवर का मांस खाना बंद कर दिया है. पर यदि पुरुष ऐसा करता है तो स्त्री को चाहिए कि वह पुरुष को ऐसा न करने को ताकीद करे. डॉ बाबा साहेब आम्बेडकर लेखन और भाषण भाग 1, पृष्ठ 142-145

इस एक संबोधन ने दलित स्त्रियों में सम्मानपूर्वक जीने की ललक पैदा कर दी. अगले दिन जब वे अपने गाँवों को वापस जाने लगीं तो फाटे हुए ही सही पर उनके पहनावे में परिवर्तन दिखाई दिया. बाबा साहेब ने अपने सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, अपने प्रशासनिक-राजनितिक जीवन में स्त्री अधिकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत कदम उठाये.

28 जुलाई सन 1928 को बम्बई विधान मंडल में डॉ आंबेडकर ने प्रसूति लाभ विधेयक के संदर्भ में अपने मजबूत तर्क में कहा था- “किसी महिला का कोई नियोक्ता प्रसूति की अवस्था में महिला के हितों की रक्षा के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त होता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि नियोक्ता महिला को किसी उद्योग विशेष में इसलिए काम पर लगता है, क्योंकि उसको पुरुष की अपेक्षा महिला को काम पर लगाने से अधिक लाभ मिलता है… मेरा कहना है कि यद्यपि प्रसूति लाभ के मामले में निश्चित रूप से कुछ ज़िम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है, तथापि मेरे विचार से यदि इन हालात में विधेयक में नियोक्ता को भी कुछ दायित्व सौंपा गया है, तो उससे विधेयक पूरी तरह गलत नहीं हो जाता. … इस विधेयक के माध्यम से सुझाये गए लाभ विधान-मंडल द्वारा उन गरीब महिलाओं को दिए जाने चाहिए, जो इस प्रेसिडेंसी में हमारी फैक्टरियों में कठिन परिश्रम करती हैं.” बाबा साहेब डॉ आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 3, पृष्ठ 185-187

जब भी भारतीय स्त्री के संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था की चर्चा होती है, हिन्दू कोड बिल का संदर्भ अवश्य आता है. नि:सन्देह हिन्दू कोड बिल भारतीय संविधान शिल्पकार बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर का महत्वाकांक्षी बिल था. स्त्री मात्र  के सम्मान की कानूनन व्यवस्था डॉ आंबेडकर का सपना था. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति लिखते हैं – “जब बाबा साहेब वायसराय की कौन्सिल के सदस्य थे, उस समय से ही उनके मन में हिन्दू कोड बिल को बनाने का कई बार विचार उठा था. सर अकबर हैदरी और सर बी.एन. राय आदि महानुभावों ने इसकी रुपरेखा तैयार करने का संकल्प लिया.” पृष्ठ 6-7 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

हिन्दू कोड बिल तैयार करने इतना आसान कार्य भी न था जबकि “ भारत के स्वतंत्र होने से कुछ समय पहले से ही हिन्दुओं का सुधारवादी वर्ग मुस्लिम और ईसाईयों की भांति हिन्दुओं के लिए भी कोई वैद्य और प्रमाणिक कोड या कानून बनाने के लिए इच्क्षुक अवश्य था, किन्तु ऐसे जटिल और सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्रान्तिकारी कानून को कौन बनाये और संसद में उसे पारित कराये. ऐसा कोई भी शूरवीर एवं विधि विधानकों का अकाण्ड पंडित भी इस हिन्दू कोड को जो उस्तरों की माला था, अपने गले में पहनने के लिए तैयार नहीं था. हिन्दुओं में उच्च वर्णों में भी सुधारवादी व्यक्ति जन्म लेते रहे हैं. किन्तु वे जानते थे की राजनैतिक काम करने, जेलों में स्वराज्य प्राप्ति के लिए बरसों बंद रहने की अपेक्षा हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक क्रांति लाना अति कठिन है. हिन्दू धर्मी राजनितिक तौर पर भले ही चुस्त रहे हों और स्वराज्य प्राप्ति के लिए अति भयानक पीड़ाएँ भी सही हों, किन्तु वे राजनितिक हिन्दुओं में धार्मिक और सामाजिक सधार या क्रान्ति लाने में अत्यंत धर्मभीरू और डरपोक रहे हैं. उनमें इतनी जुर्रत ही नहीं थी कि वे हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक ढ़ाँचे में किसी प्रकार की क़ानूनी तब्दीली या परिवर्तन ला सकें.” पृष्ठ48 हिन्दू कोड बिल और डॉ आंबेडकर

डॉ आम्बेडकर ने विरोधियों से संवाद बनाकर बिल सम्बन्धी समस्त भ्रान्तियों को दूर करने का प्रयास भी करना चाहा पर असफल रहे. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति से एक ऐसा संस्कृत विद्वान ढूंढ़कर लाने को कहा जो बिल के पक्ष में संस्कृत शास्त्रों से संदर्भ तलाशकर दे. सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति की तलाश वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति पर ठहरी. पंडित धर्मदेव विद्यावाचस्पति ने तत्कालीन दैनिक ‘वीर अर्जुन’ में कुल 13 लेख माला प्रकाशित करवाई जिसमें हिन्दू कोड बिल को शास्त्र सम्मत ठहराने का प्रयास किया था.  यह लेख निम्नानुसार थे –

  1. हिन्दू कोड बिल हिंदुत्व का रक्षक है.
  2. विवाह सम्बन्धी धाराएँ
  3. विवाह-विच्छेद की परिस्थितियाँ
  4. विवाह-विच्छेद और स्मृति आदि ग्रन्थ
  5. दत्तक-विधान और संरक्षकता
  6. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  7. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार
  8. स्त्रियों के दायभागाधिकार
  9. स्त्रियों के दायभाग और स्मृतियाँ
  10. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (पूर्वार्द्ध)
  11. पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श (उत्तरार्द्ध)
  12. संयुक्त परिवार प्रथा
  13. हिन्दू कोड बिल की आवश्यकता

उक्त सारे प्रावधान का एक अत्यंत रेखांकित किये जाने योग्य कारण और भी है. महाड़ जल सत्याग्रह के बाद विविध स्थानों में दलित वर्ग की सभाएँ होने लगीं. इन सभाओं में स्त्री-पुरुष दोनों ही भाग लेते. दलित स्त्रियों की भी अलग-अलग स्थानों पर सभाएँ होने लगीं. साथ ही आंबेडकर दलित तरुण संघ (विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास –एच.एल.कोसारे पृष्ठ 279 भी स्थापित होने लगे. स्त्रियों द्वारा ली जा रही सभाओं में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से माँग के तौर पर जो प्रस्ताव पारित किये जा रहे थे, वे पूरी तरह से दलित स्त्री की राजनितिक भूमिका निर्मित कर रहे थे. दो-चार उदाहरण यहाँ दृष्टव्य हैं-

बुलढाणा ज़िला अस्पृश्य महिला परिषद

मतकापुर में दिनांक 28 मार्च 1934 को अस्पृश्य महिला परिषद का अधिवेशन मिसेस कमलाबाई रेगे की अध्यक्षता में हुआ।

परिषद में पारित प्रस्ताव-

(1) अस्पृश्य बालक बालिकाओं की शिक्षा के लिए सरकारी रिपोर्ट मतलब किलरो रिपोर्ट के अनुसार व्यवस्था करना

(2) शारदा बिल का अमलीकरण

(3) बालकों के नॉर्मल तथा बालिकाओं के फ़ीमेल नॉर्मल स्कूल में अस्पृश्य बालक-बालिकाओं को अधिक सुविधाओं की माँग। (4) मंदिर प्रवेश बिल आदि प्रस्ताव पर सौ. कांताबाई इंगले, राईबाई, केसरबाई वाकोडे, अहिल्यबाई, काशीबाई भगत, भारजाबाई, सौभद्राबाई, राधाबाई तायडे, सखुबाई तायडे, भीकाबाई वाघ, चिंधाबाई वाघ आदि के भाषण हुए। (जनता दिनांक 21-4-1934)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 280

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

जनता साप्ताहिक में 5 मई 1934 को प्रकाशित समाचार के अनुसार अप्रेल 1934 में तुमसर में सौ.सुभद्राबाई रामटेके (श्री नारायण दलाल रामटेके की पत्नी) की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा हुई।

सभा में अग्रलिखित प्रस्ताव पारित हुए-

(1) सारी स्त्रियाँ अपने-अपने बच्चों में शिक्षा के प्रति रूचि जागृत करने का प्रयास करते हुए स्वयं भी थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

(2) कांग्रेस के नाम पर जो अस्पृश्यता निवारण का ढोंग और दिखावटी कार्य चला रहे हैं, उन कार्यकर्ताओं का निषेध

(3) अपने समाज के कुलनाशक गवई आदि अस्पृश्य मंडल और उन्हें गुमराह करनेवाले डॉ मूंजे आदि हिंदू सभावालों का तीव्र विरोध

(4) डॉ आंबेडकर के कार्यों को समर्थन

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे,पृष्ठ 281

अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल

नागपुर इमामवाडा में दिनांक 26 अप्रैल 1937 को डॉ आंबेडकर के जन्मदिवस के अवसर पर सौ.जानकीबाई फूले (रावसाहेब फूले की पत्नी) की अध्यक्षता में नागपुर महिला वर्ग की ओर से सार्वजनिक सभा का आरंभ हुआ। इसमें कु.सत्याभामा पाटील, सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार, सौ.सकुबाई मेश्राम, सौ.राधाबाई कांबले, कु.दालंबीबाई तोतडे, सौ.कौसल्याबाई आदि वक्ताओं के भाषण हुए और निम्नलिखित प्रस्ताव पारित हुए –

  1. अस्पृश्य महिलाओं के सुधार के लिए सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक अधिकार दिलाने के लिए अस्पृश्य महिला सुधारक मंडल स्थापित करते हुए स्वयं के पैरों पर खडे रहने के लिए अपनी उन्नति करना।
  2. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ही हमारे अस्पृश्य समाज के नेता हैं,उनके कदम से कदम मिलाकर हम अस्पृश्य महिलाओं का सुधार करेंगे, यही हमारा उद्देश्य होगा।

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 344

अस्पृश्य महिलाओं की सभा

धरमपेठ नागपुर में दिनांक 1 जनवरी 1938 को श्रीमती सखुबाई मेश्राम की अध्यक्षता में अस्पृश्य महिलाओं की सभा का आयोजन किया गया। सौ.अंजनीबाई देशभ्रतार और श्रीमती सखुबाई मेश्राम ने नागपुर में बड़े दिन के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय महिला परिषद में स्पृश्य बहनों के अस्पृश्य बहनों के प्रति पराएपन, विखंडित भाव, ओछापन और नीच वृत्ति के आचरण पर सोदाहरण बात की। इसके आगे उन्होंने बताया कि अस्पृश्य समाज की स्त्रियाँ अपना सुधार और उन्नति करें और अपने स्वाभिमान और स्वावलंबन का आंदोलन चलाकर समाज के लिए नि:स्वार्थ कार्य करें। दूसरे लोग हमारा सुधार करेंगे, यह भ्रामक धारण छोड़कर अपने ही पैरों पर खड़े होकर स्वयं का, अपने कुटुंब का और समाज का सुधार करे। इसी तरह शिक्षा, शुद्धता, स्वच्छता, सादा जीवन और भाषा और संगठन के संदर्भ में बहुत सारी बातें कहीं।

सभा में ऑल इंडिया महिला परिषद का अधिवेशन जो नागपुर में हुआ था, में स्पृश्य बहनों ने अस्पृश्य समाज की सौ.नाईबाई चौधरी वगैरह को भोजन के समय अलग दूर बैठालकर भोजन कराया और अस्पृश्य समाज से छूत मानते हुए अपमानित किया । इसलिए इस अखिल भारतीय महिला परिषद का तीव्र निषेध प्रस्ताव पारित किया गया।

इसके बाद ‘श्रीमती रमाबाई आंबेडकर महिला संघ’ की स्थापना हुई अध्यक्ष सौ. शारदाबाई तागडी चव्हाण, उपाध्यक्ष सौ.नगुबाई सूर्यवंशी, कोषाध्यक्ष सौ.यशोदाबाई सूर्यवंशी, सचिव श्रीमती सखुबाई मेश्राम, सह सचिव कु.चांगोनाबाई लांबधरे और अन्य सदस्य नियुक्त किए गए।

उपरोक्त मंडल के तत्वावधान में यहाँ एक ‘अस्पृश्य महिला नाइट स्कूल’ आरंभ करनेकी घोषणा की गई। (जनता दिनांक 22-1-1938)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 354

उमरेड तालुक़ा महिला परिषद

दिनांक 20-4-1940 को उमरेड तालुक़ा महिला परिषद सौ.सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इसमें डॉ आंबेडकर की दीर्घायु की कामना की गई। इसी तरह

  1. प्रदेश में विभिन्न स्थानों में महिला समता सैनिक दल की स्थापना की जाए।
  2. भावी संविधान में विधान-मंडल में अस्पृश्य महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित रखें जाएँ,जैसे प्रस्ताव पारित हुए। (जनता दिनांक 29-6-1940)

विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 390

उक्त सभाओं का आयोजन स्त्रियाँ ही कर रही थीं और सचेत राजनितिक निर्णय ले रही थीं. शिक्षा के प्रति जो चेतना फुले और डॉ आंबेडकर ने जगी थी, उसे प्राप्त करने और बच्चों को शिक्षित करने की चाह में रात्रि पाठशाला की भी फल करती है. अपने साथ होनेवाले अस्पृश्य व्यव्हार को उजागर करने के लिए स्पृश्य स्त्रियों द्वारा किये गये छद्म व्यवहार का निषेध भी करती हैं. न केवल इतना अपितु विधान माडलों में अस्पृश्य स्त्रियों के लिए स्थान आरक्षित करने की संवैधानिक व्यवस्था की भी मांग करती हैं. डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में जो भूमिका लेती हुई ये स्त्रियाँ आज से लगभग अस्सी–नब्बे वर्ष पहले दिखाई देती हैं, उसी का परिणाम है कि हम आज संविधान के माध्यम से नागरिक होने का दर्जा प्राप्त कर रहे हैं.

इसी कड़ी में सन 1942 को नागपुर में संपन्न हुई एक और महिला परिषद का उल्लेख यहाँ विस्तार से करना समीचीन होगा. दिनांक 20 जुलाई 2022 को इस सभा को पूरे 80 वर्ष हो जायेंगे. दिनांक 19 जुलाई 1942 को अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर में आयोजित की गई. यहाँ दूसरे दिन यानि 20 जुलाई को स्त्रियों की सभा भी हुई जिसे डॉ आंबेडकर ने सम्बोधित किया. इसका पूर्ण विवरण निम्नानुसार है-

“अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, नागपुर

दूसरा अधिवेशन 20 जुलाई 1942

कार्यकारी मंडल 

स्वागताध्यक्ष – सौ. कीर्तिबाई पाटील

उपाध्यक्ष – कु. लतिकाबाई गजभिये

श्रीमती राधाबाई कांबले

महा सचिव – सौ. इंदिराबाई पाटील

संयुक्त सचिव – कु. कौशल्या नंदेश्वर

संयुक्त सचिव –कु. मंजुला कानफाडे 

सदस्य – कु. राधाबाई बोश्वर

कु. प्रभावती रामटेके

श्रीमती जाईबाई चौधरी

कोषाध्यक्ष – श्रीमती दालंबाबाई हाडके

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद का दूसरा अधिवेशन दिनांक 20 जुलाई 1942 को नागपुर के मोहन बाग में स्थापित अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद के भव्य मंडप में आयोजित हुआ। अधिवेशन में 75 हज़ार से अधिक लोग उपस्थित थे। और इनमें से 25 हज़ार दलित महिलाएँ थीं। मंच पर डॉ आंबेडकर और अन्य नेतागण थे। 

दलित वर्ग महिला परिषद की अध्यक्ष के रूप में मिसेज शिवराज का चयन हुआ था। मद्रास की मिसेज शिवराज अपरिहार्य कारणवश न आ सकीं इसलिए नासिक की कु. शांताबाई दाणी से निवेदन किया गया। उन्होंने अध्यक्ष पद सहर्ष स्वीकार किया पर ऐन वक्त पर बीमार पड़ गईं। इस कारण अलीगढ़ की कु नंदादेवी गौड़ को निमंत्रण दिया गया। पर उनका नागपुर आना संभव नहीं हो सका। अंतत: समय की कमी को देखते हुए अमरावती की सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे का चुनाव दलित वर्ग महिला परिषद के अध्यक्ष के रूप में किया गया। और सौ. सुलोचनाबाई डोंगरे की अध्यक्षता में परिषद का कार्य आरंभ हुआ। 

सौ. कीर्तिबाई पाटील ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इसके बाद सौ. इंदिराबाई पाटील महासचिव ने अपना प्रतिवेदन परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया। दलित महिला अधिवेशन में बहुत सारे प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों पर सौ. जाईबाई चौधरी, सौ. राधाबाई कांबले, कु. प्रभावती रामटेके, कु. भीमाबाई बडगे, कु. मंजूला कानफाडे, कु. लतिका गजभिये, कु. सुलोचना नाईक अमरावती, कु. वीरेंद्राबाई तीर्थंकर, कु. चंद्रभागा पाटील गोंदिया, कु. कौशल्या नंदेश्वर के भी भाषण हुए। 

डॉ आंबेडकर का भाषण

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद, के अधिवेशन में डॉ आंबेडकर ने अपना बहुत छोटा पर महत्वपूर्ण भाषण दिया। परिषद में 20-25 हज़ार से ऊपर प्रचंड महिला समुदाय को देखकर उन्हें अपरिमित आनंद प्राप्ति बताते हुए डॉ आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा कि, “स्त्री वर्ग में जागृति हुई तो वे अस्पृश्य समाज में बहुत बडी प्रगति निर्मित कर सकती हैं, मुझे इसका विश्वास है। महिलाओं की संगठित संस्थाएँ होना चाहिए, मेरा इस पर विश्वास है। उनकी सबसे बड़ी सेवा यह है कि उनमें सामाजिक दुर्गुण नहीं है। मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। दलित समाज का कार्य जब मैंने अपने हाथों में लिया तभी यह निर्धारित किया था कि पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी आगे ले जाना चाहिए। इसी कारण हमारी परिषद के साथ ही महिला परिषद भी आयोजित हो रही है। स्त्री समाज ने कितनी प्रगति की है, इससे मैं दलित समाज की प्रगति को नापता हूँ। इस परिषद में महिलाओं की प्रचंड संख्या देखकर मुझे विश्वास हुआ और आनंद हो रहा है कि हमारी प्रगति हुई है।”

डॉ आंबेडकर ने दलित महिलाओं को जो संदेश दिया वह बहुत महत्वपूर्ण। उन्होंने आगे कहा,”स्वच्छता के साथ रहना सीखें। सारे दुर्गुणों से दूर रहें। अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करें। उनमें महत्वाकांक्षा निर्मित करें। वे बड़े महान बन सकते हैं, ऐसा उनके मन मे रोपें, उनके मन से सारी प्रकार की हीन भावना निकाल दें। उनकी शादी करने की जल्दी न करें क्योंकि शादी एक ज़िम्मेदारी है। शादी की ज़िम्मेदारी संभालने की उनकी कूव्वत जब तक नहीं होती तब तक शादी न करवाएँ। शादी के बाद ज्यादा बच्चे पैदा करना अपराध है, यह शादी करनेवालों को ध्यान रखना चाहिए। तुम्हें यदि सुख सुविधा उपलब्ध नहीं थी तब भी अपने बच्चों को अच्छी स्थिति में रखना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। शादी करनेवाली हर लड़की को चाहिए कि वह अपने पति के उद्देश्य के पक्ष में खड़ी हो, उनकी दासी बनकर नहीं बल्कि बराबरी के नाते से, मित्र कहलाते हुए। इस संदेशानुसार यदि आपने अपने कर्तव्य किए तो आप अपने साथ-साथ दलित वर्ग का भी अभ्युदय करेंगे और सम्मान बढ़ाएँगे।

परिषद में पारित प्रस्ताव

अखिल भारतीय दलित वर्ग महिला परिषद में अग्रानुसार महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकृत किए गए-

  1. अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद में दिनांक19 जुलाई 1942 को स्वीकृत हुए प्रस्तावों को यह परिषद अपने अंत:करण से समर्थन देती है।
  2. हमारे समाज में पति-पत्नी में अनबन होने पर समझौते के आधार संबंध समाप्त करने के अधिकार को क़ानूनी मान्यता दी जाए। इस संबंध में सरकार और समाज के नेता उचित सुधार करते हुए तत्संबंधी क़ानून बनाए,परिषद यह माँग करती है। 
  3. हमारे समाज में एक ही समय पर पुरुषों द्वारा एक से अधिक विवाह करने की जो रूढ़ प्रथा है,बहुत अन्यायी और ज़ुल्मी प्रथा होने के कारण अधिक शादियाँ करने की प्रथा क़ानूनन बंद की जाए, ऐसा निवेदन परिषद सरकार से करती है।
  4. भारत के कारख़ानों की मजदूर स्त्रियों,बीड़ी मजदूर स्त्रियों, म्यूनिसिपल और रेलवे की मजदूर स्त्रियों को अपने कारख़ाने में काम करते हुए अन्य नौकरियों की तरह वर्ष में 21 दिन का आकस्मिक अवकाश और एक माह का अर्जित अवकाश, काम करते हुए किए दुखद घटना घट जाए तो वाजिब नुक़सान की भरपाई मिलना चाहिए। इसी तरह से 20 वर्ष की नौकरी होने पर कम से कम 15 रुपये प्रतिमाह की पेंशन संस्था की ओर से मिलने की कानूनन व्यवस्था की जानी चाहिए। यह परिषद नागपुर वाइसराय के कार्यकारी मंडल के नेक नामी मजदूर मंत्री से आग्रहपूर्वक निवेदन करती है। 
  5. (अ) महिला वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। उनमें शिक्षा का प्रचार करने के लिए प्रत्येक प्रांतीय सरकार प्रत्येक इलाक़े में50लड़कियों के लिए छात्रावास सरकारी खर्च से बनाए, यह परिषद सरकार से यह निवेदन करती है। 

(ब) अस्पृश्य घोषित किया गया समाज अत्यंत दरिद्र है. इस कारण अपने बच्चों को माध्यमिक और उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त करनेवाली प्रत्येक छात्रा को सारी सरकारी और अर्द्ध सरकारी शालाओं में मुफ़्त और स्कॉलरशिप देने की व्यवस्था प्रत्येक प्रांतीय सरकार अविलंब करे, यह परिषद ऐसा गर्मजोशी और आग्रह की विनती करती है।

(स) प्रांतीय सरकार से निवेदन है कि अस्पृश्य मानी गई महिला वर्ग की अशिक्षा और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर उनके लिए अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा योजना बनाते हुए उसे शीध्रातिशीघ्र अमल में लाना आवश्यक है।

  1. मध्यवर्ती सरकार से निवेदन है कि मिलों में काम करनेवाली स्त्रियों के काम का निरीक्षण करने के लिए बहुत सारी जगहों पर पुरुषों की नियुक्ति की जाने के कारण कामगार महिलाओं पर अत्याचार और ज़ुल्म होते हैं,इसलिए मिलों या अन्य जगहों जहाँ स्त्रियाँ सामूहिक तौर पर काम करती हैं, उनके निरीक्षण के लिए स्त्री कामगार ही रखी जाएँ, सरकार कानूनन ऐसी व्यवस्था करे। 
  2. सरकार से निवेदन है कि जिस तरह से मध्यवर्ती और प्रांतीय विधान मंडल में,इसी तरह स्थानीय स्वराज संस्थाओं में स्त्री प्रतिनिधि ली जाती हैं, उसी तरह से अस्पृश्य मानी गई महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति के लिए उनके प्रतिनिधि उक्त उल्लेखित सारे स्थानों पर आरक्षित स्थान के माध्यम से रखे जाने की व्यवस्था सरकार क़ानून के द्वारा करे। 
  3. यह परिषद यह तय करती है कि “अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन” की स्थापना करते हुए उसके खर्च के लिए आवश्यक फंड जमा किया जाए।“विदर्भ के दलित आन्दोलन का इतिहास – एच.एल.कोसारे, पृष्ठ 444 -446

            उक्त सन्दर्भ में गौर करने लायक तथ्य यह है कि डॉ आंबेडकर दलित स्त्रियों में सामाजिक राजनितिक चेतना तो जगा रहे हैं पर महत्वपूर्ण यह भी है कि दलित स्त्रियाँ कैसे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही हैं. प्रस्ताव क्रमांक दो पर विशेष चर्चा की जानी चाहिए जब वे आपसी समझौते के आधार पर अलग हुए दंपत्ति को कानूनन अलग होने की व्यवस्था की माँग कर रही हैं. क्या ऐसी मांग और कहीं से उठी थी? सम्बन्ध-विच्छेद को क़ानूनी ज़ामा पहनने की माँग स्त्री के किस अधिकार की रक्षा करता है, क्या यह अब भी खोलने की ज़रूरत है जबकि तरह-तरह के केस न्यायालयों में स्त्री-उत्पीडन से सम्बन्धित हों?

आज सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में जिस तरह से पेंशन, आकस्मिक अवकाश, प्रसूति लाभ आदि समस्त कर्मचारी अधिकार दिलाने के लिए डॉ आम्बेडकर के नेतृत्व में स्त्रयां अतत आवाज़ उठती रहीं. दलित समाज अंग्रेजों की प्रशंसा इसलिए करता है कि इस समय ही उनके मनुष्य होने को स्वीकार्यता मिली. अँगरेज़ सरकार ने ही सती प्रथा उन्मूलन 1829, विधवा पुनर्विवाह 1856, बालिका हत्या पर पाबन्दी 1870 पर कानून बनाये. “सन 1917 में स्त्रियों ने सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में विमेंस इंडियन एसोसिएशन के तत्वाधान में सर्वप्रथम पुरुषों के बराबर मताधिकार की मांग की थी.” भारत में स्त्री समानता – गोपा जोशी पृष्ठ100 डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में दलित स्त्रियाँ विधान-मंडल और संसद में अपने लिए आरक्षित स्थान मांग रही थीं. पूना पैक्ट के सरे विवाद से परिचित ये स्त्रियाँ हिन्दुओं की चालाकी से परिचित थीं. 20 मार्च 1927 को महाड़ के चवदार तालाब के जल सत्याग्रह के बाद जिस तरह से गोबर और गोमूत्र से तालाब को शुद्ध किया गया था, यह घटना हिन्दुओं की दलितों के प्रति मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए काफ़ी थी. चवदार तालाब में दलितों को पानी पीने का क़ानूनी अधिकार सन 1936 को मिल पाया. और वह भी तब जबकि अंग्रेज सरकार थी. आज जबकि पूरा देश स्वतंत्रता का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है, दलितों, दलित स्त्रियों के उत्पीडन की जिस तरह से खबरें आ रही हैं, शर्मनाक है. शर्मनाक यह भी है कि सरकारी नौकरियों में आज भी बैकलाग बाकी है. जब सरकार का चेहरा धर्म-निरपेक्ष था, तब आरक्षित स्थानों में भारती नहीं हो सकी तो इस हिन्दू राष्ट्र की कल्पना के नक्कारखाने में अब क्या होगी? डॉ आम्बेडकर इसीलिए राजनितिक स्वतंत्रता के पहले सामाजिक समता को पर बल देते रहे.

अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद, नागपुर सन 1942 के अस्सीवें वर्ष में स्त्री सम्मान की यात्रा को देखना बिला शक़ रोमांचकारी है. जिनका कोई अस्तित्व नहीं था, उन्होंने समाज में सम्मान पाने के लिए जो संघर्ष किया, उस ज़ज्बे को नमन.

अभी मैं मुम्बई यात्रा पर थी. यहाँ एक खुबसुरत अनुभव हुआ. सभी मराठी स्त्री रचनाकार अपने जीवनसाथी का नामोल्लेख करते हुए ‘माझा जोतिबा’ कह रही थीं. सहजीवन का सबसे बेहतर आदर्श हमारे समक्ष जोतिबा-सावित्री फुले हैं. पहली बार जब मैंने श्यामल गरुड़ जी से ‘माझा जोतिबा’ यानि ‘मेरा जोतिबा’ सुना तो बहुत रोमांच हुआ. जब मैंने छाया कोरेगाँवकर जी से ‘माझा जोतिबा’ सुना, तो भी उतना ही रोमांच हुआ. पर अब सोच रही हूँ तो आनन्दाश्रु ढ़लक पड़े हैं. स्त्री जीवन को सम्मानित करने का श्रेय इसी फुले दंपत्ति को जाता है. कितना ही अच्छा हो कि ऐसे दम्पत्तियों को “फुले दंपत्ति सम्मान” दिया जाये जो मानव मात्र के जीवन स्तर को सामाजिक, धार्मिक बेड़ियाँ काटकर सतत प्रगति पथ पर ले जाने को किसी भी तरह से सन्नद्ध हों और उसे अंजाम तक पहुँचाएँ।

लेखिका का परिचय –
हेमलता महिश्वर
जसोला विहार, नई दिल्ली