स्त्री – संस्कृति का हरकारा : यू आर अनंतमूर्ती

प्रो.परिमळा अंबेकर

प्रो.परिमळा अंबेकर हिन्दी विभाग , गुलबर्गा वि वि, कर्नाटक में प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष हैं . परिमला अम्बेकर मूलतः आलोचक हैं तथा कन्नड़ में हो रहे लेखन का हिन्दी अनुवाद भी करती हैं . संपर्क:09480226677

( यूआरअनंतमूर्तीको याद करती प्रोफ. परिमला अम्बेकर )

उडुपी.राजगोपालाचार्य अनंमूर्ति का रचना संसार अपने आप में जीवन की
हर संभवित और संभावी सीमाओं को पहचानकर उन सीमाओं को तोडने की सृजनात्मक
प्रक्रिया का विराट स्वरूप है , उनके द्वारा प्रतिपादित वैचारिक कहन, हर
व्यक्ति के घर की अगली और पिछली दालानी व्यवस्था के साथ , बाहरी व्यवस्था
को समीकृत करने के टूकों को बताते हैं , और उनके द्वारा दिये गये अपने ही
तरीके के तर्क, विमर्शात्मक कथन, विवाद संवाद की अंगीठी की आग को फूॅंक
देकर हर जमीनी संवेदना को और हर प्रगतिशील सोच को जीवंत रखते हैं। देशीय
संवेदना और प्रादेशिक संस्कृति की महेक से स्पंदित यू आर अनंतमूर्ति का
रचना संसार बडी गंभीरता से राष्ट्रीय समकालीन और सार्वकालिक वास्तविकताओं
की ओर और जीवन के शाश्वत मूल्यों की ओर एक साथ, अपने मानवीयता के हाथ बढाता
है । विरोध विभाजन और विषमताओं के मध्य समन्वय, समीकरण और सामंजस्यता के
जीवन मूल्यों को खोज निकालने की पनडुब्बे की माहिरता  एवं प्रतिबद्धता
अनंतमूर्ति को हासिल थी । वर्ण ,जाति धर्म और भाषायी व्यवस्था के मूल में
निहित भारतीय मानसिकता को पहचानकर, अनुभव और चिंतन के बलबूते, मानवाधारित
मान्यताओं के तर्क प्रस्तुत करने  का तर्ज हमें , अनंतमूर्ति के जीवन और
साहित्यिक व्यक्तित्व में सहजता से मिलता है ।

कन्नड साहित्य लोक में, ये दो उपमाये अधिक प्रचलित है
एक, सनातनी  व्यवस्था के लिए अश्वथ् वृक्ष के प्रतीक का और दूसरा, जमीनी
संस्कृती की संवेदना को अपने व्यक्तित्व में रचायेबसाये , आध्यात्मिक चेतना
की ऊर्ध्वमुखी  विकास की व्यक्ति प्रज्ञा के लिए श्रवणबेलगोळ के
गोम्मटेश्वर की मूर्ति की प्रतिमा का सार्थक प्रयोग मिलता है ।  यू आर ए का
व्यक्तित्व इन उभय प्रतीकों के तात्पर्य को अपनी आंतरिक चेतना में बसाकर,
मानवीय समुदाय के विकास के लिए प्रस्तुत रहा एक कथात्मक प्रयोग लगता है ।
इसीलिए तो मूर्ति बडी सहजता से मातृ संवेदना को अपनी चेतना का हिस्सा बना
सके और मातृ संस्कृति को अपनी सोच का आधार भी। जितनी गंभीरता से यूआरए
परंपरा एवं आधुनिक प्रज्ञा पर अपनी लेखनी चलाते थे उतनी ही सहजता से वे
देशीय परिसर की संवेदना को अपनी कहानियों में चरित्र के रूप में गढते थे ।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के अपने अधिवकतव्य में जितनी जागरूकता से भूमंडलीकरण और
आधुनिकता की होड में देसी संस्कृति और भाषायी अस्तित्व के प्रश्नों से
जूझते दिखायी देते हैं उतनी ही सहजता से वे भारतीय समाज के देसीय परिसर के
संरक्षण की और मातृ संस्कृति के पोषण के  सामाजिक दायित्व की भी चर्चा करते
थे ।

यू आर अनंतमूर्ती

मातृ संवेदना का एक और आयाम है आपसी साझेदारी की
, आपसी मेलमिलाप की । आधुनिक विकास, मेट्रो कल्चर की बेरोक दौड के चलते ,
मिटते जा रहे सामाजिक आपेदारी और आपसी मेलमिलाप के संदर्भ में प्रतिक्रिया
करते मंगलूर के किसी कार्यक्रम  में उन्होने कहा था, ‘‘ हमें फिर से जुओं
की संस्कृति को गले लगाने की जरूरत है । आज हम समाज के हर वर्ग और क्षेत्र
से इस संस्कृति  को मिटता हुआ देख रहे हैं । सिर के बालो में पलने वाले
जुएॅं सामान्य नही होते। वे हमारे समाज के बडे गंभीर सामाजिक अंर्तजालिक
व्यवस्था
(Social Networking System)
के हिस्से हैं । ‘ अनंतमूर्ति  का मानना था कि, पहले, घर का सारा कामकाज
खत्म करके मुहल्ले की सारी औरतें घर के आंगन में बैठ जाती थी । बोलती थी ,
सारे जहाॅं की बातें आपस में बाॅंटती थी साथ ही साथ अपने बच्चों के बालों
में पडे जुएॅं भी बीनती थी, मारती थी । इसीलिए जुएॅं की संस्कृति दुनिया
जहान  को जोडता है, आपसी साझेदारी की भावना को बढावा देता है और तो और आपसी
बहनापे की , आपसी नोक- झोक की , आपसी सामाजिक सहयोग की मातृ संस्कृति की
ऊष्मा  को भी बचाये रखता है ।

सनातन, संप्रदाय, आध्यात्मिकता , जीवनदर्शन के  गंभीर चिंतन
और वाद विवाद में डूबी हुई  प्रबुद्ध चिंतक और साहित्यकार की लेखनी और
सोच, अपने समाज में प्रचलित सहज देसीय आचार व्यवहार को , आचरण संवेदना को
भी उतनी ही गंभीरता से परिगणित करते हुए , अतीव आधुनिकीकरणता के टक्कर में
देसीय एवं अंचलीय अस्तित्व को बचाने की ,उसे फिर से अपनाने की माॅंग रखती
है , यह निस्संदेह अतीव सहज है प्रामाणिक है, अनुभव जन्य है । जैसे कबीर की
विरहिणी , परमात्मा के प्रति के अपने हृदयस्थ प्रेम को, आध्यात्मिक दर्शन
को यूॅं इतनी सहजता से, जमीनी अहसास के साथ बाॅंटती है – दुलहनी गावहुॅं
मंलचार।घरि आये हौं राजा राम भरतार ।’ मातृ या स्त्री संवेदना , की पहचान
जितनी सहजता से मध्ययुगीन भक्त कवि कर पायें हैं ,उतनी ही सरलता से यूआरए
कर सके हैं । सारे संबंधों से ऊपर उठकर, जिस तरह मातृ हृदय, अपने कोख के
जायों की, घर परिवार वालों की, सगे संबंधियों की अपने घेराव के सारे
सामाजिक अस्तित्व की अच्छाई और प्रगति चाहता है ठीक उसी तरह मूर्तिजी का
साहित्य और विचार, बहुभाषी और संस्कृति बहुल भारतीय समाज के विकास और
सौहार्दता के पक्ष में ठहरते दिखता है।

सम्मानित होते अनंत मूर्ती

सूरदास की गोपिकायें, अपने घर आंगन में उद्धव को घेरकर बैठती हैं,
उसके सामने अपना दुखडा रोती हैं, अपने प्रेम की असहायता की बातें करती
हैं, उद्धव को बातों में भरमाती हैं , व्यंग्य कसती हैं और अंत में अपने
सगुन प्रीति की सच्चाई का, सार्थकता का , अपने प्रेम की ब्रजीय अस्मिता का
ऐलान करती है, डंके के चोट पर अपने को कृष्ण की आराधिका होने की बात कहती
हैं, उनके गणित के अनुसार उनका सगुन कृष्ण, ईशपुर काशी के निरगुन रूपपर
हजार गुना भारी पडता है । मुझे लगता है , यू आर अनतमूर्ति भी सूर की गोपिका
की संवेदना रखते हैं । उनकी मानसिक संवेदना भी वैभव भरे मथुरा की तुलना
में प्रेमनेह भरे ब्रज की मिट्टी को चाहने वाली यशोदा और गोपियों की मानसिक
संवेदना के साथ टयूनिंग रखती हैं ।  ‘हे उद्धव हमतो नंदघोष के वासी ‘के
ऐलान में छिपी आंचलीय संवेदना की तीव्रता, स्थानीय अस्मिता का अहसास,
क्षेत्र एवं प्रदेश का नाभीनाल संबंध की चेतना हमे उडुपी.राजगोपालाचार्य
अनंमूर्ति की संवेदना और सोच के संसार में मुखरित मिलता है ।

भारतीय भाषा साहित्य में ऐसे अनेको अंग्रेजी/हिन्दी प्रोफेसरों के उदाहरण मिल जाएंगे,
जो अपने अध्ययन अध्यापन की भाषा और भाषा -संस्कृति को त्यागकर, रचनाकर्म
के लिए मातृभाषा की ओर अपनी मातृसंस्कृति की ओर मुडे  हैं । बी.एम.श्री की
ही तरह , उनके बाद, कन्नड के रोमांटिक युग के कवि ( कुवेंपु कुप्पळ्ळी
वेंकटप्प पुट्टपप)  की लेखनी ,Beginner’s Muse,
से निकल तो पडती है लेकिन वे बहुत जल्द ही मातृभाषा कन्नड का पांचजन्य
फॅूंकते हैं । अंगेजी में लिखना आरंभ करने वाले अनंतमूर्ति बडी ही
प्रज्ञापूर्वक मातृभाषा कन्नड में लिखना आरंभ करते हैं । भाषा समुदाय की
पहचान, भाषायी अस्मिता की संवेदना और भाषायी संस्कृति का अहेसास और अनुभव,
किसी भी गंभीर लेखक को अपनी जडों से दूर नहीं ले जा सकते । स्थानीय भाषा
एवं संस्कृति और वतनी संस्कारों की प्रामाणिकता अनंतमूर्ति को भी अधिक समय
तक अंग्रेजी भाषा संसार में ठहरने नहीं देती । उनका यह मानना था कि ‘‘मातृ
भाषा को त्यागकर अंग्रेजी में लिखना जैसे अपने बचपन को खोना है, अपनी बीती
दुनिया से जैसे दूर लेजाना है, अपने यार रिश्तेदारों को खोना है और तो और
अपने जडों को ही खोना है । ‘‘  भारतीपुर, संस्कार, घटश्राद्ध सुरगी, सूर्यन
कुदुरे आदि कथासृजन के परिश्रम की सफलता का श्रेय उनके अनेक विमर्शक और तो
और स्वयं अनंतमर्ति जी भी अपने इन्हीं जडों की पहेचान की दृष्टि को देते
हैं ।

मातृ संस्कृति हमेशा से मातृ भाषा का पोषक  रही है । आॅंचल
का आगोश, मातृत्वता और वात्सल्यता के संवहन के लिए सर्वदा से मातृ भाषा का
समर्थन करते आयी है ।  कारण अनंतमूर्तिजी सर्वदा से  मातृभाषा में शिक्षा
देने की वकालत करते रहे थे । उनका यह मानना था कि देश में श्रेष्ठ साहित्य
का सृजन केवल मातृ भाषा में शिक्षा प्रदान करने से  संभव है । कल्पना और
सपनो के पंखों का खिलना, सोच विचार की बुद्धिमत्ता की गहनता का रोपण केवल
मात्र मातृ भाषा के व्यवहार और अभ्यास से संभव है। प्रादेशिक भाषा साहित्य
की जडों को प्रादेशिक भाषाओं की संसकृति में पहेचानते हुए मूर्तिजी कहते थे
,‘‘ साहित्य को अल्पसंख्यक  और बहुसंख्यक  जैसे धार्मिक वर्गो में बाॅंटा
नहीं जा सकता। क्यूॅं कि साहित्यकार का परिचय तो उसकी प्रोदशिक भाषा और
संस्कृति के आधार को पाती है, धर्म का वह मोहताज नहीं।‘‘ एक और गंभीर अंश
की ओर अनंतमूर्ति संकेत करते रहे थे , ‘‘ जिस तरह पहले साहित्यकार का परिचय
अंतरपा्रंतीय होता था, बंगाली के टैगोर की और कन्नड के कारंत के साहित्य
की चर्चा दूसरे प्रांतों में भी होती थी, उस संस्कृती और सोच को हमें फिर
से दोहराना है ।
विचारगोष्ठियों में अपनी प्रांतीय साहित्य के साथ साथ
दूसरे भाषा और साहित्य को स्थान देना अधिक जरूरी है.’

मोदी आये तो उन्होंने देश का दुनिया ही छोड़ दी

सुरगी कर्नाटक के ब्राम्हण संप्रदायस्थ परिवारों में प्रचलन में रही प्रथा है ।
सुरगी, हर धार्मिक एवं उत्सविक आचरणों में संपन्न होने वाली विशिष्ठ मंगल
स्नान की विधि आचरण का नाम है। विवाह, उपनयन जैसे समारोह में वधू और वर को,
उपनयन के वटु को उनके अपने कुटुंब के सदस्यों के साथ बिठाकर, चहुॅं ओर
कलशों को धागे से बांधकर , सारी सुहागिनें मिलकर मंगल स्नान कराती है ।  यह
अपने आप में अद्भुत पवित्र प्रथा है जिसके साथ हर परिवार की अपनी अनिवार्य
सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतिबद्धताएॅं बंधी हुई  होती हैं। यह सचमुच
प्रतिकात्मक और संवेदनीय है कि यूआरए  ने अपनी आत्मककथा को सुरगी का नाम
दिया है ।  दिसंबर 21, 1932 में जिला शिवमोग्गा के तीर्थहळ्ळी के घने अरण्य
प्रदेश के मेळगे गाॅव से आरंभ हुआ उनका जीवन विभिन्न सामाजिक, राजकीय एवं
साहित्यिक लोक के घेराव की जिंदगी जीते जाता है । काल चक्र की अनंतता,
वर्तमान भूत और भविष्य के चिरंतन नित्य नूतन संबंध की कडियों को अपने
अद्भुत प्रामाणिक चिंतन और भावना की सूक्ष्मता से वे जोडते जाते हैं । हर
आधुनिक सोच और भाव के पीछे के विशाल और गहन परंपरा एवं संप्रदाय के कैनवास
को अपने साहित्य में उकेरते हैं और साथ ही परंपरा एवं संप्रदाय की अतीव
कट्टर प्रतिगामी आडंबरी आयाम की निष्क़्रियता  के जडों को प्रखर व्यंग्य और
खंडनात्मक रवैय्ये  का मठ्ठा देते हैं । स्थानीय मलेनाडू प्रदेश के
अजीबोगरीब जीवन संस्कृति, वहाॅं के जीवंत चरित्र और आंचलीय जीवन व्यवस्था
एवं मान्यताओं का विशाल सृष्टि रचते हैं । सुरगी के धागों के घेर में
परिवार और संप्रदाय के संस्कारों के बंधन से लेकर , बाह्य समाज और उसकी
व्यवस्था, समाज के अपने प्रतिबंधन, उसका अपना प्रामाणिक सांस्कृतिक जीवन और
हर जनांग और समुदाय वर्ग की अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं के बंधन के धागे
भी जुडे हुये हैं । और इन सबसे बढकर धागों का एक अव्यक्त बाहरी घेराव भी
बंधा जुडा मिलता है , मानवीय जीवन बंधुत्वता का !! स्नेहमय विकासपूर्ण
संसार का !! यूआरए अपने लेखलोक में सुरगी के मंगन स्नान की पवित्रता और
श्रृजुता के माध्यम से जीवन के इन्हीं अंतरी और बाहरी प्रतिबद्धता के धेरों
के रूपक बांधते जाते हैं ।

आंतरिक संघर्षो में, भीतरी समाज- व्यवस्था के वर्ग-वर्णगत क्लेशों में,
विवादों के घेरों में सदा अपने आप को झोंकने वाले यूआरए ने  सर्वदा ही
बहुजन हिताय की सोची है । हर सोच और संवेदना के पक्ष और विपक्ष को एक साथ
परखकर विरोध के सारे संभावनाओं को प्रस्तुत करनेवाले सचेता वे रहे हैं ।
इसीलिए तो उन्होंने कहा हैं    ‘‘मैं जातिवादी ब्राह्मणों का समर्थन नहीं
कर सकता । उनके विरोधी रहे, लेकिन उनके ही जैसे ही रहे ब्राह्मणविरोधियों
का भी मैं समर्थन नहीं कर सकता । इसीलिए इन लोगों के आंतरिक कलहों में, मैं
कहाॅं अपने आप को खडा पाता हूॅं, इसका विवरण देने में ही मेरी सारी आंतरिक
शक्ति व्यय हो जाती है .’

मातृ संस्कृती का हरकारा, यू आर अनंतमूर्ति, अगस्त 22, 2014 के रोज ,
अपने जीवनरूपी सुरगी के आखरी मंगलस्नान को अग्निस्नान का रूपक प्रदान कर
गये । अनंत में लीन उस अनंत के प्रति, अनंत नमन प्रस्तुत है ……’लोचन
अनॅंत उघाडिया, अनॅंत दिखावणहार।’

सहायता सौजन्य:
1 विजय कर्नाटका , दैनिक, कन्नड पत्रिका .
2 डेक्कन हेराल्ड, दैनिक, अंग्रेजी पत्रिका .
3 कन्नड प्रभा, दैनिक, कन्नड पत्रिका .
4 विजय विहार, दैनिक, कन्नड पत्रिका .

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