बीबीसी में जातिगत भेदभाव (आरोप)

[सम्पादकीय नोट : आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव को लेकर अपनी पीड़ा, संघर्ष और अपने कटु अनुभव को व्यक्त कर रहीं हैं, भारत में बीबीसी कार्यालय में कार्यरत कर्मी जिन्हें कुछ दिनों पहले नौकरी से हटा दिया गया है. बीबीसी जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की निरपेक्ष मीडिया सत्ता प्रतिष्ठान, जो यह मानती है कि वह अपने सहकर्मियों के प्रति लिंग, जाति, नस्ल , भाषा, प्रांत आदि के आधार पर किसी तरह के भेदभाद नहीं करती और उन्हें एक बेहतर माहौल में काम करने की आजादी के साथ- ही- साथ जन सरोकारी, सत्ता विरोधी समाचार लिखने, दिखाने की प्रतिष्ठा हासिल है, वहाँ यह “अनुभव” निश्चय ही उसकी शाख पर एक गहरा काला धब्बा साबित हो सकता है. बीबीसी ने यह प्रतिष्ठा वर्षों में, कठिन और सतत परिश्रम से हासिल की है, लेकिन भुक्तभोगी का अनुभव कुछ और ही बयां कह रहा है. वह भी तब जब भारत में बीबीसी की उनकी प्रमुख एक महिला हैं. भुक्तभोगी का दावा है कि वह सिर्फ अपना अनुभव लिख रही हैं. “…….जिसमें मैं अपना अनुभव लिख रही हूं. इसमें मैंने अभी कहीं भी ये नहीं कहा है कि मैं दलित हूं इसलिए मुझे बीबीसी से निकाला गया, ना मैंने ये कहा है कि मेरे साथ कोई भेदभाव हुआ है. मैं सिर्फ़ वो लिख रही हूं जो मैंने महसूस किया. क्यों किया या मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया, ये आप ही पढकर बताइयेगा….” (मैं और बीबीसी सीरिज से इतर)

यह अनुभव मीना “मैं और बीबीसी ” सीरिज के तहत लिख रही हैं जिसमें अबतक उन्होंने दस सीरिज लिखा है. पाठको के लिये यह सीरिज चार से ( चूँकि जातिगत भेदभाव का जिक्र सीरिज चार से शुरू है) आप सब के सामने प्रस्तुत है. ]

मैं और बीबीसी-4

“आप ही मीना हो?”
“हां, क्यों क्या हुआ?”
“नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही.”
“आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?”
“नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं.”
(थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद)
“बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी.”
“मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे.”
———————–
यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया. 
बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

ये बिल्कुल शुरूआती दिनों की बात है जब मेरी शिफ्ट डेस्क पर लगनी शुरू ही हुई थी. ये बात मेरे दिमाग में खटक रही थी कि आख़िर ऐसा कोई क्यों बोलेगा और ऐसा कौन बोल सकता है?

मैंने घर जाकर ये बात सबसे पहले राजा (जो अब मेरे पति हैं) को बताई. राजा ने सुनते ही मुझे डांट दिया कि “तुम पागल हो किसी की भी बातों में आ जाती हो. कोई कुछ भी बोले तुम बस अपने काम पर ध्यान लगाओ. इतनी अच्छी जगह गई हो बस अच्छे से काम करो. कुछ नहीं रखा इन सब बातों में. बीबीसी तो कम से कम ऐसा नहीं है, जहां इस तरह के लोग हों, हां और जगह तुम्हें मिल जाएंगे लेकिन बीबीसी में नहीं. वहां लोग खुद दलित-मुस्लिम पर स्टोरी करते हैं, लिखते हैं. वहां सब अच्छे लोग हैं और इन सब बातों को परे करो यार…”

मैं ये सब सुनकर चुप हो गई और वो सब भूल गई कि किसने क्या कहा है. अब जब भी उस व्यक्ति से मिलती तो थोड़ा इग्नोर करती और वो बात तो बिल्कुल नहीं छेड़ती जिसके लिए राजा ने गुस्सा किया था. मुझे भी लगा कि शायद मैं ही ज्यादा सोचने लगी थी.

शुरू में सब ठीक चल रहा था. मैं अपनी शिफ़्ट करती, सबके साथ व्यवहार भी सही था. हां, मैं बहुत बातूनी नहीं हूं इसलिए औरों की तरह मुझे फालतू बात करनी नहीं आती. मुझे पसंद है अपना काम करना और काम से काम रखना. मैं जब तक किसी पर पूरी तरह विश्वास नहीं करती तब तक आसानी से बात करने में सहज महसूस नहीं करती. लेकिन इस वज़ह से कुछ लोग मुझ से कटने लगेगें, ये नहीं पता था. मुझे एक बार को यही कारण लगा लेकिन धीरे-धीरे समझ बात समझ में आने लगी कि इसकी वज़ह कुछ और है. और वो वज़ह वही वज़ह थी जो उस दफ़्तर के उस साधारण दलित कर्मी ने बताई थी.


मैं और बीबीसी 5

डेस्क पर काम करते हुए मुझे नौ महीने हो गए थे. कुछ लोगों का रवैया मेरे प्रति बदलने लगा था. मेरे पीछे से मेरा मज़ाक बनाया जाने लगा, मुझे उल्टा-सीधा कहा जाने लगा. मेरे प्रति कुछ लोगों की बेरुखी साफ़ दिखाई देने लगी थी. मुझे इसका एक कारण ये भी लगा कि डेस्क के लोगों को मेरी ट्रांसलेशन से दिक्कत हो रही थी, इसलिए मेरी बनाई गई कॉपी कई बार चेक तक नहीं की जाती थी, लगाना तो दूर की बात.

औरों के मुक़ाबले मेरी इंग्लिश कमजोर थी, इसलिए मुझ से कुछ ग़लती भी हो जाती थी और समय भी थोड़ा ज्यादा लगता था.

लेकिन एक दिन एक कॉपी मैंने खुद ना करके ऑफिस की ही एक सहयोगी से ट्रांसलेट करवाई. वो अच्छा ट्रांसलेट करती है. उसने बेहतरीन ट्रांसलेट किया भी था. मैं देखना चाहती थी कि क्या उस कॉपी को शिफ्ट एडिटर लगाएंगे या पहले की तरह से डंप कर दिया जाएगा! इस कॉपी को भी शिफ्ट एडिटर ने नहीं देखा. वो कॉपी एक हैंडओवर से दूसरे हैंडओवर घूमती रही. उस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा था, शायद यही वज़ह थी कि लोग उसे चेक करना तक मुनासिब नहीं समझते थे.

मैं अक्सर देखती थी कि जिस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा होता था उसे सीरियसली नहीं लिया जाता था. क्या ये मेरा वहम था! इसकी पुष्टि के लिए मैंने एक बार फिर अपनी एक सहकर्मी से ट्रांसलेट की हुई कॉपी चेक करवाई तभी उसे आगे बढ़ाया, लेकिन उस बार भी मुझे निराशा ही हाथ लगी.

कुछ लोग मुझे नापसंद करने लगे, जिस तरह मुझे और मेरी स्टोरी को इग्नोर किया जा रहा था, मैं तनाव में रहने लगी और मेरा वज़न दिन प्रति दिन गिरने लगा, जिस वजह से मुझे बहुत कमजोरी भी हो गई थी. फिर भी मैं जब भी सब से मिलती तो एक मुस्कुराहट के साथ मिलती. मैं उस सम्मान का इंतज़ार कर रही थी, जो शायद मुझे मिलना ही नहीं था. जिन आंखों में मैं अपने लिए घृणा देख रही थी, उनसे सम्मान और अपनत्व की आशा निराशा में बदलने लगी थी.

काम से ज्यादा कुछ लोगों की रूचि किसी के पहनावे, खाने, बच्चे आदि जैसे विषयों में थी. मैं इस बीच कहीं फिट नहीं हो पा रही थी. शायद मेरा काम से काम रखना भी कुछ लोगों को खटक रहा था.

मेरे साथ आए सभी सहयोगियों की शिफ्ट इधर-उधर बदल-बदल कर लगने लगी. एक बार को मैंने सोचा कि शायद मुझे कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया है, इसलिए काम करने की सीमा और शिफ्ट तय किए गए होंगे. लेकिन मेरे कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा कुछ नहीं लिखा था, ना इंटरव्यू या हायरिंग के समय बताया गया था. इसलिए एक बार मैं बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से भी मिली. मैंने उन्हें सब बताया, “सर… मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता. यहां का माहौल थोड़ा अजीब है. मुझे यहां बहुत ही नकारात्मकता महसूस होती है. मुझे लगता है कुछ तो ग़लत हो रहा है मेरे साथ.”

मैंने उनसे शिफ्ट बदलने के लिए भी कहा, जबकि मैंने अक्सर देखा था कि कुछ लोग बड़ी आसानी से अपनी शिफ्ट अपनी सहुलियत के अनुसार बदलवा लेते थे. मैं परेशान होकर जब भी रोटा बनाने वाले सर को शिफ्ट बदलने के लिए कहती, तो वो हमेशा संपादक से बात करने के लिए कहते.

संपादक जी ने भी माना था कि अगर तुम्हें यहां माहौल सही नहीं लग रहा, तो ये बीबीसी की कमी है कि तुम यहां सहज महसूस नहीं कर पा रही हो. साथ ही उन्होंने आश्वस्त किया कि वे सबसे बात करेंगे. शिफ्ट ना बदलने पर उनका कहना था कि तुम्हारी ट्रांसलेशन कमजोर है इसलिए दूसरी शिफ्ट नहीं लगाई जाती. लेकिन रिपोर्टिंग और सोशल तो लगाई जा सकती थी, ये क्यों नहीं लगी इसके लिए मैं बात करूंगा.

कुछ दिन तक सब ठीक रहा, मेरी शिफ्ट भी बदली गई लेकिन वापस वही सब होने लगा.

मुझे महसूस करवाया जाने लगा कि तुम्हें कुछ नहीं आता है.

मुझे लगने लगा जैसे एक इंग्लिश ही आपकी काबिलियत का पैमाना तय करने के लिए बनी है. रिपोर्टिंग की शिफ्ट तो लगाई गई लेकिन स्टोरी पास करवाना भी मेरे लिए किसी जंग से कम नहीं थी. मैं जो भी स्टोरी देती वो या तो रिजेक्ट कर दी जाती, या ये कह दिया जाता कि कुछ और सोचो. ये “कुछ और” मेरी समझ से परे था. जितना मैं कर पाती थी, करती थी. धीरे-धीरे मेरी सारी स्टोरी रिजेक्ट होने लगी. जब-जब स्टोरी रिजेक्ट की जाती, मेरा आत्मविश्वास भी उसके साथ गिरता चला जाता. ऑफिस के लोगों की नज़र में मुझे नाकारा महसूस करवाया जाने लगा था.


मैं और बीबीसी 6

मॉर्निंग मीटिंग में ज़्यादातर चर्चा स्टोरी आइडिया को लेकर होती है. अधिकतर स्टोरी राजेश प्रियदर्शी सर ही अप्रूव करते थे, जो बीबीसी हिंदी के डिजिटल संपादक हैं और मीटिंग में अधिकतर समय मौजूद होते थे.

मैं भी उस मीटिंग में स्टोरी आइडिया लेकर पहुंचती, लेकिन अधिकतर आइडिया रिजेक्ट कर दिए जाते. शुरू में जब मेरी स्टोरी रिजेक्ट होती तो मुझे लगता शायद मैं ही उस लेवल का नहीं सोच रही हूं, जो यहां का है. धीरे-धीरे स्टोरी कैसे पेश करनी है और कैसी स्टोरी होनी चाहिए, यह समझने की कोशिश कर रही थी.

मैंने खुद के अंदर कई बदलाव भी लाए, हर दिन कुछ नया सोच कर जाती पर बात न बनती. रिजेक्शन अब तक एक सिलसिला बन चुका था.मुझे याद नहीं कि कोई एक भी स्टोरी राजेश सर ने बिना किसी किंतु-परन्तु के पास की हो. वो भी तब पास होती थी जब मीटिंग में मौजूद अन्य लोग उसके लिए सहमत होते थे. नहीं तो अधिकतर गिरा दी जाती.

खैर, ये उनका संपादकीय अधिकार भी था. लेकिन सारे अधिकार मेरी स्टोरी पर ही आकर क्यों थम जाते थे!, पता नहीं.

मैंने उसी मीटिंग में कुछ लोगों की अपना स्टोरी आइडिया पूरा बताने से पहले ही बिना किसी कमी के पास होते भी देखा है. वे उनकी स्टोरी ना सिर्फ़ पास करते थे बल्कि ये तक कह देते थे कि आप बता रही हैं तो स्टोरी अच्छी ही होगी और हमें जरूर करनी चाहिए.

मुझे नहीं पता वो मुझे पसंद क्यों नहीं करते थे. मैंने दलितों और वंचितों पर उनके कई आर्टिकल देखे हैं. सोशल मीडिया पर भी वे वंचितों की आवाज़ बन कर कई मुद्दों पर लिखते रहते हैं. लेकिन जो सब वो लिखते थे और जैसा मैं उन्हें जान पा रही थी, वो उससे बिल्कुल मेल नहीं खा रहे थे.

मेरे लिए उनकी आखों में एक नफ़रत या घृणा जैसा कुछ था. वे जब भी मुझे देखते अपनी नज़रे घुमा लेते थे. मैं अगर उन्हें हैलो या गुड मॉर्निंग जैसा कुछ कहूं तो वे नज़रअंदाज़ कर देते थे और जवाब हीं नहीं देते थे. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में अपने डेस्क पर बैठकर काम कर रही थी तो मैंने उन्हें सुबह 9 बजे के करीब आते देखा और गुड मार्निंग कहा, लेकिन वे मुझे जवाब ना देकर आगे बढ़ गये और मेरे पीछे बैठी एक महिला कर्मी का नाम लेकर जोर से और खुशी के साथ कहते हैं, ‘गुड मॉर्निंग…’

हो सकता है कुछ लोगों के लिए ये बहुत ही मामूली बात हो लेकिन ये मेरा मनोबल गिराने के लिए एक घुन की तरह काम कर रही थीं, जो मुझे अंदर ही अंदर खोखला कर रही थी.

मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि कोई मुझसे इतनी नफ़रत क्यों कर रहा है, जबकि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया था. मैं ऑफिस में एकदम अकेला सा महसूस करने लगी थी. सबसे कटने लगी थी. किसी से बात करने का मन नहीं करता था. समझ नहीं आ रहा था कि ये सब मैं किसे बताऊं और अगर किसी को बता भी दिया तो क्या मेरा कोई विश्वास करेगा! वे काफ़ी पुराने हैं यहां पर और मैं कुछ समय पहले ही आई थी.

ये सब कोई पहली बार नहीं हुआ था, कई बार हो चुका था. लेकिन मुझे हर बार कई गुना बुरा लगता और फिर भी मैं उन्हें एक नई सुबह एक नए अभिवादन के साथ मिलती. लेकिन जब उनका जवाब मुझे उनकी फेर ली गई नज़रों में दिख जाता तो मैं हर बार की तरह खामोश हो जाती और निराशा से भर जाती.

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मैं इतने तनाव में आ गई थी कि मेरा ऑफिस जाने का मन ही नहीं करता था. मन में हमेशा यही चलता रहता था कि मेरा एक्सीडेंट हो जाए, मुझे कुछ हो जाए… बस ऑफिस ना जाना पड़े.

जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो इन सब के बारे में मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा, भारतीय भाषाओं की एडिटर रूपा झा और यहां तक कि रेडियो एडिटर राजेश जोशी को भी बताया. सबको लगा कि मुझे ही गलतफ़हमी हुई है, मैं ही जरूरत से ज्यादा सोच रही हूं. लेकिन वो दौर सिर्फ मैं जानती हूं कि मैं कैसे-कैसे उस भयावह स्थिति में थी. मेरे मन में इतना डर बैठ गया था कि कोई कुछ भी कहता तो मैं डर से सहम जाती. लगता कि कोई भी आएगा और मुझे डांट देगा.

मैं धीरे-धीरे डिप्रेशन में जाने लगी. एक बार जब मैं सुबह की शिफ्ट में थी तो आधे घंटे में ही मेरी तबियत इतनी खराब हो गई थी कि मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए. मुझे चक्कर आने लगे थे. ना बैठा जा रहा था, ना ही कोई काम किया जा रहा था. लेकिन मेरी इतनी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि मैं डेस्क पर जाकर बता दूं कि मेरी तबियत बिगड़ गयी है, क्योंकि मन में डर जो बैठा था कि कब कौन डांट दे या कुछ सुना दे. आख़िर में बहुत हिम्मत जुटा कर घर जाने की परमिशन ली. शायद थोड़ी देर और ना जाती तो मैं बेहोश होकर वहीं गिर जाती.

जुलाई, 2018 में मैंने एक सामान्य पोस्ट लिखी थी. लेकिन उसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज ने ट्रोल किया और मेरे बारे में काफ़ी कुछ लिखा, जिसे पढ़कर साफ समझ आ रहा था कि बीबीसी के ही किसी व्यक्ति ने लिखा या लिखवाया होगा. कई लोग मुझे उल्टा-सीधा कहने लगे. मेरे ऊपर अब सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे, मुझे नाकारा साबित किया जाने लगा था. मेरी जाति को लेकर भी मुझे काफी कुछ कहा गया. (नीचे उस पोस्ट का स्किनशॉट है जिसके बाद मुझे आईआईएमसी बकचोदी पेज पर ट्रोल किया गया था)

हां, मैं उन वज़हों से परेशान हो गई थी, शायद बहुत ज्यादा परेशान. कोई किसी के बारे में ऐसे कैसे लिख सकता है. ये बातें मेरे दिमाग मे लगातार चल रही थी. मन बेचैन होने लगा था. रात को ये सब सोच ही रही थी कि इतने में राजेश प्रियदर्शी सर का मैसेज आया, जिसमें लिखा था, “इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता.” मुझे कुछ समझ ही नहीं आया. इतने में उनका दूसरा मैसेज भी आया, जिसमें उन्होंने बीबीसी के एक पूर्व पत्रकार का नंबर दिया और कहा कि “इनसे बात करो ये भी दलित हैं. बीबीसी में पहले काम करते थे और अब डॉयचे वेले, जर्मनी में हैं.”

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वे मुझे ये सब क्यों कह रहे हैं. फिर समझ आया कि शायद सर ये कहना चाहते थे कि वो भी दलित हैं. लेकिन उन्होंने (शायद) यहां कभी वो सब महसूस नहीं किया जो मैंने किया है. लेकिन ये तो जरूरी नहीं कि सबका अनुभव एक जैसा हो. मैंने उन्हें फोन ना करने का फैसला किया, यहां तक कि मैंने उनका नंबर भी सेव नहीं किया और ना कभी बात करने के बारे में सोचा.

रह-रहकर बस दिमाग में यही बात आ रही थी कि सर ने ऐसा क्यों कहा कि इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता… अगर ये सच है तो इंटरनेट के जमाने में ही हम दलितों पर हो रहे अत्याचार, उत्पीड़न की खबरें क्यों करते हैं? क्यों उनके बारे में खुद वे अक्सर लिखते रहते हैं? क्यों दलितों को आज भी सम्मान नहीं मिल पा रहा? क्यों उन्हें हर चीज़ के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है? क्यों उनके नाम पर राजनीति हो रही है… आख़िर क्यों…?

चिंता-निराशा और बढ़ गई और ये सब मैंने फिर से अपने संपादकों को बताया. बार-बार बताने से भी कुछ नहीं हो रहा था. ना ऑफिस के हालात सुधर रहे थे और ना मुझे सम्मान मिल रहा था. मैं ऑफिस में दोहरी जंग लड़ रही थी. एक सम्मान की तो दूसरी मीडिया में अपनी जगह बनाने की, कुछ अच्छा काम करने की.

काफ़ी जद्दोजहद के बाद कुछ स्टोरी करने को मिली और मैंने पूरी ईमानदारी के साथ उनपर काम भी किया. कुछ स्टोरी ने बहुत अच्छा परफॉर्म किया, कई बार तो वो उस दिन और हफ्ते की सबसे ज्यादा चलने वाली स्टोरी में भी शामिल हुई. मुझे लगा कि अब तो कोई मेरे लिए दो शब्द जरूर कहेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दूसरों की स्टोरी अगर थोड़ा भी अच्छा परफॉर्म करती तो उनके लिए व्हाट्सएप ग्रुप पर भी तारीफ़ होती, ऑफिस में भी और मीटिंग में तो भर-भर के तारीफ़ों के साथ तालियां भी बजाई जाती. लेकिन मेरे लिए कभी किसी मीटिंग में या कहीं कोई तारीफ़ नहीं हुई.

इसी बीच मैं एक स्टोरी करना चाहती थी. ऑफिस में मेरी बारह बजे से शिफ्ट थी लेकिन स्टोरी सुबह की मीटिंग में पहुंचानी होती है और मैंने अपनी सहयोगी को वो बता दी थी, जिसे मीटिंग में मेरी तरफ से आइडिया बताना था. उस स्टोरी आइडिया को सुनते ही राजेश प्रियदर्शी सर कहते हैं कि “with due respect she is not well equipped to do these kind of stories.”

हो सकता था वो स्टोरी नहीं की जा सकती हो या उसे करने का कोई अलग तरीका हो. वो बात आसानी से कही जा सकती थी कि हमें इस तरह की स्टोरी करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए या इसे ऐसे-वैसे करनी चाहिए. लेकिन सभी लोगों के बीच, मेरी गैर-मौजूदगी में मुझे नाकारा और अयोग्य ठहरा दिया गया जैसे मैं कुछ करने लायक ही नहीं हूँ.


मैं और बीबीसी 8

समय के साथ-साथ मेरे मन में गुस्सा उत्पन्न होना शुरू हो गया. मुझे हमेशा से अपने आत्मसम्मान से बहुत प्यार रहा है. न्यूज़रूम में तीन बार जिस तरह राजेश प्रियदर्शी सर ने मुझे सबके सामने डांटा था, उससे मेरे आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगा था.

दूसरी बार जब उन्होंने मुझे डांटा था तो वो दो दिन बाद मुझे अकेले में ले जाकर सॉरी भी बोले थे. अगर वे सही थे तो सॉरी किस बात का और वो सही नहीं थे तो जिस तरह उन्होंने पूरे न्यूज़रूम में चिल्लाकर मुझे डांटा था वैसे ही सॉरी सबके सामने बोलना चाहिए था. खैर, ये बात तो मैं उनसे उस समय नहीं बोल पाई थी लेकिन ये सवाल तो हमेशा से मेरे मन में बना हुआ था.

आखिर में उनके इस व्यवहार से परेशान होकर मैंने अपने संपादक मुकेश शर्मा सर को कह दिया था कि मैं अपनी किसी भी स्टोरी के लिए राजेश प्रियदर्शी सर के पास नहीं जाऊंगी. मुकेश सर ने भी कहा ठीक है, तुम अपनी स्टोरी मेरे पास या प्लानिंग के पास लेकर जाना. लेकिन सिर्फ इतना भर बोलने से ये बात कैसे संभव हो सकती थी. किसी भी स्टोरी के लिए उनसे सामना करना ही पड़ता था. और मैं सबको नहीं बोल सकती थी कि मुझे अपनी स्टोरी के लिए राजेश सर के पास नहीं जाना है.

वे मेरी स्टोरी पर जरूर रूकावट डालते, कई बार मेरी स्टोरी उनके लिए महत्व नहीं रखती तो कई बार वो इंटरनेशनल लेवल की नहीं होती. लेकिन मुझे याद है प्रगति मैदान पर बने स्काई वॉल्क फ्लाईओवर की स्टोरी उनके लिए इंटरनेशनल स्टोरी थी क्योंकि वो मैंने नहीं किसी और ने प्रपोज़ की थी, जिसे वे शायद मना नहीं कर पाए होंगे. लेकिन मेरी जामिया की स्टोरी हो या ग़ाजीपुर में मुर्गा काटने पर लगे बैन जैसी कई स्टोरी थी, जिनसे पूरे देश में नहीं तो कई राज्यों में फ़र्क पड़ता है. खैर, वे स्टोरी मैंने की तो जरूर लेकिन बहुत कुछ सुनने के बाद.

मेरी तबियत लगातार बिगड़ रही थी. और ऐसे में मुझे ऑफिस के माहौल को भी झेलना पड़ रहा था. चिंता और तनाव के बढ़ने के कारण मेरी छाती में दर्द भी होने लगा था. कई डॉक्टर को दिखाया लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था. कमजोरी के साथ सांस लेने पर परेशानी होने लगी थी. पास के क्लिनिक से लेकर, मैक्स, और गंगाराम में इलाज करवाया. लेकिन आराम नहीं हो रहा था. सभी का कहना था कि चिंता और तनाव के कारण ये बीमारी बढ़ रही है. अगर चिंता करना खत्म नहीं किया तो कुछ भी हो सकता है.

लेकिन ऑफिस में अगर मैं बीमारी का ज़िक्र करती या बीमारी के चलते छुट्टी मांगती तो कुछ लोग मज़ाक करते कि ये आए दिन बीमार होती है. मुझे तो मेरी बीमारी के कागज़ दिखाने के लिए भी कह दिया गया था, जैसे मैं अपनी खुशी से बीमार पड़ रही हूं.

कई लोग ऑफिस में ही पूछते थे कि मैं इतनी चुप क्यों रहती हूं. मैं खुद को ही जवाब देती कि जिसके अंदर एक बवंडर चल रहा हो वो बाहर से शांत ही रहते हैं. लेकिन सामने वाले को एक स्माइल देकर ही चुप होना पड़ता. कई बार ऑफिस के कुछ लोगों ने बोला भी कि मीना तुम सबसे बात किया करो, अगर तुम्हारे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होता तो खाने-पीने की बात करो. मैंने उन्हें कहा कि सर मुझसे ये सब बात नहीं होती, मैं जो हूं सामने हूं.

पहले सब को मेरी ट्रांसलेशन से परेशानी थी लेकिन अब तो मेरी कॉपी हू-ब-हू पेज पर लगती थी. अगर अब कोई परेशानी थी तो मुझे लगता है जो मेरी कॉपी देखते थे उन्हीं में कमी होती थी, जो हू-ब-हू छाप देते थे. लेकिन फिर भी ना मेरी शिफ्ट में ज्यादा बदलाव हुए ना लोगों के व्यवहार में. मेरे आखिरी दिनों तक हैंडओवर में कुछ लोग स्पेशल मेंशन करते थे कि ये कॉपी मीना ने बनाई है ध्यान से देखें. यहां तक कि मुझे बीबीसी रेडियो की न्यूज़ पढ़ने के लिए भी नहीं कहा जाता, जिसे रेडिया की शिफ्ट वाला बनाकर देता था और उसे केवल लाइव पढ़ना होता था. शायद मेरी आवाज़ भी इतनी अच्छी नहीं थी या मुझे हिंदी भी पढ़नी नहीं आती थी!

किसी को कितना गिराया जा सकता है, कितना नकारा-आयोग्य बनाया जा सकता है, ये सब मैं यहां सीख रही थी. कई बार काम करने का सच में मन नहीं होता था क्योंकि मेरे काम करने पर भी लोगों की नज़र में मेरी एक छवि बनी हुई थी. जिसे मैं कुछ भी कर लूं तो भी नहीं बदल पा रही थी. अंदर गुस्से से भर गई थी, पता नहीं वो किस पर था खुद पर या हालातों पर!


मैं और बीबीसी 9

‘‘कहां से हो?’’
‘‘दिल्ली से ही, जन्म-पढ़ाई सब दिल्ली से ही हुआ है, लेकिन राजस्थान से भी संबंध रखते हैं.’’
‘‘राजस्थान..? राजस्थान में कहा से हो?’’
‘‘बूंदी ज़िले से’’
‘‘अच्छा… राजस्थान में क्या हो?’’
‘‘दलित हैं मैम’’
(गर्दन हिलाते हुए शांति-सी छा जाती है)
…………………………………………………….
ये सब मुझ से शुरूआत के दिनों में ही पूछा गया था. वे भी ऑफिस में नई थीं और मैं तो थी ही. हां, उनको कई सालों का अनुभव जरूर था. एक जाने-माने हिंदी चैनल की रिपोर्टर रही हैं और बीबीसी में सीनियर ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट के लिए चुनी गई थी.

शिफ्ट बदलवाने की काफ़ी जद्दोजहद के बाद मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला. और उन्हें भी मेरे ज्यादातर काम में कमी निकालने का. अब मेरी स्टोरी वुमन एंड यूथ डेस्क हेड और डिजिटल एडिटर राजेश प्रियदर्शी सर से होकर गुजरनी थी. मेरी स्टोरी कई बार इन दोनों के बीच में ही उलझ कर रह जाती थी. कई बार अगर वुमन एंड यूथ डेस्क हेड किसी स्टोरी के लिए मना नहीं कर पाती थीं तो राजेश सर के पास मेरी स्टोरी जाती थी. अगर वे मना नहीं कर पाते थे तो वो वुमन एंड यूथ डेस्क हेड के पास भेजते. और इस तरह मेरी स्टोरी इन दोनों के बीच में ही झूलती रहती, जैसे सरकारी ऑफिस में एक फाइल को जबरदस्ती जगह-जगह घुमाया जाता है.

कुछ ऐसी स्टोरी थी, जिन पर मैंने बहुत मेहनत की थी. लेकिन जब भी वो राजेश प्रियदर्शी सर और महिला डेस्क के पास जाती तो हर बार एक नई कमी निकल जाती.

ऐसा ही एक बार तब हुआ जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में आरक्षित सीटों पर हेर-फेर की एक स्टोरी कर रही थी, जिसके बारे में शुरू से ही पता था कि मामला क्या है और कितना बड़ा है. लेकिन बार-बार दोनों लोग बारी-बारी से पढ़ते और हर बार एक नई कमी निकाल देते. जब भी उस कमी को पूरा करके पहुंचती हूं तो एक और नई कमी. इस तरह स्टोरी को लगभग 21 दिन हो गए थे. जब आखिर में सबकी कमियों को पूरा करके स्टोरी आगे बढ़ाई तो वो स्टोरी गिरा दी गई. महिला डेस्क की मैम का कहना था कि राजेश प्रियदर्शी सर ने कहा है कि मामला ज्यादा बड़ा नहीं है. अगर मामला ज्यादा बड़ा नहीं था तो शुरू से ही क्लियर था. अगर नहीं भी पता था तो एक संपादक को एक ही स्टोरी कितनी बार पढ़कर सही करवाने की जरूरत पड़ती है! एक अच्छा संपादक एक बार में ही पढ़कर सारी कमी एक बार में ही बता देता है. एक नहीं तो ज्यादा से ज्यादा दो बार. लेकिन मेरी स्टोरी को गिराने का हर बार एक नया बहाना तैयार होता.

बीच में मैंने सीवर साफ करने से हो रही मौतों पर स्टोरी की थी. महिला डेस्क की मैम कुछ दिन की छुट्टी पर थीं और मेरी स्टोरी बिना किसी रीराइट किए पब्लिश भी हो रही थी और अच्छा परफॉर्म भी कर रही थी. महिला डेस्क की मैम मेरी हर स्टोरी में रीराइट करती थीं क्योंकि इनकी नज़र में मुझे कुछ नहीं आता था.

इनका तो यहां तक कहना था कि “देखो मैंने तुम्हें इतना अच्छा लिखना सीखा दिया कि तुम्हें आईआईएमसी से अवार्ड भी मिल गया”, जबकि उस स्टोरी में इनका रत्तीभर भी हाथ नहीं था. जिसका हाथ था, उसने सीपीएस पेज जरूर बनाया था पर सारे इनपुट मैं ही लिखकर दे रही थी. वो भी इसलिए क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी तो थोड़ा-थोड़ा लिख कर बार-बार अपडेट करना था, जो डेस्क पर बैठा व्यक्ति कर रहा था.

खैर, इनकी गैर-मौजूदगी में भी काम बहुत अच्छे से चल रहा था. महिला डेस्क की मैम जब छुट्टियों से वापस आती हैं तो मुझसे ये नहीं पूछा कि काम कैसे मैनेज हुआ या डेस्क पर कोई दिक्कत तो नहीं आई. वे मिलकर सीधा कहती हैं, ‘‘तुम क्या इसी तरह (यानि दलितों से जुड़ी स्टोरी) की स्टोरी कर के अपनी पहचान बनाना चाहती हो. एक कर ली ठीक है, लेकिन अब क्या बार-बार ऐसी स्टोरी करोगी?’’ उनके इस सवाल पर मैंने जवाब देना भी सही नहीं समझा लेकिन सवालों से भरी एक स्माइल जरूर दे दी.

मैं समझ गई थी कि मैं यहां कितना भी अच्छा काम कर लूं, लेकिन लोगों को वही सोचना है जो वो सोचना चाहते हैं. इनका व्यवहार भी मेरे लिए बहुत अच्छा नहीं रहा है. हां, ये हाय-हेलो, हाल-चाल सब पूछती जरूर थी, लेकिन उसमें फॉर्मेलिटी दिखाई देता था, अपनत्व नहीं. वे शायद मुझे पसंद नहीं करती थी. जिनके अगर मैं उदाहरण दूं तो वो बहुत छोटे किस्से हो सकते हैं, लेकिन समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है.

हालांकि इन्होंने एक-दो बार बोला भी कि मीना तुम्हें जो परेशानी हो मुझ से साझा कर सकती हो. लेकिन जिनसे शिकायत हो उसी के पास शिकायत लेकर नहीं जाया जाता, तो आपसे क्या ही बताऊं मैम (ये मैं खुद ही मन में बात करती).

मेरी कई स्टोरी करवाने के बाद गिरा दी गई. ऐसा करके वे साबित भी कर देते कि मुझे कुछ नहीं आता और मेरा आत्मविश्वास भी गिरा दिया जाता. मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर इन्हें चाहिए क्या! जो कहते थे वो कर देती थी फिर भी हर बार एक नई कमी, नया सवाल तैयार रखते थे ताकि कहीं तो मैं हार मान लूं. अगर तब भी ऐसा नहीं होता तो स्टोरी गिराने का हथियार इनके पास होता ही था.


मैं और बीबीसी 10

आज मैं पिछला नहीं बल्कि कल की ही एक ताज़ा सूचना से शुरू करना चाहूंगी. कल मुझे पता चला कि मिस्टर झा ने बीबीसी से इस्तीफ़ा दे दिया है. जैसे ही मुझे पता चला चंद लोगों के लिए रही सही इज्जत भी मेरे दिल से खत्म हो गई. कुछ लोगों पर बहुत विश्वास किया था, जिन्हें मैंने अपनी परेशानी का हर मामला सबसे पहले बताया था और वो मुझे सिवाये आश्वासन के कुछ नहीं देते. हालांकि विश्वास और इज्जत की परत धीरे-धीरे उतरती गई और आज रही सही भी, सब पूरा साफ़ हो गया.

इस सूचना का ज़िक्र इसलिए करना जरूरी है क्योंकि बीबीसी की तरफ़ से आधिकारिक बयान यही दिया जा रहा है कि मेरा कॉन्ट्रैक्ट इसलिए खत्म किया गया क्योंकि मिस्टर झा वापस आ रहे हैं, जिनकी जगह मुझे रखा गया था. वे दो साल की एजुकेशन लीव पर थे.

लेकिन कल अचानक पता चला कि वे तो इस्तीफ़ा दे चुके हैं और ये इस्तीफ़ा उन्होंने कल नहीं बल्कि तीन महीने पहले ही दे दिया था (जिसका दावा मैं नहीं कर रही). मान लिया अगर तीन महीने पहले नहीं भी दिया होगा तो संपादक पदों पर बैठे अधिकारियों को इसके बारे में पूरी जानकारी होगी, क्योंकि अचानक कोई इस्तीफ़ा नहीं देता. एक छोटे से संस्थान में भी महीनाभर पहले बताना अनिवार्य होता है और फिर ये तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान है. इसलिए मैं तो बिल्कुल नहीं मान सकती कि इस्तीफ़े की बात अचानक मेरे जाने के बाद पता चली.

जबकि मुझे कल ही वो बात भी याद आई जब मुझे किसी ने कहा था कि मिस्टर झा वापस नहीं आएंगे क्योंकि वो बीबीसी छोड़ रहे हैं. उस समय मैंने उनकी बात हल्के में ले ली क्योंकि मुझे लगा अगर ऐसा होगा तो सबसे पहले संपादक को ही पता चलेगा. वे हमेशा कहते थे, ‘‘मिस्टर झा आ रहे हैं इसलिए कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर रहे हैं और अभी हमारे पास कोई नई वैकेंसी भी नहीं हैं, जिसकी जगह रखा जाए.’’ मुझे भी नोटिस तीन महीने पहले ही पकड़ाया गया था यानि अगर मैं सही समझ रही हूं तो पहले मिस्टर झा से कंफर्म किया होगा और उन्हें इस इस्तीफ़े वाली बात को बाहर ना बताने के लिए कहा होगा ताकि मुझे उनके आने का हवाला दे कर निकालने में आसानी हो. तब जाकर पूरी सोची समझी साजिश की तहत इस मामले को पूरे ऑफिशियली ढंग से अंजाम दिया गया है.

लेकिन मेरे बाद भी वहां जॉइनिंग हुई है. मुझे तो ये भी नहीं बताया गया था कि मैं कॉन्टैक्ट पर रहने के बाद अप्लाई कर सकती हूं या नहीं. लेकिन मैंने उसी ऑफिस में अपने संपादक को कई लोगों के पास जाकर ये कहते हुए जरूर देखा है कि ‘‘अरे नई पॉस्ट आई है तुम भर रहे हो ना, अरे नया अटैचमेंट आया है अप्लाई किया या नहीं.’’ हां, ये बात भी सही है कि मैंने खुद जाकर उनसे क्यों नहीं पूछा, वो इसलिए क्योंकि बीबीसी में रहकर इतना तो पता चल ही गया कि यहां पहले लोगों को पसंद किया जाता है, उन्हें सिलेक्ट किया जाता है और फिर उनके लिए वैकेंसी निकाली जाती है और ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि बीबीसी का एक गार्ड भी जानता है.

मुझे अपने मामले में ऐसी कोई सकारात्मक रवैया नहीं दिख रहा था. जिस संस्थान में मैं अपने सम्मान की लड़ाई लड़ रही थी, जहां मैं अपनी पहचान बनाने के लिए गई थी, जहां मैं चाह रही थी कि लोग मुझे भी एक्सेप्ट तो कर लें. ये सब हो पाता तो ही ना मैं कुछ और सोच पाती! इन्हें मुझे रखना होता तो कुछ कर के रख लेते फिर किसी मिस्टर झा के आने का बहाना ना बनाना पड़ता लेकिन सवाल तो यही है कि इन्हें मुझे रखना ही नहीं था.

नोट: इस पोस्ट से यह निष्कर्ष बिल्कुल न निकाला जाए कि मैं बीबीसी की नौकरी वापस पाना चाहती हूं या फिर मैं बीबीसी से निकाले जाने से खफ़ा हूं. मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मेरी लड़ाई न्यूज़ रूम में भेदभाव के ख़िलाफ़ है. बीबीसी में शुरुआत से ही मेरी लड़ाई एक्सेप्टेंंस की रही है. मेरा ये अनुभव उसी लड़ाई का हिस्सा है. यहां मैं ‘निकालने’ जैसे शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रही हूं क्योंकि अब तो मुझे भी यही लग रहा है, जबकि इससे पहले मैंने कहीं नहीं कहा था. जारी……

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