ब्राह्मणवादी पितृसत्ता पर बहुजन लेखिकाओं ने की बातचीत: बहुजन साहित्य संघ का आयोजन

डॉ. मिथिलेश, आरती यादव, कनकलता यादव और कविता पासवान

27 और 28 सितम्बर 2019 को ‘बहुजन साहित्य संघ’के तत्वाधान में आयोजित‘बहुजन महिला सम्मेलन’ का आयोजन जे.एन.यू. नई दिल्ली में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। महिला वक्ताओं ने बहुजन समाज की जटिलताओं और अंतर्विरोधों पर अपनी बात रखी और आज की परिस्थितियों को देखते हुए बहुजन एकता पर बल दिया ताकि देश की विभाजनकारी शक्तियों से लड़ा जा सके ।

पहले दिन‘आदिवासी महिला’ विषय पर परिचर्चा हुई । पैनल चर्चा में गोमती बोदरा, आईसां उरांव, स्नेहलता नेगी, आईवी हांसदा आदि ने भाग लिया और उन्होंने आदिवासी दर्शन, समाज के साथ नवपूँजीवादी संक्रमण के तहत आदिवासी स्त्रियों की समस्यायों पर बातचीत की । नेगी जी ने लद्दाख के किन्नौरी समुदाय की विशिष्टताओं, संस्कृति से हमें परिचित कराया । गोमती जी ने झारखण्ड के सन्दर्भ में नशाखोरी, जमीन के मुद्दे पर अपनी बात रखी। प्रीति मरांडी जी ने आदिवासी पत्रिका के हवाले से झारखण्ड के संथाल स्त्रियों की समस्यायों को रेखांकित किया । आदिवासी स्त्रियाँ सशक्त हैं। वह अपने निर्णय काफ़ी हद तक स्वयं ले सकती हैं, कभी कभी उनकी सशक्तता ही उनकी कमज़ोरी बन जाती है । उनके सरल, सहज स्वभाव का मतलब गैर आदिवासी गलत अर्थों में लगाते हैं और उनकी आज़ादी को भी गलत अर्थों में लेते हैं । अनीता मिंज जी ने यह बताया कि किस प्रकार आदिवासी स्त्रियों की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ़ दैहिक सम्बन्ध तक सीमित समझ लिया जाता है जबकि वह अपनी स्वतंत्रता को जीती हैं । उनके रोजमर्रा के अभ्यास में यह शामिल होता है । वह मुख्यधारा की स्त्रियों से ज़्यादा स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं, यहाँ उस प्रकार की समस्याएँ नहीं हैं जो दलित स्त्रियों की समस्याएँ हैं ।

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मेरी पूर्ति जी ने कामगार आदिवासी महिलाओं से संबंधित समस्यायों पर अपनी बात रखी तथा उनके दैहिक, आर्थिक शोषण को रेखांकित किया । दलालों के द्वारा घरेलू काम के लिए लाई गईं इन आदिवासी स्त्रियों को उनके काम के पैसे भी नहीं मिलते । जागृति पंडित ने डायन प्रथा के पहलू पर बात करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह बाहर से आदिवासी समाज को कमज़ोर करने के लिए लाया गया एक टूल है जिसमें उसी स्त्री को शिकार बनाया जाता है जो सबसे सशक्त होती हैं । दलित आदिवासी के अंतर्संबंध पर प्रियंका सोनकर जी ने अपनी बात रखी और दलित समुदाय की स्त्रियों के शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ेपन का कारण ग़रीबी और पितृसत्ता को माना ।

आदिवासी समाज की मुख्य समस्या जीविका से जुड़ी हुई है। हर समुदाय की अलग-अलग परम्पराएँ और रीति रिवाज हैं लेकिन जो चीज़ सारे आदिवासी समुदायों में देखने को मिलती है, वह है उनका जीवन दर्शन । जो प्रकृति पर निर्भर है और उसी में वह रहना पसंद करते हैं । ज़ंगल, पशु, पक्षी उनकी जीवन-शैली का हिस्सा हैं और जब मुख्यधारा की विकास की अवधारणा वहाँ पहुँचती है तो वह अपने नियम उस समाज पर थोपने की कोशिश करते हैं ।

दूसरे दिन राउंड टेबल कार्यक्रम का संचालन सविता माली ने निराला की काव्य पक्ति ‘वह तोड़ती पत्थर’ से करते हुए किया कि जो स्त्री मौन होकर पत्थर तोड़ रही थी, उस स्त्री ने आज बोलने का साहस किया हैं। वक्ताओं में डा. मिथिलेश, डॉ. शीला, पूनम गुप्ता, सोनम मौर्या, रेणु चौधरी, रेणु चौहान, ललिता बघेल और आरती यादव इत्यादि ने बहुजन समाज की एकजुटता की आवश्यकता पर जोर  देते हुए बहुजन स्त्रीवाद की जरूरतों पर भी बल दिया।

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डॉ. मिथिलेश ने 20 वीं शताब्दी की लेखिका चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की कहानियों के माध्यम से दलित-मुस्लिम समाज में व्याप्त गरीबी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए उसे समकालीन समस्यायों से जोड़ा । 20 वीं शताब्दी में दलित वर्ग की महिलाएँ जिन समस्याओं से जूझ रही थीं, 21वीं शताब्दी में भी उन्हीं सब समस्याओं से जूझती हुई नजर आ रही हैं ।उन्होंनेजातिवादी ढाँचेको तोड़े जाने पर बल दियाऔर सामाजिक-राजनीतिक एकता की आवश्यकता बतलाई ।पूनम गुप्ता ने ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा अलग- अलग जाति और धर्मो में बाँट दिए गए बहुजन समाज की महिलाओं-पुरुषों को एक मंच पर आकर अपनी समस्याओं को एक दूसरे से साझा करना और उसका समाधान करना बहुजन साहित्य संघ का उदेश्य बताया ।बहुजन पुरुषों को अपने पितृसत्तात्मक संस्कारों को छोड़कर आगे आना चाहिए । आरती यादव ने 19 वीं शताब्दी के साहित्य में बहुजन स्त्रियों की अनुपस्थिति का सवाल उठाया और उस क्षेत्र में शोध कार्य किये जाने की महती आवश्यकता बताई । इसी क्रम में हिन्दू शब्द पर बात करते हुए ये कहा कि हिन्दू या हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवादी विचारों का ही प्रसार करने की चाल को गहराई से समझने की ज़रूरत है।सोनम मौर्या ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए पिछड़े वर्गों में व्याप्त जातिवादी विकृतियों के बारे में अपनी बात रखी । पिछड़ी जातियों में जिस तरह से ब्राह्मणवादी व्यवस्था का दख़ल है, इस पर सोनम ने बहुत गम्भीरता से प्रकाश डाला ।रेणु चौहान ने दलित जीवन के संघर्षों को अपने अनुभव के आधार पर साझा करते हुए मुहावरा और लोकोक्तियों के माध्यम से हरियाणवी समाज की स्त्रियों की बेबाकी को रेखांकित किया । उन्होंने बहुजन समाज को एक अम्ब्रेला के नीचे आने की अपील की ताकि आज की परिस्तिथियों में एक साथ मिलकर लड़ा जा सके|

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कार्यक्रम के दूसरे सत्र पैनल डिस्कशन में अनीता भारती, रजनी अनुरागी, आफ़रीन, स्नेहाशीष, राबिया नाज़ और नीतिशा ख़लखो ने बहुजन स्त्रियों की समस्याओं पर प्रकाश डाला । अनीता भारती जी ने यह प्रश्न रखा कि जिस तरह से दलित साहित्य का अपना कुछ खास उद्देश्य है क्या बहुजन वैचारिकी भी किसी खास उदेश्य को लेकर है? क्या जिस तरह से दलित साहित्य ने ईश्वर की सत्ता को नकारा है, बहुजन समाज के अन्य लोगों में भी ईश्वर की सत्ता को न मानने का साहस है? उसका स्रोत क्या होना चाहिए? इन सवालों के माध्यम से बहुजन वैचारिकी के अंतर्विरोधों के साथ उसकी जरूरतों पर भी बल दिया । मुख्यधारा के इतिहासकारों ने दलित, मुस्लिम, पिछड़ी, आदिवासी  समाज की समस्याओं और इतिहास में उनकी उपस्थिति को नज़रअंदाज किया है अत: आज यह ज़रूरी हो गया है कि बहुजन समाज की नायिकाओं/ नायकों के संघर्षों को सामने लाया जाए और यह काम बहुजन के मंच से बखूबी किया जा सकता है।

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रजनी अनुरागी जीने स्त्रियों को संसाधनों से बेदख़ल करने की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इस बात पर जोर दिया कि स्त्रियों को भी संसाधनों पर अधिकार दिया जाना चाहिए ।आफ़रीन जी ने सत्ता द्वारामुस्लिम समाज को राजनैतिक कुचक्रों का शिकार बनाये जाने और मौलिवियों द्वारा इस्लाम की आधी-अधूरी व्याख्या किए जाने पर रोष जताया।  राबिया नाज़ जी ने उर्दू साहित्य के माध्यम से मुस्लिम समाज की स्त्रियों की समस्याओं को उठाने का प्रयास किया । मीना कोटवाल जी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में दलित स्त्रियों के साथ हुए भेदभाव पर अपनी बात रखी । उन्होंने कहा कि आज भी अपनी दलित पहचान की वजह से दलित समाज को तिरस्कार झेलना पड़ता है। स्नेहाशीष ने यह सवाल किया कि आख़िर वह कौन सी ताकत है जो हमें यह बताती है कि हम स्त्री या पुरुष हैं? उन्होंने कहा कि जाति की वैचारिकी पर ही जेंडर विभाजन हुआ है। इसलिए यह जरूरी है कि जाति व्यवस्था को ख़त्म किया जाए।

आजकल की ख़बरों में जो इस प्रकार की घट्नाओं को दिखाया जाता है कि आदिवासी की हत्या ओबीसी कर रहा है और इनको एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है । इस पर भी प्रश्न-सत्र में परिचर्चा की गयी और ये निष्कर्ष निकाला गया कि सत्ता वर्ग किस प्रकार बहुजन एकता को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है । हमें इन सत्ताधारी सर्पों से सचेत रहने की ज़रूरत है । यह वक़्त की ज़रूरत है कि तमाम मतभेदों के बावजूद आपसी संवाद और राजनीतिक एकता बेहद ज़रूरी है तथा सत्ता तंत्र के बिछाए जाल से बचने की ज़रूरत है ।

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