गिरह

नवल किशोर कुमार
(लेखक फारवर्ड प्रेस, दिल्ली के हिंदी संपादक हैं)

यार विजय, यह बहुत अच्छा है कि तुम आज की पीढ़ी के साथ इतना अच्छा तालमेल बिठा लेते हो। नई पीढ़ी चाहे जैसे जिये, उन्हें आजादी मिलनी ही चाहिए। कहां एक हम थे कि न बचपन अपने हिसाब से जी सके, जवानी का तो पता ही नहीं चला कि कब आयी और कब जिम्मेवारियों का बोझ देकर बिना बताये रूखसत हो गयी। मान गए बॉस, तुम क्या शानदार जीवन जी रहे हो।
ऐसा नहीं है साथी। बीयर का एक लंबा घूंट हलक में उतारने के बाद विजय ने शंकर से कहा। जिम्मेदारी तो मेरे पास भी है। सुगंधा की जिम्मेदारी तो है ही। अभी तो वह कॉलेज गयी है। कुछ पढ़-लिख जाय तो उम्मीद बने। लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि सुगंधा जैसी आज की लड़कियों को आजादी मिलनी चाहिए। सबसे पहले पहल परिवार के लोगों को करनी चाहिए।

विजय का स्वभाव ही ऐसा है। हरदम अपने विचारों को जीने वाला। जैसा सोचता है वही करता भी है। शंकर उसके स्वभाव को जनता है। अभी दो दिन पहले ही तो विजय ने उसे अपनी नयी प्रेमिका से मिलवाया था। सचमुच ऐसा कहां होता है कि किसी पुरूष की प्रेमिका को उसकी पत्नी भी मान-सम्मान दे। शंकर मन ही मन विजय से ईर्ष्या भी करता है।
अच्छा यार विजय, यह सब कैसे कर लेते हो। उस दिन तुम जब अपनी महबूबा के साथ थे कितने अच्छा लग रहे थे। क्या भाभी को कोई ऐतराज नहीं होता? शंकर ने कबाब के बड़े टुकड़े को जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए कहा। यार शंकर छोड़ो यह सब। परिवार में सबको आजादी मिलनी चाहिए। मैं तो इसी में विश्वास करता हूं। जिसको जैसे जीना है जिये। हां, विश्वास जरूरी है। विश्वास है तो प्रेम का आधार हमेशा मजबूत रहता है।

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अच्छा तुम यह बताओ कि जम्मू-कश्मीर में जो इन दिनों चल रहा है, उसको लेकर तुमने कुछ लिखा या नहीं? क्या लिखना है? पार्टी ने तय किया है कि वह 370 के हटाए जाने का विरोध करेगी। सो मैं भी कर रहा हूं। इंडियन एक्सप्रेस में कल ही तो मेरा बयान छपा है। शंकर ने जवाब दिया, बधाई दोस्त। इंडियन एक्सप्रेस में बयान छपना इम्पोर्टेंट है। अब तुम पक्का लीडर बन गए। एक बीयर और पीते हैं इसी बात पर। बीयर पीना है तो पी लो। लेकिन यह वैसी बात नहीं है। तुम भी तो रहे हो पार्टी में पन्द्रह साल। जानते ही हो कि पार्टी का व्यवहार कैसा होता है। इस बार तो हमको आश्चर्य हुआ जब कहा गया कि सतीश पांडे के बजाय मैं पार्टी की ओर से बयान जारी करूं। जानते हो इसका मतलब क्या है? शंकर ने आधी सिगरेट को जबरदस्ती ऐश-ट्रे में डालते हुए कहा।

स्साला सतीश पांडे को अब भी भाव मिलता है पार्टी में! मैंने तो उसी के कारण ही पार्टी को छोड़ा। धारा 370 का विरोध पांडे नहीं कोई दलित करे तो इसका मतलब बनता है। राजनीति भी बड़ी कमीनी हो गयी है। हम लाल झंडा ढोते रहते हैं और यह जानते हुए कि आजकल लाल और भगवा में बहुत अधिक फर्क नहीं रह गया है। कम से कम जाति के सवाल पर।

विजय का घर दिल्ली के पॉश इलाके में है। किराया अधिक है लेकिन विजय को अच्छा लगता है इस मुहल्ले में रहना। यहां से न संसद दूर है और न दिल्ली विश्वविद्यालय। दूसरे मुहल्लों में कई समस्याएं होती हैं। या तो वे अल्ट्रा पॉश हैं या फिर लक्ष्मीनगर जैसा स्लम। कुल मिलाकर साकेत ठीक है रहने के ख्याल से। खाना खाओगे या खाकर आए हो? शांति ने विजय से पूछा। खाऊंगा लेकिन जरा देर से। सुगंधा का फोन आया था क्या? आज उससे बात न हो सकी। फोन नहीं लग रहा था। विजय ने जवाब देते हुए सवाल किया। हां, दोपहर में उसने फोन किया था। जयपुर से उदयपुर जा रही थी। उसका फोन चार्जर होटल के कमरे में छूट गया है। शांति ने खाने की प्लेटें साफ करते हुए कहा। उसके पास पैसा है न? मैंने पहले ही उसको कहा था कि दस हजार रुपए और ले जाये। गिलास में व्हिस्की डालते हुए विजय ने कहा। अच्छा लगता है सुगंधा को वह सब करते देखते जो हम और तुम कभी नहीं कर सके। धत्त। माथा पर चढ़ा रहे हो सुगंधा को। एक दिन पछताओगे जब वह उलटकर तुमसे सवाल करेगी। मुझसे तो वह कई बार मुंह लगा चुकी है। मैं तुमसे कहना चाहती थी। लेकिन क्या फायदा। तुम्हारा प्रोग्रेसिव वाला हैश टैग मुझे हर बार रोक देता है। मेरी मानो तो प्रगतिशील होना अच्छी बात है। लेकिन बहुत तेज छलांग लगाना अच्छी बात नहीं है। शांति ने कहा। तुम कहना क्या चाहती हो? क्या सुगंधा को उन्हीं बेड़ियों में कैद कर दूं जिन बेड़ियों में तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें कैद कर रखा था? जरा फ्रीज से ठंढा पानी तो दे देना।

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विजय, मैं मानती हूं कि मेरे माता-पिता के ख्याल तुम्हारे जैसे नहीं थे। लेकिन पिछले बीस सालों से तो मैं तुम्हारे साथ ही हूं। तुमने जैसा चाहा, वैसी ही तो रही हूं। क्या अब भी कहोगे कि तुमने मुझे बेड़ियों में नहीं कैद किया? तो क्या मैंने तुम्हें गुलाम बना रखा है? किस बात की गुलामी है तुम्हें? क्या मैंने कभी जबरदस्ती कुछ किया? तुम जो करना चाहती थी, वह तुमने किया।  जरा मैं भी तो सुनूं कि मैंने तुम पर क्या-क्या थोपा है? विजय ने शांति से कहा। यह जो तुम रोज घर में आकर करते हो, क्या इसे थोपा जाना नहीं कहा जाना चाहिए। ड्रिंक लेने से मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं, लेकिन घर में पीने से सुगंधा पर इसका असर पड़ रहा है। अब तो वह भी पीने लगी है। ट्रिप पर जाने से पहले वह अपने दोस्तों के साथ घर पर ही पी रही थी। उसके दोस्तों में वह लड़का भी था।
अरे वाह! मुझे नहीं पता था कि सुगंधा भी पीती है। कल उसके लिए स्पेशल वाइन ले आऊंगा। शांति सोचने और जीने की यही स्वतंत्रता तो मैं उसे देना चाहता हूं। भले ही मैं उसके लिए जमीन-जायदाद न दे सकूं, लेकिन एक बेहतर जीवन जरूर दूंगा। मुझे तुमने क्या दिया है अब तक जो तुम उसे दोगे? तुम पुरूष हमेशा दाता बने रहना चाहते हो।

गजब की जबरदस्ती है तुम लोगों की। मुझ जैसी महिला तुम्हारे इस दोहरे व्यवहार पर न इतराये तो तुम्हारी प्रगतिशीलता की पोल न खुल जाएगी। शांति ने कंघी से अपने बालों को सुलझाते हुए कहा। यह गलत है शांति। मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं। मुझे हमेशा लगा कि तुम्हें यह सब पसंद है जो मैं कर रहा हूं। अब जब तुम कह रही हो तो जरा यह भी बताओ कि मैंने तुम पर और क्या-क्या थोपा है?
छोड़ो यह सब। खाना खाते हैं। तुम्हारे लिए स्पेशल सब्जी है आज। तुम्हारा मटन भी गरम कर दिया है। शांति ने डायनिंग टेबल पर प्लेटें रखते हुए कहा।
नहीं, पहले बताओ। विजय ने दुबारा कहा।
क्या यह थोपा जाना नहीं है? अभी मेरी इच्छा खाने की है और तुम मुझे तुम्हारे द्वारा मुझ पर लादी गयी रस्सियों के गिरहों के बारे में बताने को बोल रहे हो। तुम्हें मेरी इच्छा का ख्याल रखना चाहिए। क्या तुम्हारी प्रगतिशीलता में यह शामिल नहीं है?

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