कला-संस्कृति

‘स्‍त्री’ : एक सार्थ‍क हॉरर फिल्‍म

यह फिल्‍म जहाँ हमें इस प्रकार के अंधविश्‍वासों से ऊपर उठकर तार्किक बनने की ओर प्रवृत्‍त करती है, वहीं यह एक स्‍त्री भूत को केंद्रीय पात्र बना प्रेम की आजादी चाहने वाली लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ आज के दौर में लगातार बढ़ते खाप पंचायतों सरीखे आतंक और सामूहिक बलात्‍कार जैसे पाश्विक अपराधों की ओर भी इशारा कर जाती है।

लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के...

उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।

जब प्रलेस के बड़े लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की

अब तो दोनों ऐसा शोर मचाने पर उतारू हुए कि दो कलाकारों ने तो कार कर दिया. एक जो हिम्मत करके गाने बैठी तो ‘ फूल नोचो, फूल फेंको’ की जैसे दोनों में बाजी लग गई. इस बार सिर्फ गायिका पर ही नहीं, आसपास बैठे लोगों पर भी फूल बरसने लगे. अब पाकिस्तानी मर्दों में भी कुछ बेचैनी दिखाई दी.ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी बहनों, पत्नियों के शौक को दबा देने के बजाय उसे पनपने के मौके दिए थे. इन्हें ख़ुशी थी कि इनके घर की औरतें सर्फ आलिशान बंगलों में बैठकर बनती-संवारती नहीं रहतीं हैं, अपने हुनर को म्हणत और रियाज से निखारने की कोशिश करती हैं.

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से...

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे...

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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