दो लाख ले लो और मेरा पति लौटा दो: महाराष्ट्र सरकार से किसान विधवायें

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशकों के छिडकाव से मारे गये किसानों की विधवायें भीख मांगकर सरकार को दो लाख रूपये देना चाहती हैं,...

क्रान्ति के कपड़े

अर्चना वर्मा अर्चना वर्मा प्रसिद्ध कथाकार और स्त्रीवादी विचारक हैं.  ई मेल :  mamushu46@gmail.com 2007 के अन्तरराष्ट्रीय -वाणिज्य-मेले के समय 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में एक...

जन्मदिन पर झूठ, फर्जी जश्न और निर्दोषों का घर-बदर: क्या खूब मोदी जी!

1. सरदार सरोवर बाँध की ऊँचाई 138.68 मीटर है और वह 1979 में नर्मदा ट्रिब्यूनल में दिए गए फैसले के        ...

दिल्ली में नाइजीरियन यौन- दासियाँ

OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE OLUTOSIN OLADOSU ADEBOWALE  स्त्री अधिकार कार्यकर्ता हैं, नागारिक पत्रकार हैं. वे बच्चों पर यौन हिंसा के खिलाफ काम करती हैं...

मेधा पाटकर का सरकारी उत्पीड़न जारी

  नर्मदा बचाओ आंदोलन  1.मेधा पाटकर को इंदौर के बॉम्बे हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के चार घंटे बाद, इंदौर से बड़वानी जाने के क्रम में...

जजिया कर से भी ज्यादा बड़ी तानाशाही है लहू पर लगान

संपादकीय  सोचता हूँ कि सैनिटरी पैड पर लगाया जाने वाला टैक्स क्या पुरुष लिंग के अहम से उपजा निर्णय नहीं है? क्या निर्णय लेने वाली...

जीएसटी इम्पैक्ट: क्या महिलायें भेजेंगी वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को सैनिटरी पैड (!)

आधी रात को देश की आर्थिक आजादी का बिम्ब रचते हुए 30 जून की रात 12 बजे देश में एक टैक्स क़ानून, जीएसटी (...

उद्योगपति जिंदल ने जमीन हासिल करने के लिए एक आदिवासी महिला और उसके...

मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है कि क्या हुआ था. लेकिन जब मुझे होश आया, तो मैंने खुद को बेबस पाया, आँखों पर पट्टी थी, और दोनों हाथ बिस्तर से बंधे थे। कुछ लोग एक दुसरे को मैनेजेर डाइरेक्टर कह कर बात कर रहे थे. मैं चिल्लायी, एक आदमी ने दौड़कर पास आया और धमकी दी - 'तुम्हारी जमीन का एक हिस्सा पहले से ही हमारे कब्जे में है, कलेक्टर को पत्र लिखो कि अपनी बाकी जमीन भी हमें दे रही हो।जब मुझे उसने झकझोरा तब मुझे पता चला कि मेरे शारीर पर कपडे नहीं हैं. आँखों पर मेरे पट्टी बाँधी गई थी. उन्होंने मेरे साथ गन्दी हरकतें की. वे मेरी हाथों में अपना गुप्तांग पकड़ा रहे थे.
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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