कविता की प्रकृति ही है समय से आगे चलना

इन प्रमुख प्रगतिशील कवियों के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था और साहित्‍य में प्रमुख रूप से जनवादी चेतना और फासिज़्म के विरोध के पीछे भी प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था। राजसत्‍ता, राजतंत्र के ख़िलाफ़ जनवादी आवाज़ का उठना ही तत्‍कालीन स्थिति के आधार पर बड़ी बात थी। 1942 की अगस्‍त क्रांति, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का रूस समेत मिश्र राष्‍ट्रों का और एक तरह से ब्रिटिश सरकार का ही पक्ष समर्थन करना, इसी बीच बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, इस तरह देखा जाए तो 1939 से 1946 तक का दौर अनेक प्रकार के जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रश्‍नों का दौर बन गया।

ग्राम्य जीवन का दस्तावेज़ :चिरकुट दास चिन्गारी

हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष राजेंद्र यादव ने एक दफा कहा था, ‘घर में जो स्थान नाली का है, साहित्य में वही स्थान गाली का है.’ इस बयान का यह अर्थ नहीं कि राजेंद्र जी गाली का समर्थन करते थे, बल्कि यह कि अगर कहानी के पात्र गाली दे रहे हैं, तो लेखक की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पात्रों की ज़बान न काटे.

पंखुरी सिन्हा की कविताएं (घास पटाने के मेरे बूट व अन्य)

पंखुरी सिन्हा युवा लेखिका, दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, तीन हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह।

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द...
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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।