हिन्दी नवजागरण और स्त्री प्रश्न

सुरेश कुमार

वास्तव में देखा जाए तो बीसवीं सदी का दूसरा और तीसरा दशक अस्मितावादी सरगर्मी से भरा रहा है। इस दशक में जहां हिन्दी लेखकों के भीतर पुराने मूल्यों के प्रति मोह भी दिखा, वहीं नवीन विचार अपनाने की ललक भी दिखायी दी। इसी दशक में साहित्यिक क्षेत्र में ‘चाँद’, ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘विशाल भारत’, ‘मनोरमा’,‘त्यागभूमि’ आदि स्वाधीनतावादी चेतना से लैस पत्रिकाओं का उदय हुआ था। इन पत्रिकाओं के संपादक और लेखक    स्वराज की मांग के साथ स्त्री और अछूत समस्या का एजेंडा अपने लेखन में जोड़ लिया था। देखा जाए तो इस लेख के केंद्र में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों के स्त्री संबंधी विचार है। इस लेख के पहले हिस्से में इस बात की पड़ताल करने का  प्रयास किया गया है कि बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में स्त्री लेखिकाएँ अपने अधिकारों की दावेदारी किस तरह पेश कर रही थी।  लेख के दूसरे हिस्से में इस बात की पड़ताल की जाएगी कि इस दशक के हिन्दी संपादकों और लेखकों का स्त्री संबंधी नज़रिया क्या था ? ऐसे में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इस दौर की हिन्दी पत्रिकाओं में स्त्री प्रश्नों को कैसे देखा जा रहा था, और इन पत्रिकाओं के संपादक किस सामाजिक-धार्मिक भाषा में स्त्री प्रश्न को संबोधित कर रहे थे।

औपनिवेशिक भारत की बीसवीं सदी के दूसरे दशक में स्त्री समस्या का मुद्दा प्रमुख बनकर उभर था। हिंदी नवजागरणकालीन संपादक पत्र-पत्रिकाओं में बाल विवाह, विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा सरीखे प्रश्नों को तरजीह देने लेगे थे। इस समय स्त्रियों को लेकर उच्च श्रेणी हिंदुओं के सामाजिक बंधन इतने कठोर थे कि विधवा स्त्रियाँ चाह कर भी पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। सन् 1911की जनगणना में विधवाओं के आकड़ों देखकर कर नवजागरण कालीन लेखक सकते में आ गए थे। सन् 1911की जनगणना में दो करोड़ चौसठ लाख इक्कीस हजार विधवाएँ थीं। इनमें से तीन लाख पैंतीस हज़ार 15 वर्ष से कम अवस्था की थी।1   विधवा स्त्रियों का पुनर्विवाह नहीं होने से उन्हें सामाजिक जीवन में तमाम तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा रहा था। चाँद पत्रिका 1923 केअप्रैल अंक में कुमारी सुखालता ने विधवा समस्या पर एक बड़ा ही मार्मिक लेख लिखा। इस लेख में कुमारी सुखालता ने बताया कि पुरोहितों और पोथधारियों की मूर्खता के चलते विधवा स्त्रियाँ बिना किसी अपराध के कैदियों सा जीवन व्यतीत कर रही हैं। कुमारी सुखालता का कहना था कि सती प्रथा की अग्नि से स्त्रियों को तो जरूर बचा लिया गया पर विधवा स्त्रियाँ जीवित रहते हुए भी रोज़ दुख की अग्नि में जल-भून रही है। विधवा जीवन स्त्रियों के लिए कितना दुष्कर और भयवाह था, इसका अंदाजा कुमारी सुखालता के इस कथन से लगाया जा सकता है : “मैं मानती हूँ कि विधवाओं कों  जिन्दा जलने से ज़रूर बचा लिया गया किन्तु अब तो जीवित अवस्था में हो वे धीरे धीरे दुःख की अग्नि में भस्म होती रहती है। चिता की अग्नि उन्हें एक दो घड़ी में ही समाप्त कर देती थी किन्तु सामाजिक बन्धनों की तथा असहायता और दरिद्रता की अग्नि अब उन्हें आजीवन सुलगाती रहती है। पहले तो इस जीवन का जो कुछ यातनाएं हुआ करती थीं, थोड़ी देर में चिता पर समाप्त हो जाती थी किन्तु अब संसार रूपी चिता की अग्नि उन्हें तमाम ज़िन्दगी बराबर जलाती रहती है। क्या समाज ने विधवाओं को सती-चिता से मुक्त इसलिये किया है कि उन्हें उस से अधिक यातना पूर्ण चिता पर उम्र भर जलाया करें।”2  नवजागरण कालीन स्त्रियाँ  इस बात का दावा  बार-बार कर रहीं थी कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी बहू-बेटियों के दुख दर्द को महसूस नहीं करते है। वे सड़ी-गली प्रथाओं के चलते अपनी बेटियों  को पशुओं की तरह इधर-से उधर हांक देते है। विधवा विवाह,बालविवाह और कन्या भ्रूण जैसी कुप्रथाओं की झाड़ियों और काँटों में  फसकर हिन्दू स्त्रियों का जीवन नष्ट हो जाता है। कुमारी सुखलता विधवा जीवन के खौलते हुए यथार्थ के संबंध में लिखती है कि, “विधवाओं की आज दशा क्या है ? उनका जीवन आज कैसे व्यतीत होता है। इनका जीवन नदी की उस धारा के समान हैं, जो कङ्कड़ पत्थर में पड़कर झाड़िया और काटों से अच्छादित होकर अपने तमाम सौन्दर्य को खो बैठा हो। यह कंकड़ पत्थर और यह झाड़ी और कांटे क्या है ? यह हिन्दू समाज के मृणासन्न मर्यादाएं हैं और कुप्रथाएं हैं जिनके कारण विधवा के जीवन का पुष्प अधखिला होते हुए भी बिखेर दिया जाता है। हिन्दूधर्म आज विधवाओं की यातनाओं को महसूम नहीं करता! उसमे नवीन जीवन का बहुत कम संचार हुआ है। वास्तविक जीवन का अभाव सा पाया जाता और इसलिये इस धर्म में आज वह अध्यात्म और वास्तविक नीतिमत्ता और पवित्रता नहीं पाई जाती कि जो धर्म की प्राण वायु है।”3

बीसवीं सदी के दूसरे दशक में विधवा समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया था। इस मर्दवादी समाज में उन्हें आठ घड़ी और चौसठ पहर दुख की कन्दराओं में जीवन काटना पड़ रहा था। इतना ही नहीं समाज और परिवार विधवाओं को बड़ी हिकारत भरी नज़रों से देखते थे। चाँद पत्रिका में तमाम अनाम विधवाओं के पत्र छ्पे जिनमें विधवाओं ने बड़ी शिद्दत से अपने दुखों का बयान किया। एक खत्री परिवार की स्त्री अपने विवाह के केवल इक्कीस दिन बाद विधवा हो गयी थी। यह अनाम विधवा अपने बारे में बताती  है कि, “जिस समय मेरा विवाह हुआ उस समय मेरे पति को पहिले से ही संग्रहणी की बीमारी थी। जो शायद शादी विवाह में कुपथ्य ( बदपरहेज़ी ) के कारण बढ़ गई और ठीक 21 वें दिन तार आया कि वे परलोक सिधार गए। उस समय मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। मैंने सुना था कि वे (पति) पहले से ही बीमार रहते थे । उनकी आयु जब विवाह हुआ तो 35 साल की थी और उनकी पहिली दो स्त्रियां प्रसुत रोग से मर चुकी थीं।”4  इसके बाद यह अनाम हिन्दू विधवा वेद-पुराण की आलोचना तो करती ही है, वह ऐसे  पुरुष पर भी सवाल उठाती है जो खुद तो चार-पाँच विवाह कर लेते थे लेकिन विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का विरोध करते थे। यह अनाम विधवा अपने पत्र में लिखती है कि, “मुझे समाज से कुछ नहीं कहना है। मैं केवल यह बात जानना चाहती हूं कि किस वेद, पुराण या कुरान में ऐसी आज्ञा दी गई है कि पुरुष जब चाहें पैर की जूतियों के समान हमें त्याग कर एक, दो, तीन, चार अथवा पांच पांच विवाह करलें पर स्त्रियां बेचारी ऐसी स्थिति में रहते हुए भी, जैसी आज मैं हूँ-दूसरा विवाह न कर सकें । यह समाज की भयङ्कर नीचता नहीं तो और क्या है ?”5

  विधवा स्त्रियों पर परिवार और समाज का बड़ा पहरा  रहता था। वे अपनी इच्छा  से न तो कहीं जा सकती थी और न तो कुछ वरण कर सकती थी। हर वक्त उन पर निगरानी रखी जाती थी। इस पहरेदारी से तंग आकर कुछ विधवाएँ आत्महत्या करने की बात तक सोचने लगती थी। एक उच्च श्रेणी की हिन्दू विधवा का जीवन कितना पीड़ा दायक था। इसका अंदाजा इस अनाम विधवा के पत्र से लगाया जा सकता है : “सेवा में निवेदन है कि में एक विधवा दुःखियारी आपकी सहायता के लिए प्रार्थना करती हूं। मेरी अवस्था इस समय 18 वर्ष की है। मुझे विधवा हुए तीन साल होगए। मैं वैश्य अग्रवाल जाति की हूँ । मेरे एक लड़की हुई थो जो इस समय 2 वर्ष की है और कोई सन्तान नहीं हुई । मेरे माता-पिता जाति का डर होने के कारण और निर्धन होने के कारण चुप हैं और मेरे शत्रु बन रहे हैं । मेरे सास ससुर भी, जैसा हिन्दु विधवा के साथ , इस जाति में घोर अत्याचार प्रचलित है कर रखा है, करते हैं । शोक है मेरे जेठ जिनकी उम्र 50 वर्ष से कम नहीं है, जिसके दो लड़के 17 औ 12 वर्ष के, और एक लड़की 11 वर्ष की है-पिछले साल 26 साल की एक विधवा से विवाह कर लाए लेकिन मुझ दुःखिया पर जिस का न पिता के घर जीवका का सहारा है और ना ससुराल में किसी को परमात्मा के भय का भी ख्याल नहीं होता दिन भर सारे कुटुंब की सेवा करते रहने पर भी रोटी का सहारा नहीं दीखता! हर समय सब की घुड़कियों और तानों से अति दु:खित हो रही हूँ । कई बार जी में आता है कि कुएं में छलांग मार कर इस मुसीबत से छुटकारा पा लूँ।”6

हिन्दी नवजागरण कालीन स्त्री लेखिकाएं विधवा जीवन की दुश्वारियों को अपने लेखन में उठा रहा थी। इसी के साथ वह पुरुषों के चाल-चलन पर सवालियाँ निशान भी लगा रही थी। श्रीमती भाग्यवती देवी ने मनोरमा पत्रिका में बिधवा शीर्षक से दो विधवा स्त्री का आपसी वार्तालाप लिखा। भाग्यवती देवी ने यह दावा किया कि उनका यह वार्तालाप सत्य घटना पर आधारित है। इस वार्तालाप से पहले लेखिका ने मर्दवादी नैतिकता पर बड़े गंभीर सवाल खड़े किए। भाग्यवती का दावा था कि अधिकांश युवा कालेजों और स्कूलों में  पढ़ते समय अपना जीवन ख़राब कर चुके होते है। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल का ग्रास बनकर अपनी पत्नी को विधवा बनाकर चले जाते हैं। श्रीमती भाग्यवती देवी ने पुरुष नैतिकता की कलाई खोलते हुए लिखा कि,“हमारी उच्च कही जाने वाली जातियों में वैधव्य जीवन के द्वारा समाज का कितना नैतिक पतन होता जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं ! आज हजारों की संख्या में वह बहिनें जिनकी माँग का सिंदूर अभी तक धुला भी नहीं था वैधव्यता को प्राप्त हो जाती है। आये दिन हजारों विधवाओं के होते जाने पर भी हमारे रूढ़ि के गुलाम भाई इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते कि क्यों इतनी शीघ्रता से हमारा ह्रास हो रहा है! क्या मैं आपको बताऊँ यह वैधव्य जीवन की बुलाने का पुण्य कार्य भी आप पुरुषों ही के द्वारा होता है! आप लोग अपनी अबोध कन्याओं को बूढ़े तथा दुर्बलेन्द्रिय नवयुवकों को जो अपना जीवन कालेजो और स्कूलों में ही प्रायः खराब कर चुके होते और इस आशा से कि लड़का पढ़ा हुआ है विवाह कर देते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि वह शीघ्र ही काल के ग्रास बन जाते हैं और अपनी उस साध्वी परिणीता भार्या को वैधव्य का दुःख दे जाते हैं ! उनके पश्चात् जो जो नाना भाँति अत्याचार सास श्वसुर ज्येष्ठ आदि करते हैं वह किसी से छिपे नहीं हैं । इन घरों के अत्याचार अलावा भी आज कल के फैशनेबुल शौक़ीन लोग नवयुवति विधवाओं को अपना शिकार बना लेते हैं।”7 यह लिखने के बाद भाग्यवती देवी ने लीला और मूर्ति नामक दो विधवाओं का वार्तालाप दिया है। लीला मात्र तेरह वर्ष की और मूर्ति  पंद्रह वर्ष  की अवस्था में विधवा हो गयी थी। मूर्ति अपने वार्तालाप में बताती है कि उसका पति बी.ए. करते समय चरित्र हीन हो गया था। नवजागरण कालीन उच्च श्रेणी की स्त्रियां किस  पीड़ा से गुजर रही थी। लीला और मूर्ति के इस वार्तालाप से महसूस किया जा सकता है :  

लीला– लीला अभी 13 वर्ष की बालिका थी कि यकायक उसके  सिर का सिंदूर पुछ गया। उसका विवाह हुए अभी  केवल दो मास ही हुए थे। हाय? वह कैसे पति का वियोग सहेगी। लीला के घर में पाँच प्राणी थे, माता, पिता, दो भाई, तथा लीला। लीला के पिता दो भाई थे। दोनों भाइयों में कन्या रत्न अकेली लीला ही थी इस कारण दोनों ही परिवारों में लीला को सब प्रकार से सुखी रखने का यत्न होता था और प्रेमाधिक्य के कारण वह सब की प्रेमपात्री बनी हुई थी। श्वसुरालय में केवल तीन जीव थे सास श्वसुर तथा पति। एकाएक पति वियोग हो जाने के कारण लीला को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। एवंहि नाना भाँति के दुःखों का साम्राज्य छा गया। अहो ? यह 13 वर्षीया बालिका कैसे इतना दुःख उठा सकेगी । आइये हम उनकी बात चीत आपको सुनावे जो वह आपस में कर रहीं हैं ।

लीला-प्रिय बहिन मूर्ति मैं  क्या करूं ? कैसे अपने जीवन को व्यतीत करूं, अभी मैंने संसार का देखा ही क्या है ? ठीक तौर से आँख भी न खोलने पाई थी कि सदैव के लिए बन्द दो गई !

 मूर्ति – बहिन मेरी दशा भी तुमसे  कोई  बड़ी नहीं- मैं भी इसी नाव में सवार हूँ ।  मैं 15 वर्ष की ही थी कि मेरे आराध्य देव मुझे बिलखता छोड़ कर स्वर्ग चले गये । मेरे पिता ने एक बड़े अच्छे कुलीन घराने में जो आगरा कालिज में बी.ए. में पढ़ता था विवाह किया था। माता की उमंग और पिता का अनन्य बात्सल्य भाव, देखने वाले कहते हैं अपूर्व था। वह इस बात की बड़ी तारीफ़ करते थे कि मेरा जामाता बी. ए. है परन्तु प्यारी बहिन मेरे वैधव्य का कारण तो यही कालेज की पढ़ाई का हुआ! मेरे पति देव कालेज में पढ़ते समय चरित्रहीन हो गये और उसी से शरीर में घुन लग गया जो उनका जीवन ही लेकर हटा ! मेरे वैधव्य को सुन माता पिता ने भी छट पटाकर प्राण दे दिये। मेरे अब भाई भावज के सिवाय कोई भी नहीं रहा जो मुझे धीरज बँधावे।

लीला- बहिन। तुम्हारी ही तरह मेरी स्नेह मयी माता भी मेरे अपार दुःख को न देख सकी और वह भी मुझे रोता छोड़ चल बसी। पिता जी मुझे  किसी प्रकार का भी दुःख नहीं होने देते पर मेरे अन्दर जो आग धधक रही है उसका क्या हो। जिस समय पिता जी ने मेरा विवाह  किया था उसी समय मुझे अपने भावी पति को जो घोड़ी पर चढ़कर द्वार पर आया था देख कर आशंका हो गई थी कि पिता जी मेरा बलिदान कर रहे हैं । बहिन कहने के लिये तो वह नव युवक था परन्तु उसका पीला रक्त हीन चेहरा बता रहा था कि यह विवाह के अयोग्य है। परन्तु हम बालिकाएँ इस विषय में मुंह खोल कर कुछ कह नहीं सकटी जिसका परिणाम आज मुझे मिल रहा है ।8

बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में व्यभिचार एक बड़ी समस्या बन कर उभरा था। विधवा स्त्रियों को उनके सगे संबन्धी नरम चारा समझ कर उन्हें पतित कर डालते थे। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि इसका सारा दोष विधवा स्त्री के सिर ही मढ़ दिया जाता था। विधवा स्त्रियों का शरीरिक शोषण कितनी गंभीर समस्या बन गया था। इसका अंदाज़ा एक उच्च श्रेणी की विधवा के इस पत्र से लगाया जा सकता है :  “मेरा जन्म आज से 29 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं सारस्वत ब्राह्मणी हूँ । जब मैं पाँच वर्ष की थी, मेरे पिता की मृत्यु हो गई। अब माता और मैं चचा के पास रहने लगीं। मैं अपने फूफा के यहाँ भी दो-तीन वर्ष रही । वहाँ पर ही मैं मामूली हिन्दी पढ़ गई। जब मैं 18 वर्ष की हुई तो मेरी शादी जिला बुलन्दशहर में हुई। विवाह के एक वर्ष बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ । मेरे पति रेलवे में बुकिंग  कलर्क थे। दो वर्ष  बाद मैं पति के साथ रहने लगी। एक वर्ष बाद एक पुत्री हुई और फिर दो वर्ष बाद एक पुत्र हुआ। अभाग्यवश पार साल मेरा सिन्दूर पुछ गया- मैं अनाथ हो गई। मेरे श्वसुर बहुत दिनों से पागल हैं। पति के मरते समय रुपए -पैसे की हालत अच्छी न थी। जो कुछ थोड़ा -बहुत था, वह चिकित्सा में समाप्त हो गया । उनको क्षय रोग था। अब मैं अपने श्वसुर के पास आ गई और उनकी सेवा करने लग गई । थोड़े ही दिनों बाद मेरे बड़े पुत्र और कन्या की मृत्यु हो गई । मैं श्वसुर जी के पास दो महीने ही रहने पाई थी। इस समय मेरे जेठ, जोकि मेरे पति के चचा के लड़के हैं और एक जजी कचहरी में नायव नाजिर हैं, आ गए और मेरी ननद से तरह-तरह की बातें बना कर मुझको अपने साथ ले गए । हाय ! यदि मुझे यह मालूम होता कि मैं एक गहरे गढ़े में गिर जाऊँगी तो कभी न जाती। मैं उनके पास चार महीने रही। एक महीने तक तो उन्होंने कुछ न कहा । दूसरे महीने छेड़ना शुरू किया। उनकी  स्त्री भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्त्री को ऐसी बातें देख कर आनन्द होता है और वे हँसती हैं। मुझे तरह-तरह के प्रलोभन दिए गए । हाय ! मूर्खा इतना न जान सकी कि ये प्रलोभन वह नारकीय कुत्ता किस लिए दे रहा था। एक रात को वह मेरी कोठरी में आ घुसा और प्यार की बातें करने लगा। मैं चिल्ला उठी- “जा, चला जा अपना काला मुंह लेकर चला जा। तिस पर बोला- “प्यारी- तुझे मालामाल कर दूंगा। सब घर तेरा ही है ।” और तरह-तरह की बाते की और कहने लगा- “अगर तू चिल्लाएगी तो  बदनामी तेरी ही होगी; मेरा क्या बिगड़ेगा ? कल निकाल कर बाहर खड़ा कर दूंगा ।” उस समय इन बातों का हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा । किन्तु मैं यह नहीं जानती थी कि पुरुष इतने स्वार्थी होते हैं कि मतलब निकल जाने पर मुँह से बात तक नहीं करते। हाय! मेरा सर्वस्व लूटा।  जिठानी जी देखती रहीं । यही नहीं, किन्तु हँसती रहीं । स्त्रियाँ भी ऐसी होती हैं , यह मुझे स्वप्न में भी आशा न थी। अब क्या था, काला मुँह हो गया। जिठानी के यहाँ जो कोई आता, उसी से वह ये सब बातें कहती । मुझे लज्जित होना पड़ता।”9

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ एक तरफ पुरुष के नैतिक पतन की कहानी लिख रही थी तो वहीं दूसरी तरफ मर्दवादी अत्याचारों का प्रतिकार भी कर रही थी। श्रीमती मनोरमा देवी नवजागरण कालीन लेखिका थी। इनके अनेक लेख चाँद,माधुरी, सरस्वती, मनोरमा पत्रिका में बिखरे पड़ें हैं। मनोरमा पत्रिका सन 1929 के सितंबर अंक में श्रीमती मनोरमा देवी ने ‘अबलाओं पर अत्याचार’ शीर्षक से एक दिल को हिला देना वाला लेख लिखा। मनोरमा देवी ने इस लेख में स्त्री विमर्श की जमीन पर खड़ी होकर कहा कि स्त्रियाँ  दुखों की परवाह किए बगैर  पुरुषों पर अपना सर्वस्व निछावर कर देती हैं पर पुरुष इतने निर्दयी और अत्याचारी होते है कि उन्होंने स्त्रियों को कठपुतली और गुड़ियों का खेल समझ कर उन पर मनमाने अत्याचार करते हैं। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियाँ रक्त और मांस की बनी हुई हैं; इसके बावजूद यह मर्दवादी तंत्र स्त्रियों पर घोर सामाजिक अत्याचार करता है। श्रीमती मनोरमा का अभिमत था कि यह मर्दवादी समाज स्त्रियों की इच्छा-आंकक्षा का तनिक भी ख्याल नहीं रखता है।  यहाँ तक स्त्री को इस मर्दवादी तंत्र में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। यदि स्त्री किसी बात पर अपना मुँह खोलती है तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। श्रीमती मनोरमा देवी इस मर्दवादी तंत्र के मुखौटा को उजागर करते हुए लिखती हैं कि, “अनेक स्थलों पर देखने में आता है कि बात-बात में  स्वामी स्त्री का त्यागकर देता है। वह  उससे हर तरह के छोटे बड़े काम लेता है दासी वृत्ति कराता है यहाँ तक कि वेश्यावृत्ति जैसा घृणित कार्य भी कराता है स्त्री ने किसी भी बात के विरुद्ध अपना मुँह खोला कि फिर वह घर से बाहर कर दी जाती है । कारण घर स्वामी है, दोष चाहे जिसका हो, स्वामी की जब तक इच्छा है स्त्री घर में रह सकती है, इच्छा नहीं रहने पर वह किसी तरह  घर नहीं रह सकती इस पर किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं । स्वामी प्रभु है, मालिक है, जो चाहे कर सकता है । इस प्रकार कितनी स्त्रियों का जीवन व्यर्थ नष्ट हो रहा है।”10 मनोरमा देवी आगे सवाल उठाती हैं कि इस समाज में स्वामी कितना ही अत्याचारी और दुष्ट हो पर स्त्री को उसके लात-जूते हस्ते हुए ही सहना पड़ता है। यहाँ तक स्त्री को अपने दुख को प्रकट करने का अधिकार नहीं कारण स्वामी देवता है।

नवजागरण कालीन स्त्रियाँ अपने लेखन में स्त्री अधिकारों की पहलकदमी करती दिखायी देती हैं। स्त्री अधिकारों के अंतर्गत स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे मुद्दे अपने लेखन में उठा रही थी। नवजागरण कालीन लेखिका श्रीमती कौशल्या देवी श्रीवास्तव ने अपने एक लेख में स्त्री शिक्षा का सवाल उठाकर मर्दवादियों को सकते में डाल दिया था। इस लेखिका का कहना था कि स्त्रियों को गहने से लादने से अच्छा है कि उन्हें शिक्षा रूपी आभूषण से सुसज्जित किया जाए। इस लेखिका ने दावा किया कि मर्दवादी समाज स्त्रियों को इस लिए अनपढ़ बनाए रखता है कि कहीं स्त्रियाँ उनकी बराबरी न करने लगे। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में लैंगिक भेदभाव का मुद्दा भी उठाती हैं। इस लेखिका का साफतौर कहना था कि यह मर्दवादी समाज अपनी पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों की शिक्षा पर अधिक बल देते हैं।  इस नवजागरण कालीन लेखिका ने सुधारकों को चेतवानी देते हुये कहा कि जब तक स्त्री शिक्षा का उचित प्रबंध नहीं किया जाएगा, तब तक यह देश और समाज उन्नति नहीं कर सकता है। श्रीमती कौशल्या देवी, श्रीवास्तव अपने लेख में सुधारकों से स्त्री शिक्षा को लेकर अपनी अपील में लिखा कि, “हा ! विधाता तूने कैसा ज्ञान दिया है आजकल प्रायः ग्राम में भी स्कूल खुले हुए दृष्टि आते हैं उसमें पुत्र तथा कन्या दोनों ही पढ़ाई जा रही हैं किन्तु , कन्याओं को लोग दो ही एक दर्जे तक पढ़ा कर बन्द कर देते हैं परन्तु इस पढ़ाने से क्या पढ़ना न पढ़ना दोनों बराबर है-जब तक पूर्ण रूप से शिक्षा न दी जायगी तब तक सफलता प्राप्त होने की आशा नहीं है। अतः इसके लिये पूर्ण रूप से प्रबन्ध करने की आवश्यकता है। सुधारकों से मेरी प्रार्थना है कि वे इस ओर विशेष ध्यान दें । जब तक स्त्रियों के शिक्षा का पूरा प्रबन्ध न हो जायगा, तब तक इस प्यारे देश की उन्नति होने की आशा नहीं।”11 श्रीमती कौशल्या देवी अपने लेख में एक बड़ा ही अहम सवाल उठाती हैं कि लड़की का विवाह उसके मर्जी से किया जाए। इस लेखिका का अभिमत था कि अधिकांश माता-पिता अपनी कन्या पर दया नहीं करते हैं। वह आँख पर पट्टी बाँधकर कर अपनी कन्याओं के गले में विवाह नाम की कंठी लटका देते हैं। लेखिका उन माता-पिता से गुजारिश करती है कि लड़कियों का विवाह उनकी इच्छा से ही करें ताकि उन्हें जीवन में कष्ट नहीं उठाना पड़े। श्रीमती कौशल्या देवी लिखती हैं कि, “हमारा उन माता पिताओं से यही अनुरोध है कि वे अपनी कन्या की शादी जहाँ तक हो सके आँख बन्द करके न किया करें। ऐसा करने से उन्हें महान कष्ट भोगना पड़ता है । इस ब्याह से तो आजन्म कुमारी रहना अच्छा है किन्तु परतन्त्रता के कारण जो न हो वह थोड़ा है। ऐसे शादी करने से कितने ही पति ऐसे मिलते हैं जो उसे  प्यार की दृष्टि से देखते ही नहीं। उन्हें उनकी सूरत देखते भी घृणा उत्पन्न होती है। ऐसी शादी करने वाले पूज्य पिता ही सोचें भला यह जीवन भी सुखमय हो सकता है? कदापि नहीं। जो वस्तु अपने पसन्द की ख़रीदी जाती है उस पर अपना अगाध प्रेम रहता है और जो वस्तु पराए पसन्द की होती है उस पर अपना वैसा प्रेम कदापि नहीं रहता। एक न एक दोष निकल ही आते हैं। चाहे वह कैसी ही वस्तु क्यों न हो। अतएव माता पिता को चाहिये कि अपने पुत्र तथा पुत्रियों के इच्छानुसार ही शादी किया करें। ताकि स्त्री पुरुष दोनों का जीवन सुखमय हो।”12   नवजागरणकालीन स्त्रियों  इस बात को भली-भाँति समझ चुकी थी कि उनकी दुर्दशा की जिम्मेदार पितृसत्तावादी मानसिकता  है। वह मर्दवादवादियों को अपने लेखन के हवाले से आईना भी दिखा रही थी। वह इस मर्दवादी समाज से पूंछ रही थी कि स्त्रियों ने बड़ी यतनाओं में रहकर पुरुषों के लिए वृतादि सब कुछ किया है पर पुरुष स्त्रियों के बेहतरी के लिए क्या कभी व्रतादि  रखा है ?  नवजागरणकालीन लेखिका सौभाग्यवती विमला देवी ने ‘मानव जाति में स्त्री’ शीर्षक से एक लेख लिखा। इस लेख में मुख्यतौर पर स्त्रियों के पतन का जिम्मेदार मर्दवादी मानसिकता  को ठहराया गया। इस लेखिका ने कहा मर्दों की ओर से यहाँ तक कहा गया स्त्रियाँ जहां अपनी ज़ुबान खोलें वही ढ़ोल की तरह पीट कर  उनकी बोलती बंद करवा दी जाए। विमला देवी का कहना था कि इस मर्दवादी समाज को स्त्रियों का पढ़ना-लिखना सुहाता नहीं है। इन मर्दवादियों के चलते स्त्रियों को चहार दिवारी के भीतर सड़ना पड़ रहा है। सौभाग्यवती विमला देवी  स्त्री समाज का खौलता हुआ यथार्थ सामने रखते हुए लिखती हैं कि, “अफ़सोस! पुरुषों ने अपनी अज्ञानता के वश में आकर नारी-जाति को बिलकुल ही पतन के गहरे गर्त में ढकेल दिया, उन्होंने सदा के लिए पशु-जीवन में परिणत कर दिया। ओफ़! ऐसा भीषण प्रहार! ‘‘ढोल गवॉर शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी ’’ का ढोल पीटा जाय। जहाँ पर बोली बन्द कर दी गई । “ चुप रहो, तुम्हारा कुछ हक नहीं, पढ़ना लिखना कुलटाओं का चिन्ह है। पर्दे की चहार दिवारी के अन्दर सड़ती रहो ।” आदि – कर्ण- कटु शब्दों के द्वारा घोंसे बजाया जाय। अत्याचार ? जुर्म ? पैचाशिक काण्ड मचाये जाय किसके साथ? मानव जाति की बुनियाद, बन्दनीया नारी जाति के साथ! पेड़ काट कर पल्लव सींचने की योजना! कुपथ रखते हुए ऊरुज विमुक्त होने की आशा रखना! कैसा अनर्थ है ? जो नरों की खान हैं, मानव जाति के, विकाश-केन्द्र हैं ; उन्हीं के साथ ऐसा निष्ठुर व्यवहार ? पशुओं से भी हीनतर ! छिः! ”13  श्रीमती विमला देवी के इन सवालों का जवाब शायद ही मर्दवादियों के पास था।

उमा नेहरू हिन्दी नवजागरणकाल की प्रसिद्ध लेखिका थी। इस लेखिका ने स्त्री समस्या को केंद्र में रखकर अनेक लेख और कहानियां लिखी है। सन 1927 में  उमा नेहरू की स्त्री समस्या पर केन्द्रित एक बड़ी मार्मिक कहानी ‘स्नेहलता’ शीर्षक से मनोरमा पत्रिका में छपी। उमा नेहरू की इस कहानी के केंद्र में स्त्री शिक्षा से लेकर स्त्रियों को गुलाम बनाने वाली प्रथाओं को बड़ी शिद्दत के उठाया गया है। इस कहानी की नायिका स्नेहलता है। जो वैवाहिक कुरुतियों का शिकार हो गयी है। वह अपने कथन में एक जगह कहती है कि, ‘शादी हमारी बरबादी हुई।’ क्योंकि ‘जो जो असहनीय और अत्याचारी साधन हमारी शारीरिक और हार्दिक आज़ादी को मिटाने के लिए रचे गये वह एक न एक रूप में आज तक उपस्थित है।’ उमा नेहरू की यह कहानी  स्त्रियों को बेड़ियों में जकड़ने वाले रिवाज़ों और प्रथाओं को सामने रखती है।  इस कहानी की पात्र स्नेहलता एक जगह कहती है कि, “रिवाज़ क़ानून और लाठी ने मिला कर दुनियां में किसी को ऐसा नहीं दबाया, ऐसा नहीं मिटाया, जैसा हम स्त्रियों को। मज़हब आए, पहले, परन्तु हमारे लिए उन्होंने केवल इतना ही किया हमारी गुलामी की जंजीरों पर धार्मिक सोना चढ़ा दिया। अगर आत्मिक उन्नति के द्वारा कोई सूरत हमारी स्वतंत्रता प्राप्ति की हो सकती थी तो उसको भी सम्पूर्ण रीति से मिटा दिया। हमें निश्चय करा दिया कि ईश्वर ही ने हमको गुलाम पैदा किया है और वह यह चाहता है कि हम सदा गुलामी में अपना जीवन व्यतीत करें। मज़हब में यदि हमारे मुआफिक कोई बात मिली तो उसे क़ानून ने ठीक कर दिया। और अगर कानून भी पूरी सख़्ती न कर सका तो रिवाज़ ने हाथ बटाया।” उमा नेहरू की यह कहानी में स्त्री शिक्षा के  सवाल कों भी उठाती हैं। नवजागरणकालीन पुरुष स्त्री शिक्षा को बड़ी शंका से देखते थे। कुछ लोगो को कहना था कि स्त्रियाँ शिक्षा पाकर उद्दंड और विधर्मी  हो जाएगी। शिक्षा पाकर उनका रिपुबल तीव्र हो जाएगा जिससे पतिवृता धर्म स्थिर नहीं रह सकेगा। उमा नेहरू अपनी कहानी में इस विमर्श को दिशा देती दिखी कि मर्दवादियों ने स्त्रियों पर अपना नियंत्रण क़ायम रखने के लिए  स्त्रियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। कहानी की पात्र स्नेहलता अपने कथन में कहती है- “हम शिक्षा न देकर, हमको सांसारिक अनुभवों से बिलग रखकर, हम पर यह इलज़ाम लगाया जाता है कि हम नासमझ हैं, हम निकम्मे हैं और दुनियां के महत्वपूर्ण बातों में भाग लेने के अयोग्य हैं। इतनी नहीं बल्कि हमारे मुनसिफ़ मिज़ाज मालिकों का यह कहना है कि यदि वह हमें स्वतंत्रता दे दें तो इसमें हमारी ही हानि होगी। इसलिए हमारी सारी बातों का इख़्तेयार वह स्वयं अपने हाथों में रखते हैं। समस्त स्त्री जाति गोया उन बच्चों और पागलों वा मुजरिमों की श्रेणी में शामिल कर दी गई है जिनकी देख भाल क़ानून दूसरों के सुपुर्द कर देता है। अन्तर केवल इतना है कि बच्चे बड़े होकर, पागल सेहत पाकर; और मुजरिम अपनी सज़ा भुगतकर स्वतंत्र होने का अधिकारी बन सकता है । परन्तु हमारा बचपन वह बचपन है कि उम्र जिसको रफ़ा नहीं कर सकती।”14 इस कहानी में यह घोषणा की गई है किआज भले ही मर्दवादियों का बोलबाला है पर वह समय दूर नहीं है कि जब मर्दवादी अपने इन अत्याचारों का अन्त देखेंगे।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों से ही स्त्रियाँ  शिक्षा की पहलकदमी पर ज़ोर देने लगी थी। वह कविता और कहानियों के हवाले से स्त्री शिक्षा की मांग सामने रख रही थी। स्त्रियाँ अपनी कविताओं में यह बता रही थी कि उनकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियाँ जीवन भर अज्ञान बनी रहती है। कुमारी अम्बा देवी विदुषी अपनी कविता में स्त्री पीड़ा का बयान इस तरह किया करती हैं –

हमको न पढ़ावत हो इससे नित मूढ़ बनी मुख जोवति हैं।

घर भीतर कैद पड़ीं दुखिया अनजान बनी अब रोवति है।।

बहु, बाल विवाह न रोक सके बन के विधवातन झोकति है।

न प्रसार सुरीति सके तुम तो  “अबला अबलौ अवलोकति हैं” ।।15

नवजागरणकालीन लेखिकाएं स्त्रियों कों शिक्षा का महत्व बड़ी शिद्दत के साथ समझा रही थी। वह यह भी कह रही थी कि स्त्री शिक्षा से मुक्ति संभव है। स्त्री शिक्षा के महत्व कों रेखांकित करती श्रीमती कृष्ण कला देवी की यह कविता देखिए :

विद्या पढ़ो हे बहिनों, यदि मान चाहती हो। क्यों मूरखा कहाकर, अपमान चाहती हो ॥

विद्या से धर्म उपजे, सुख धर्म ही से होवे । विदुषी बनो जो अपना, कल्याण चाहती हो॥

हर नारि-धर्म -पुस्तक, को ध्यान से पढ़ो तुम । धर्म की जो अपने, तुम आन चाहती हो॥

विद्या में स्वयं तुमको, होना निपुण उचित है । विद्वान तुम जो अपनी सन्तान चाहती हो ॥

विद्या पढ़ो पढ़ाओं, जग में हो यश तुम्हारा । दो विद्या- दान, देना यदि दान चाहती हो ॥

उठि प्रात विद्या सागर में तुम लगाओ गोते । यदि ज्ञान जल में करना, स्नान चाहती हो ॥

विद्या के भूषणों से हो जाओ तुम अलंकृत। यदि रूप का कुछ अपने अभिमान चाहती हो॥16

 

2.

अब इस पड़ताल की ओर बड़ा जाए कि नवजागरणकालीन पुरुष लेखकों का स्त्री प्रश्न पर दृष्टि कोण क्या था ? बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के  हिंदी संपादक और लेखक विधवा समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे।  हिंदी लेखक सन 1911 की जनगणना के आकड़ों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ईसाई और मुसलमान उच्च श्रेणी हिन्दू विधवाओं को नरम चारा समझ कर चरे जा रहे है। इस प्रकार की शोच रखने वाले पंडित मन्नन द्विवेदी,गजपुरी बी.ए.(1885-1921) नवजागरण काल प्रसिद्ध लेखक थे। इनके कद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रेमचंद ने इनसे अपने कहानी संग्रह ‘सप्तसरोज’ की भूमिका लिखवायी थी। सन 1921 में जब पंडित मन्नन द्विवेदी का इंतकाल हुआ तो प्रेमचंद ने इन्हें याद करते हुए ‘जमाना’ में एक श्रद्धांजली लेख भी लिखा था। इस नवजागरण कालीन लेखक ने स्त्रियों और अछूतों को ईसाई और मुसलमानों के चुंगल से बचाने के लिए बकायदा ‘हमारा भीषण हृास अर्थात हिन्दुओं! सावधान!!’ शीर्षक से एक किताब लिखी। उनकी यह किताब अक्तूबर 1917 में प्रताप कार्यलय, कानपुर से प्रकाशित हुई थी। इस किताब की पहले संस्करण में दो हज़ार प्रतियां छपी थी। एक साल बाद अर्थात नवंबर 1918 में इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। पंडित मन्नन द्विवेदी का दावा था कि हिन्दू स्त्रियों को ईसाई और मुसलमान लेकर उड़े जा रहे हैं। इस नवजागरण कालीन लेखक ने विधवा समस्या को एक अलग ही रंग देते हुए लिखा कि, “आज जहाँ देखिए, मुसलमान गुण्डे हमारी विधवाओं के घरों के पास चक्कर लगाया करते हैं, ज़नाने मिशन की औरतें अपने जाल अलग बिछाये रहती हैं, पलक झपा नहीं कि वे इन देवियों को ले उड़ती हैं। ये लोग उनको धमच्युत कर के हमारे छाती पर कोदो दलते हैं। ऐसे नज़रे एक दो बार नहीं हज़ारों बार हो चुके है। अगर हमारे में आत्माभिमान और लज्जा होती तो हम अब तक या तो कोई उपाय किये होते या कर्मनाशा नदी में जाकर डूब मरते। आज कल हम अपनी विधवाओं को खाने पहरने की जितनी अधिक सुविधा करें अच्छा है। यह कहते हुए भी विधर्मियों की नजरों से जितना अधिक उनको बचायें उतना भी और अच्छा।”17 पंडित मन्नन द्विवेदी जैसे लेखक को स्त्री समस्या से  अधिक चिंता हिन्दू गौरव को बचाने की थी।

रामरख सिंह सहगल हिन्दी नवजागरण काल सबसे चर्चित संपादकों में से एक रहे हैं। रामरख सिंह सहगल नवजागरण काल की चर्चित पत्रिका चाँद के  उद्भावक और संपादक थे। चाँद पत्रिका का पहला अंक नवंबर 1922 को चाँद कार्यलय, इलाहाबाद से निकला था। चाँद पूर्णतया महिला केन्द्रित सचित्र मासिक पत्रिका थी। इस पत्रिका की संचालिका खुद रामरख सिंह सहगल की पत्नी श्रीमती विद्यावती सहगल थी। श्रीमती विद्यावती सहगल जानेमाने वकील लाला गंगाराम शास्त्री की बेटी थी और इन्होंने कन्या महाविद्यालय,जालंधर से शिक्षा प्राप्त की थी। संपादक रामरख सिंह सहगल ने चाँद, अप्रैल 1922 का अंक विधवा समस्या पर केन्द्रित किया। संपादक रामरख सिंह सहगल ने इस अंक में जो संपादकीय लिखा; वह पहली नज़र में बड़ा प्रगतिशील लगता है। उन्होंने संपादकीय लेख में विधवा विवाह के पक्ष में दलीले जरूर दी लेकिन रामरख सिंह सहगल ने विधवा समस्या को आपदधर्म बताकर  विधवा समस्या की गंभीरता से मुँह मोड़ लिया। इस संपादक का कहना था कि हम जानते हैं कि पतिव्रत धर्म का पालन करने और पुनर्विवाह के सिद्धान्त में कोड़ी और मोहर का अन्तर है पर अपदधम्म भी कोई चीज़ है अंग्रेजी में कहावत Imergency has no law आपदधम्म की ओर इशारा कर रहे हैं जिसे स्वय योगी राज महात्मा श्रीकृष्ण जयद्रथ वध के समय काम में लाए थे। …मान लीजिए विधवाओं के पुनर्विवाह का कार्य “मुंह काला करना” पर एक ही बार तो।18  इसके बाद रामरख सहगल ने अपने संपादकीय लेख में अपने मन की बात कहते हुए लिखा कि, “आज हज़ारो स्त्रियां भगाई और बेची जा रही हैं। बढ़ते हुए व्यभिचार की और दृष्टि करने से रोमांच आता है वेश्याओं की दिनों दिन वृद्धि देखकर शरीर एक बार थर्रा उठता है। दूध पीती बच्चियों का क्रंदन सुनकर जो अपनी माताओं की गोदियों में मुँह डालकर सिसक सिसक कर रो रही हैं। भला कौन ऐसा मानव हृदय  होगा जो करुणा से परिपूर्ण न हो जायेगा और कौन  ऐसा नेत्र होगा, जिससे आंसू न निकल पड़गे?”19

नवजागरण कालीन लेखक और संपादक विधवा समस्या के समाधान की बजाए उसे संप्रादायिक रंग देने की कयावद करते नज़र आए। नवजागरण कालीन हिन्दी संपादकों ने उच्च श्रेणी हिंदुओं के भीतर इस बात का भय पैदा करने का प्रयास किया कि हिन्दू विधवाएँ विधर्मियों के घर की देहरी रोशन करने में लगी हुई है। चाँद पत्रिका सन 1926 के अक्तूबर अंक में रामरख सिंह सहगल ने ‘वैधव्य और समाज’ शीर्षक एक लंबा संपादकीय लेख  स्त्री समस्या पर लिखा। इस संपादकीय में विशेष तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया गया कि  हिन्दू विधवा स्त्रियाँ विधर्मियों के घर का दीपक बन उजाला करने पर तुली है। रामरख सहगल ने पहले तो इस बात पर रोष प्रकट किया कि उच्च श्रेणी के हिन्दू अपनी ललनाओं की रक्षा के लिए आगे क्यों नहीं आते है? इसके पीछे इनकी दलील थी कि युवक अपनी विलासिता की चिर निद्रा में सत्यासत्य का विश्लेषण नहीं कर सकते ! उनके हृदय में अपनी माताओं और बहिनों के कल्याण तथा उनकी शारीरिक एव नैतिक रक्षा की ममता नहीं रहती! उनकी भुजायें अपनी सहोदरा एवं कुल-ललना की मर्यादा नष्ट होती देख कर भी आततायियों का समूल नष्ट कर देने अथवा इस महामङ्गल-पथ में अपने जीवन की आहुति दे देने के लिये नहीं उठतीं ! उनकी आँखें मानवी सभ्यता के इन हत्याकारी भावों का पत्नीव चित्र देख कर तिलमिला नहीं जातीं! उनके रक्त अपने पापी समाज द्वारा उपेक्षित बहुओं को विधर्मियों की काम-पिपासा तथा विलासिता का शिकार एव उनके अँधेरे गृहों को प्रकाशमान करते हुए देख कर खौल नहीं उठते !20   रामरख सिंह सहगल आगे दावा करते हैं कि विधवा स्त्रियाँ प्रलोभन में आकर विधर्मियों के घर बैठकर अपने पूर्वजों की इज्जत को धूल में मिला देती है। रामरख सिंह सहगल अपने संपादकीय लेख में लिखते हैं कि, “हमारी बहुसंख्यक युवती विधवाओं को आजीवन संयम पथ पर आरूढ़ रहने का आदेश दिया जाता है। इसके अति रिक्त उनके संयम के मार्ग में भिन्न-भिन्न प्रकार के और भी प्रलोभन रख दिये जाते हैं, जो कि उनके हृदयों में अपने स्वजन और कुटुम्बियों के प्रति घृणा, तिरस्कार और क्रान्ति के भाव भर देते हैं और जिनके कारण वे अपने गृह के कैदखाने से निकल कर या तो वेश्या-जीवन धारण करती हैं अथवा किसी विधर्मी के घर में बैठ कर अपने पूर्वजों की उज्ज्वल कीर्ति को कालिमा से पूर्ण कर देती हैं।”21  

आप  से गयी जहान  से गई !!  

                                                       स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

रामरख सिंह सहगल लगातार संपादकीय लेखों के हवाले से इस बात को हवा देते रहे कि हिन्दू स्त्रियों को विधर्मी लेकर उड़े जा रहे हैं। इस संपादक की दलील थी कि विधर्मी हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसाकर अपनी संख्या में दिन दूनी वृद्धि करने में लगे हुए है। रामरख सहगल ने चाँद अक्तूबर 1927  के संपादकीय में फिर से एक बार विधर्मियों से स्त्रियों के संरक्षण पर बल दिया। इस संपादक का दावा था कि विधर्मी हिंदुओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर हिंदुओं का भयंकर ह्रास करने पर तुले हुए हैं। रामरख सहगल ने अपनी मंशा प्रकट करते हुए लिखा कि, “हमारी इस दुर्बलता का लाभ विधर्मी उठा रहे हैं। वे हमारे बच्चों तथा हमारी स्त्रियों का-जिन्हें हम समाज के अत्याचारों के कारण अपनी छाती पर हाथ रख बड़ी निर्दयता के साथ बहिष्कृत कर निकाल देते हैं-अत्यन्त प्रसन्नता के साथ स्वागत करते हैं । इस कारण एक ओर हमारा नित्य भयंकर ह्रास हो रहा है ; और दूसरी ओर हमारे ह्रास के कारण विधर्मियों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही है!”22   हिंदी नवजागरण कालीन लेखक और संपादक  स्त्रियों की दुर्दशा से ज़्यादा इस बात से चिंतित दिखे कि स्त्रियों को विधर्मियों के चुंगल से कैसे बचाए जाए। रामरख सिंह सहगल का दावा था कि यदि विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह का इंतजाम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं हिन्दू घरों की बहू-बेटियाँ उनके मुँह पर कालिख पोत कर बपतिस्मा लेती पाईं जाएंगी।  रामरख सिंह सहगल ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए लिखा कि, “हम इतना अवश्य कहेंगे कि अधिकांश विधवाएँ हिन्दू समाज के मस्तक को नीचा करने के लिए पर्याप्त साधन हैं; और यदि हिन्दू समाज शीघ्र ही अपनी स्थिति में परिवर्त्तन नहीं करता, तो वह दिन दूर नहीं है, जबकि हमारे घरों की अधिकांश बहू-बेटियाँ हमारे मुँह में कालिख पोत कर लाखों की संख्या में कलमा पढ़ते अथवा बपतिस्मा लेते पाई जाएँगी ! हम आराम से खाते पीते औौर मौज उड़ाते हैं, और हमारी आँखों के सामने हमारी बहू-बेटियाँ गुण्डों के द्वारा भगाई जा रही हैं ।”23  

हिंदी नवजागरण कालीन संपादक स्त्री उद्धार के नाम पर हिन्दू रक्षा की लड़ाई लड़ रहे थे। वह अपनी संपादकीय लेख के हवाले से यह बात बार-बार कह रहे थे कि विधर्मी उनकी स्त्रियों को लेकर उड़े जा रहे हैं। वह धार्मिक वर्चस्व को कायम करने के लिए मुसलमानों और इसाइयों का गुंडा की संज्ञा दे रहे थे। माधुरी हिंदी नवजागरणकाल की प्रतिनिधि पत्रिका मानी जाती है। माधुरी पत्रिका का पहला अंक अंक 30 जुलाई 1922 में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर से प्रकाशित हुआ था। माधुरी पत्रिका हिन्दू विचारों की वाहक थी। वह खुले आम हिन्दू संगठन का समर्थन भी करती थी। अगस्त 1927 में माधुरी पत्रिका के पाँच साल पूरे हुए थे। इस अवसर पर संपादक द्वय (कृष्ण बिहारी मिश्रऔर प्रेमचंद) ने संपादकीय लिखकर माधुरी की नीतियों और उद्देश्य को स्पष्ट किया। इस अंक के संपादकीय में लिखा गया कि,“’हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की सेवा करन अपना अहोभाग्य समझेगी। उन सभी प्रकार के आंदोलनों से ‘माधुरी’ की सहानुभूति होगी, जिनका उद्देश्य हिंदू-धर्म और हिंदू-जाति की रक्षा करना है। स्पष्ट शब्दों में ‘माधुरी’ हिंदू-संगठन और शुद्धि के विशुद्ध और उचित रूप का निस्संकोच समर्थन करेगी। यह बात इतनी सख्त इसलिये लिख दी गई है कि कुछ लोगों में यह भ्रम फैला या फैलाया गया है कि ‘माधुरी’ हिंदू-हितरक्षा के मामले में या तो विरोधी-भाव रखती है, या उदासीन। यह बात बिलकुल मिथ्या है। माधुरी हिंदू-हित-रक्षा के उचित रूप का पूर्ण बल के साथ समर्थन करेगी।”24  माधुरी पत्रिका के सन 1925 के मई अंक में ‘हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख लिखा गया। इस संपादकीय लेख में बातया गया कि मुसलमान हिंदुओं पर बड़ा अत्याचार कर हिन्दू युवतियों को जबरन मुसलमान बनाने पर तुले हुए हैं। माधुरी के संपादक ने मुसलमानों  टिप्पणी करते हुए लिखा कि, “इधर कुछ दिनों से हिंदुओं के प्रति मुसलमानों का व्यवहार साधारणतः बड़ा ही कटु हो रहा है। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता, जिस दिन के दैनिक पत्रों में हिंदुओं के प्रति मुसलमानों के दुर्व्यवहार और अत्याचार की ख़बर पढ़ने को न मिलती हो। कम-से-कम सौ पचास स्थानों में अब तक हिंदू लुट-पिट चुके हैं, उनकी स्त्रियाँ बेइज्जत हुई हैं, उनके बच्चे जबरन् या धोका देकर मुसलमान बनाए गए हैं। सहारनपुर, हाबड़े आदि के दंगे अभी कल की घटना है। बंगाल के देहातों में अधिकतर मुसलमान गुंडे हिंदू-युवतियों को उठा ले जाकर उन पर अत्याचार करते हैं, और उनका यह क्रम लगातार जारी है। दिल्ली और पंजाब आदि में हिंदुओं पर मुसलमानों का अत्याचार सुसंगठित रूप से चल रहा है। हशन  निज़ामी की स्कीम के अनुसार मौल्वी लोगों ने काम जारी कर दिया है।”25  

माधुरी पत्रिका के संपादक लगातार संपादकीय लेख लिखकर हिन्दुओं को यह बता रहे थे कि उनकी स्त्रियाँ छीनी जा रही हैं। माधुरी के कई संपादकीय लेखों  में इसाइयों और मुसलमानों के प्रति ज़हर उगला गया। माधुरी पत्रिका 1925 के सितंबर अंक में ‘हिन्दू- संगठन क्यों आवश्यक है ?’ शीर्षक एक संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में इस बात का विशेष तौर पर जिक्र किया गया कि तीन उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ मिशनरियों के चुंगल में जा फंसी थी। जिन्हें हिन्दू महासभा ने बड़े परिश्रम से मिशनरियों के चुंगल से मुक्त कराया है। माधुरी पत्रिका के संपादक ने लिखा कि, “इस युग में निर्बल की खैर नहीं। उसके आदमी छिन जाते हैं, उसकी स्त्रियाँ ईसाई मिशनरियों के आश्रय में भेज दी जाती हैं, कहीं भी उसकी फ़र्याद नहीं सुनी जाती। लुटेरे धार्मिक उत्तेजना फैलाकर जब बलबा मचाते हैं, तब निर्बल ही पिटते, लुटते और मरते हैं । हमारे इस कथन के लिये प्रमाण ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है। गत 10-12 महीनों के इतिहास में इन सब आपत्तियों की कई बार कई जगह पुनरावृत्ति हो चुकी है। अभी हाल में, कलकत्ते में, तीन ब्राह्मणियाँ पुलीस की खैरवाही से मिशनरियों के फंदे में जा फँसी थीं। अंत को हिंदू-सभा के उद्योग से उनका छुटकारा हुआ।”26  माधुरी पत्रिका के संपादक यहीं तक नहीं रुके वह आगे भी विधर्मियों से हिन्दू अबलाओं को बचाने पर ज़ोर देते रहे।  

हिंदी नवजागरणकालीन बड़े-बड़े लेखकों ने इस बात का दावा किया कि उनकी स्त्रियाँ उनके हाथ से निकाल कर विधर्मी बनती जा रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय हिंदी नवजागरण काल के बड़ी कवि माने जाते हैं। इन्होंने विधवा समस्या को लेकर एक ‘अपने दुखड़े’ शीर्षक से एक  कविता लिखी थी। उनकी यह कविता चाँद पत्रिका अप्रैल 1923 के अंक में प्रकाशित हुयी थी। इस कविता में कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ने विधवाओं की दुर्दशा पर चिंता प्रकट करने के बजाए इस बात पर चिंता प्रकट की कि स्त्रियाँ इसाइयों की गोद में बैठकर उच्च श्रेणी के मर्दों  की मूछों को नीचा दिखाकर उनकी संख्या में वृद्धि कर रही हैं। पंडित अयोध्या सिंह जी उपाध्याय अपनी बहू-बेटियों को लेकर कैसी राय रखते थे। इस कविता  में  महसूस कीजिए :

दिन ब दिन बेवा हमारी हीन बन। दूसरों के हाथ में हैं पड़ रहीं ||

जन रही है आँख का तारा वहीं । जो हमारी आँख में हैं गड़ रहीं ॥

लाज जब रख सके न बेवो की । तब भला किस तरह लजायें वे ॥

घर बसे किस तरह हमारा तब । जब कि घर और का बासायें वे ॥

गोद में ईसाइयत इसलाम की । बेटियां बहुये लिटा कर हम लटे ॥

आह ! घाटा पर हमें घाटा हुआ । मान बेवों जा घटा कर हम घटे ॥

है अगर बेवा निकलने लग गई । पड़ गया तो बढ़तियों का काल भी ॥

आबरू जैसा रतन जाता रहा । खो गये कितने निराले लाल भी ॥27 

                                                                                 

औपनिवेशिक दौर के बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने स्त्रियों से संबंधित एक नया सगुफ़ा छोड़ दिया। हिन्दी लेखकों और संपादकों का कहना था कि उच्च श्रेणी की स्त्रियाँ तैतीस करोड़ देवी देताओं को छोड़कर पीर-मज़ारों और कब्रों की पूजा करने में लगी हैं। चाँद,माधरी, सरस्वती आदि पत्रिकाओं में व्यंग चित्र और कविताओं में यह दर्शाया गया कि उच्च श्रेणी की हिन्दू स्त्रियाँ हिन्दू देवी देवताओं को छोडकर पीर-मज़ारों की पूजा करने पर तुली हुई हैं। चाँद दिसंबर 1925 के अंक में श्री शोभाराम धनुसेवक की एक पीर-पूजा शीर्षक से लंबी कविता छ्पी। इस कविता में इस बात का भय व्यक्त किया गया कि उच्च श्रेणी कि हिन्दू स्त्रियाँ  पीर-पूजा कर हिन्दू गौरव को मिट्टी में मिला रही हैं। बड़ी मेजे की बात यह है कि यह कविता स्त्रियों की प्रतिनिधि चाँद पत्रिका में छ्पी थी। श्री शोभाराम धनुसेवक की यह कविता हिन्दी नवजागरण कालीन लेखकों और संपादकों की मानसिकता को सामने रखती है :

देवियो ! तुम जड़ता वश , पीरों की पूजा करती !  पीरों फूल चढ़ातीं, दरगाहों पर, जा करके मस्तक धरती !!

दीजै मुझको पुत्र चाँझपन- से करिये मेरा उद्धार ! तुम्हें चढ़ाऊँगी मैं सिरनी, पूजो आशा पार मदार !!

कभी भटकती जा कब्रों पर, कभी ताज़ियों से मिन्नत ! कहती पूर्ण मुरादें करिये, बखशो जीवन में जिन्नत !!

कभी खोजती हो ख्वाजा को, कभी औलिया आला को ! शा साहब ! मंजूर कराओ, अरज़ी अल्ला ताला को !!

कभी अपरिचित दरवेशों से , बनवाती गंडे ताबीज़! बात लम्बी चौड़ी सुन कर , जाती उन पर शीघ्र पसीज !!

चकमों में या रंगे- सियारों के सहसा उन पर विश्वास ! कर लेती हो , फिर रोती हो , जब हो जाता सर्वस नाश !!

कभी फक़ीरों के फेरों में, कानों को फुंकवाती हो ! हाफिज मुल्लाओं से बच्चों के मुख पर थुकवाती हो !!

हितू समझती जिन्हें, वही हित हरने को तैय्यार खड़े ! अवसर पाकर सर्वनाश तक करने को तैय्यार खड़े !!

होता है संताप तुम्हारी, नासमझी पर बहिनों आज ! चरण- दलित होकर रोता है, तुम से हिन्दू-धर्म-समाज !!

वारि नहीं, वह मृग- तृष्णा है, जिसे देख कर भूली हो ! मणी गँवा कर तुच्छ काँच पर, बेसमझी से फूली हो !!

सन्तति सीता सावित्री की- हो, निज गौरव याद करो ! तज निज धर्म विधर्म ग्रहण कर, मत जीवन बरबाद करो !!

पति सेवा से सावित्री ने, यम पर भी जय पाई थी ! नत -मस्तक हो अखिल विश्व ने, जिस की महिमा गाई थी !!

सती शिरोमणि सीता को पा भारत जग में धन्य हुआ ! तुम्हीं बताओ आर्य धर्म सा, पूर्ण धर्म क्या अन्य हुआ ?

पति की सेवा से ना पालो , ऐसी कौन, असंभव चोज़ ?  स्वर्ग, मोक्ष तक तुम्हें सुलभ है, फिर क्या हैं गंडे ताबीज़ !!

बहिनों ! आज तुम्हारे कारण,शीश हमारा नीचा है ! क्यों जड़ता वश कल्प- वेल पर, विषम हलाहल सींचा है ?

नारी का सर्वस्व पतिव्रत, उससे होकर रीती तुम ! प्राप्त भवन का सुधा त्याग क्यों, गरल पराया पीती तुम ?

सोचा भी है बहिनों तुमने, क्या इसका परिणाम हुआ ! आर्य -धर्म पीरों को पूजा से कितना बदनाम हुआ ?

जगत्पूज्य थीं वही आज अब पीर पूजने जाती है ! मरुस्थल में कल-कंठ स्वर्ग की, हाय कूजने जाती है !

हुई !! राहु चन्द्रवत लक्ष्यों बहिनें, बेधर्मिन के ग्रास हुई । पतन वहाँ अनिवार्य जहाँ पर , धर्म भावना-ह्रास हुयी!!

चेतो अब भी आर्य देविया, पतित प्रथा से मुँह मोड़ो ! पूजा करो पती- देवाँ की, पीरों की पूजा छोड़ो !!

कहते हैं सत शास्त्र नारि के, लिये दूसरा देव नहीं !पतिव्रता के लिये पति  बिनु जग में कोई सेव नहीं !!

सतियो ! उसो सत्य आभूषण, से उर को सन्जित करिये !तज जीवन  सर्वस्व पूजकर- असत न कुल लज्जित करिये !!

आर्य देवियो जिस दिन तुम में, यही सत्य संचित होगा ! ऐसा कौन सुफल फिर जिससे, शुद्धि जीवन वंचित होगा ?

देखेंगा संसार चकित हो, अभिलाषाएँ पल भर में ! तुम पूजोगी, फिरना होगा- नहीं तुम्हें फिर दर दर में !!

देकर द्रव्य चरण में जिनके, पावन शीश झुकाती हो ! वक काकों को हंस समझ कर , जड़तावश पतयाती हो !!

तुम देखोगो वही तुम्हारे, पद में शीश झुकावेंगे !  जननी कह पद – धूलि शीश घर, जीवन सफल बनावेंगे !!

भारत ही क्यों धन्य धन्य फिर- तुम से जगतीतल होगा ! सतियो सत उत्कर्ष तुम्हारा, पुरुष वर्ग का बल होगा !!

आशा है इस सत्य- निवेदन, पर बहिनों तुम दोगी ध्यान ! भ्रान्त धारणाएँ छोड़ोगी, दिखला कर आदर्श महान !!

यदि श्रद्धा है सुर-पूजन में, तो निज देवों की अर्चा ! करिये पर हिन्दू रमणी में, उचित न पीरों की चर्चा !!

तैतिस कोटि तुम्हारे सुर है, उन्हें छोड़ कर पर की आश !  करना भारी भूल न होगी, मृग-तृष्णा से शान्त पिपास !!28

हिन्दी नवजागरण कालीन पत्रिकाओं  में व्यंग्य चित्र खूब छपते थे। यह व्यंग्य चित्र सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते थे। बड़ी दिलचस्प  बात यह  चाँद, माधुरी, मनोरमा, सरस्वती आदि  पत्रिकाओं ने ईसाई और मुसलमानों के खिलाफ खूब व्यंग्य चित्र छापे । चाँद पत्रिका में कई ऐसे कार्टून छपे जिसमें में  दखाया गया कि हिन्दू स्त्रियाँ तैतीस करोड़  देवी-देवताओं  को छोड़कर पीर-पूजा करने जाती है।  बड़े मज़े की बात यह कि एक  व्यंग्य  चित्र में यह दिखाया गया कि मौलवी हिन्दू स्त्रियों पर कुदृष्टि रखते हैं। चाँद पत्रिका में छापा यह व्यंग्य चित्र देखिए :

                                                                                

                                                             पीर-पूजन  

 

                                                स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

 

दूसरी तरफ हिन्दी नवजागरन कालीन पत्रिकाओं ऐसे भी व्यंग्य चित्र देखने को मिले जिनमें यह दिखाया गयाकि मुसलमान मनिहार उच्च श्रेणी की स्त्रियों को चूड़ी पहनने के बहाने उनके घरों में सुरंग लगाने पर आमादा है। माधुरी पत्रिका में एक ऐसा व्यंग्य चित्र छपा जिसमें दीखया गया कि मुसलमान चूड़ीहार हिन्दू स्त्रियों को अपने जाल में फंसा कर उनको विधर्मी बना डालते है। यह व्यंग्य चित्र देखिए :

 

                                            हिन्दू घरों में तबलीग का प्रोपोगैंडा

 

 

                           स्रोत : माधुरी अक्तूबर 1927, वर्ष :6  खंड :1  संख्या : 3 पृ.697  

चाँद पत्रिका ने भी  हिन्दू समाज के भीतर यह हवा खूब उड़ाई कि मियाँ चूड़िहारों से  हिंदुओं को सावधान रहने की जरूरत है। यह मियां चूड़िहार हिन्दू  स्त्रियों  को बहला कर अपने कब्जे में कर लेते हैं।  चाँद पत्रिका  में मियाँ चूड़िहार पर छपा यह व्यंग्य चित्र देखिए  :

 

 

स्रोत : चाँद : नवंबर 1929, वर्ष : 8, खंड : 1, संख्या  : 1  

बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हिन्दी संपादक स्त्री-रक्षा  पर जोर देते दिखायी दिए। ऐसे संपादकों का कहना था कि विधर्मियों से स्त्रियों की रक्षा करना जरूरी है। माधुरी पत्रिका अगस्त 1927 के अंक में ‘स्त्री- रक्षा’ शीर्षक से एक लंबा संपादकीय लिखा गया। इस संपादकीय लेख में पहले तो स्त्रियाँ  के प्रति दया दृष्टि दिखाते हुये इस बात का स्मरण कराया गया कि स्त्रियाँ भी आदर की पात्र है। इसके बाद संपादकीय में कहा गया कि  स्त्रियों की रक्षा का  भार पुरुषों ने अपने ऊपर ले रखा क्योंकि ईश्वर ने पुरुषों को शक्तिशाली बनाया है। माधुरी के संपादक का अभिमत था कि हिन्दू समाज न तो अपनी स्त्रियों का आदर करता है न तो उनकी रक्षा का कोई उचित प्रबंध करता है। यह बड़े ही परिताप की बात है। माधुरी के संपादक ने दावा किया हिन्दू जाति के लोग  इतने कायर हो चुके हैं कि वह स्त्रियों की रक्षा विधर्मियों से नहीं कर प रहे है। माधुरी के संपकीय लेख में कहा गया कि, “वर्तमान हिंदू -समाज में न तो स्त्रियों का आदर है। और न उनकी रक्षा का प्रबंध है। यह बढ़े ही परिताप की बात है। पर यह परिताप सहस्र-गुना अधिक हो जाता है, जब हम देखते हैं कि मुसलमान गुंडे हिंदू स्त्रियों को नाना प्रकार से चरित्र भ्रष्ट करते हैं ; परंतु फिर भी हिंदू -समाज पर्याप्त परिमाण में संक्षुब्ध नहीं होता। जो जाति मरने पर होती है, जिसमें कायरता का प्राधान्य हो जाता है, वही जाति ऐसे अपमान सहन करने में समर्थ होती है । एक जीत-जागती जाति तो ऐसे दुराचरण को एक क्षण के लिये भी सहन नहीं कर सकती। समाचार पत्रों में नित्य ही यह समाचार पढ़ने को मिलता कि मुसलमान गुंडों ने हिंदू स्त्रियों का अपमान किया पर हिंदू लोग सिवाय इसके कि अपनी त्रियों से और भी अधिक परदा करा-उनको घर के बाहर और भी पैर न रखने में इसके सिवाय और कोई दूसरा प्रतीकार नहीं ढुड़ते हैं।”29  माधुरी के संपादक ने अपने संपादकीय लेख में  स्त्रियों के मसले पर कहा कि धार्मिक गुंडों को सबक सीखने के लिए  कठोरतम दंड का प्रावधान सरकार की ओर से निश्चय किया जाए। माधुरी के संपादक ने अपनी मांग रखते हुए लिखा कि, “यदि मुसलमान गुंडों का एक संगठित दल हो, जिनका काम केवल हिंदू स्त्रियों को ही छेड़ने का हो, जो प्रत्येक दशा में हिंदू स्त्रियों की इज्जत उतारने पर तुले हुये है, जिनमें यह भाव भरे गये हो कि हिंदू स्त्रियों का सतीत्व भंग करने से सवाब होता है तो ऐसे गुंडों की सजा हमारी राय में प्रचलित दंढ-विधान से नहीं हो सकती । ऐसे गुंडों को तो इतना कठोर दंड मिलना चाहिये कि एक बार सज़ा पा चुकने के बाद फिर उन्हें दोबारा गुंडई करने का साहस ही न हो । हमारा हिंदू समाज से यह नत्र निवेदन है कि ऐसे संगठित और ‘धार्मिक’ गुंडों को उचित पाठ पढ़ाने के लिये उन्हें सरकारी कानून को कठोरतम कराना होगा। यदि हिन्दू लोगअपनी स्त्रियों का सम्मान करना चाहते हैं, उनकी उचित रक्षा करना चाहते हैं, तो उन्हें अविलंब ऐसा कानून बन वाना चाहिये कि यदि ‘धार्मिक’ कारणों से प्रवृत्त होकर कोई गुंडई करता हो, तो उसको साधारण गुंडे से तीन चार गुना अधिक दंड दियाजाय।”30  

अब हम इस लेख की समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। निष्कर्ष में पाते है कि  बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक की स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत दिखायी देती हैं। वह अपने लेखन में विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह और व्यभिचार जैसे ज्लंत मुद्दे को सामने रख रही थी। बीसवीं सदी के दूसरे दौर की स्त्रियाँ अपने सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में बदलाव के लिए मर्दवादी मानसिकता  के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। इस पितृसत्तावादी समाज में स्त्रियाँ अपनी शिक्षा की दावेदारी का भी सवाल उठा रही थी। स्त्रियों की ओर से यह दावेदारी उस दौर में होती जब स्त्री बौद्धिकता पर मर्दवादियों का पहरा लगा हुआ था। आज के सौ साल पहले पितृसत्तावादी निर्मितियों के खिलाफ ज़मीन तैयार करना कोई छोटी बात नहीं थी। देखा जाए तो बीसवीं सदी के दूसरे और तीसर दशक के हिंदी संपादक स्त्री समस्या को आपदधर्म के तौर पर देख रहे थे। नवजागरण कालीन संपादकों और लेखकों की स्त्री-उद्धार की परियोजना हिन्दू धर्म की रक्षा करने पर टिकी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि स्त्रियों की दावेदारी का मसला अलग-थलग पड़ गया। हिंदी संपादक और लेखक स्त्री परियोजना के बहाने धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे। नवजागरण कालीन स्त्री-उद्धार आंदोलन में यह भी देखा गया कि हिंदी लेखक और संपादकों द्वारा बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में स्त्रियों को ढाल बनाकर इसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चेबंदी की पहलकदमी को अंजाम दिया। यहाँ तक हिन्दी नवजागरण कालीन संपादकों ने चूड़ी बेचने वाले मुसलमान मनिहारों को निशाना बनाकर उन्हें हिन्दू घरों में तबलीग फैलाने वाला बता दिया। यह सवाल लाज़मी है कि हिंदी नवजागरण कालीन संपादकों के लिए स्त्री मुक्ति से ज्यादा उनके लिए हिन्दू रक्षा का विषय प्रमुख मुद्दा बन गया था।

 

 

संदर्भ

 

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  • मानव जाति में स्त्री समाज,श्रीमती भाग्यवती विमला देवीजी, मनोरमा जनवरी 1929, वर्ष : 5, भाग: 2 संख्या : 4 , पृ.372
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  • समस्या पूर्ति,कुमारी अम्बा देवी विदुषी विशारद,महिला जनवरी 1925, भाग: 2 , संख्या : 1, पृ. 1
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  • पीर-पूजा,श्रीशोभरामजी धनुसेवक , चाँद,दिसंबर 1925, वर्ष : 4  खंड  : 1 संख्या : 2 , पृ. 195-96
  • स्त्री- रक्षा,संपादकीय, माधुर, अगस्त 1927, वर्ष : 6,  खंड  : 1 ,  संख्या :2  , पृ. 345
  • स्त्री- रक्षा, संपादकीय, माधुर, अगस्त 1927, वर्ष : 6,  खंड  : 1 ,  संख्या :2  , पृ. 346

लेखक का परिचय – नवजागरणकालीन  साहित्य के अध्येता और शोधार्थी

 

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