परिवारो में असमानता

रात को पति का मुंह मोड़ कर सोता है, या किसी-किसी का मॅरीटल रेप होता है। तो कोई कोई कपल महीनो तक संबंध नही बनाते हैं।यह भी तो हिंसा है।अगर शादी के बाद लडकी की इच्छा होने के बावजूद उसको नौकरी या व्यवसाय नही करने दिया जाता, यह भी हिंसा ही है। वह लडकी रात-रात भर को जागकर दिनरात एक करती है। पढाई करती है और फिर किसी दिन उसकी शादी होने के कारण उसके नौकरी करने पर रोक लगा दी जाती है , यह भी तो छिपी हिंसा ही है।

इस आलेख में प्रज्ञा मेश्राम बेहद छोटी और सामान्य सी दिखती घटनाओं के जरिये समाज में सहज हो चुकी स्त्री-पुरुष असमानता को स्पष्ट कर रही हैं:

यू तो भारतीय परिवार व्यवस्था के गुणगान गाये जाते हैं। कहा यह जाता है कि हमारी संस्कृति और संस्कारो की वजह से भारतीय परिवार व्यवस्था टिकी हुई है। यह कुछ मायनो में सही है।क्योकि भारतीय परिवार व्यवस्था मे लडकियों को अलग संस्कार और लडको को अलग संस्कार दिये जाते है। लडकी को खाना बनाना आना ही चाहिये और लडको को खेलकूद मे आगे बढने मे । पूरा घर लडके के करिअर की चिंता करता है। लडकी के देखभाल उसके व्यक्तिमत्व को सवारने मे किसी को ज्यादा रुचि नहीं होती है। लडकियों को थोडा बहुत पढाया भी इसलिए जाता है ताकी अच्छा लडका घर परिवार मिले । लडकी की जिम्मेदारी शादी तक ही समझी जाती है। कई बार लड़कियां इस प्रक्रिया में पढ़ लेती हैं। अच्छी डिग्रियां ले लेती हैं।

फिर शादी के बाद लडकी की जिंदगी जैसे गीता से सीता बना दी जाती है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वो सभी घरवालों के लिए नास्ता बनाये । बेचारी लडकी रात को इसी चिंता में सोती है की सुबह को नास्ते मे क्या बनाये ? अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले लिए ना बनाये।बेचारी लडकी रात कोइ सी चिंता में सोती है की सुबह को नाश्ते मे क्या बनाये ?अगर इडली डोसा बनाना है तो एक दिन पहले सुबह उसे दाल चावल़ भिगो के रखना पडता है और रात को पीस कर रखना पडता है। ढोकला, दोसा इडली के साथ कौन सी चटनी बनानी है उसकी साम्रगी घर पर लाके रखनी पडती है । साथ मे सांबर छोले भटूरे बनाने है तो रात को ही छोले भिगा कर मसाला पीस कर रखना पडता है ताकि सुबह जल्दी से नास्ता तैयार हो जाये। अब आप बोलेंगे पोहा बनाओ जल्दी हो जाता है लेकिन रोज रोज पोहा कौन खाता है भला ?

तो आपने देखा जो लडकी अपने सौहर जितना ही पढी लिखी थी, लडके जैसे ही होस्टेल मे या बाहार जाकर पढी थी, शादी हो तेही उससे अपेक्षा बदल गई जबकी लडके के साथ ऐसा कुछ बदलाव नही हुआ उल्टा उसके हाथ में टिफीन, टावल, मोबाईल, शर्ट , पॅन्ट साथ मे नास्ता खाना पानी देने वाली आ गई आप को लगेगा इसमे क्या बडी बात है। सभी करते आ रहे है। परंपरा है। इतना औरते करती ही हैं। क्या आपको इसके पिछे छिपी हिंसा नजर नही आ रही । लडकी का शोषण नही दिख रहा।एक ही जेंडर को क्यों करना है ये सब? कहाँ है समानता?

साथ में खाना खाना-
हम देखते है कि संयुक्त परिवार पद्धति में साथ में खाना खाने पर बहुत जोर दिया जाता है । कहा जाता है इससे परिवार में प्यार बढता है। पर क्या आपने गौर किया अगर प्रगतिशील घरो में भी महिला पुरूष साथ में खाना खा भी ले तो परोसता कौन है ?औरत । खाना बनाया किसने ? और कुछ कम ज्यादा लगा तो डायनिंग रूम से दौडकर किचन में किसको जाना है -नमक कम है तो औरत दौड लागाएगी, सलाद की फरमाईश हुई तो औरत बनाएगी । यहाँ पर कुछ पुरुष आकर बोलेंगे की हम भी खाना बनाते है । भाई महीने मे एक बार खाना बनाने मे और दिन में तीन बार खाना बनाने का मुकाबला क्या है?

बातचीत बंद-
घर में अगर कहा सुनी हो जाती है तो, या औरत से कुछ कम ज्यादा हो जाये तो, सीधे पुरूष बातचीतत बंद कर देते हैं- क्योंकि वह तो प्रगतिशील है, मार नही सकता । मारना गुनाह है, ये इनको पता है। या एक-आध बार एक-आध थप्पड लगा भी देते हैं। इसमे कौन सी बडी बात रहती है उनके लिए। अगर लडका बहू को मार भी रहा है यह पता भी चले तो वही संयुक्त परिवार पद्धति के घर के सद्स्य उनके बीच नही आयेंगे। उनके अनुसार ये दोनो के आपस का मामला है कहेंगे। इस बीच घरवाले बातचीत बंद कर देते है। लडकी को ही इग्नोर करते है । उसी की गलती निकालते है। ‘‘चुप्प रहना था, उस समय इसने बोलना नही चाहिए था’’। ‘‘इसने आवाज उॅंची करके बात नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘मायके नही जाना चाहिए था’’। ‘‘सहेलियों संग जाना नही चाहिए था’’। ‘‘घर आने में देरी नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘महंगी साडी नहीं खरीदनी चाहिए थी’’। ‘‘बाहर खाने की मांग नही करनी चाहिए थी’’। ‘‘वही जोर से हसना नही चाहिए था’’। ‘‘ऐसे कपडे नही पहनने चाहिए थे’’। ‘‘घरवालों की सेवा करेगी तो क्या मर जाएगी’’। ‘‘हमारे जमाने मे तो क्या-क्या नही करते थे’’। ‘‘ससुरालवालो तक का मारना पीटना सह लेते पर उफ्फ तक नही करते थे।” ‘‘आजकल की लड़कियां एक थप्पड नही सह सकती’’। ‘‘इनके माँ बाप कुछ संस्कार ही नही दिये लडकी को’’। ‘‘इतना पढाने से अच्छा होता घर के काम काज सिखाते लडकी को तो आज ऐसे दिन न देखने पडते’’।

छिपी हिंसा :
रात को पति का मुंह मोड़ कर सोता है, या किसी-किसी का मॅरीटल रेप होता है। तो कोई कोई कपल महीनो तक संबंध नही बनाते हैं।यह भी तो हिंसा है।अगर शादी के बाद लडकी की इच्छा होने के बावजूद उसको नौकरी या व्यवसाय नही करने दिया जाता, यह भी हिंसा ही है। वह लडकी रात-रात भर को जागकर दिनरात एक करती है। पढाई करती है और फिर किसी दिन उसकी शादी होने के कारण उसके नौकरी करने पर रोक लगा दी जाती है , यह भी तो छिपी हिंसा ही है।

दोहरा बोझ
अगर किसी घरमें नौकरी या व्यवसाय करने भी दिया जाता है।तो घर की पूरी जिम्मेदारी संभालकर नौकरी/व्ययसाय करने की अपेक्षा की जाती है। ‘‘करना है तो कर, नही तो छोड दे’’। हम ने तो पहले ही बोला था नही करना। अब ज्यादा काम होते हैं। तो हम क्या करे’’। ‘‘जबसे नौकरी करने लगी है मेरे बेटे की तरफ तो ध्यान ही नही इसका, अरे मेरे बेटे का नही कम से कम अपने बच्चों का खयाल करना चाहिए’’।तो मुझे जानना है कितने प्रतिशत पुरूष घर के काम करके नौकरी करने जाते है ? और कितने परसेंट पुरूष आफिस छुटते ही घर की ओर आते है? ‘हिरणी’ की तरह? काम से लौटते ही काम पर लग जाते है? फिर औरत पर ही क्यों है ये डबलबर्डन? इसमें औरत को मानसिक और शारीरिक हालत कमजोर होने की संभावना होती है।

नाम बदलना-
शादी के बाद कुछ लड़कियों के नाम बदले जाते हैं। कारण दिया जाता है हमारे घराने मे फलाने फलाने अक्षर की बहुएं घर के लिए सफल साबित हुई है । हमारे घर में यह नाम पहले से है । इसका भी यही नाम, उसका भी वही नाम, इसलिए।तो इस तरह के ढेरों कारण बताये जाते है।शादी के बाद पुरूष के नाम बदलते है ये सुना है कभी आपने?

सरनेम बदलना-

शादी के बाद तुरंत लड़की अपने पति की सरनेम की पूछ जोड देती है। अपना नाम बताते हुए अपना सरनेम पुरी तरह से बाद में महत्त्वपूर्ण कागजों पर भी बदल ही देती है। शादी के बाद लडकी का सरनेम बदलने के रिवाज का इतना सामान्यी करण हुआ है कि, यह पढते वक्त भी पाठकों को लगेगा यह क्या बात है, यह तो सदियों से चलता आ रहा है। अगर शादी के बाद लडके का नाम नही बदलता, तो सिर्फ लडकी का नाम ही सदियों से क्यों बदला जा रहा है?

कन्यादान-
आज भी लडकी को दान में दिया जाता है। यह दान बडी धूम धाम से हजारों लोगो के सामने दिया जाता है।कन्यादान प्रथा बंद होना जरूरी है । क्यों देना है दान ?क्या बेटादान सुना है कभी आपने?

शादी की भिन्न जिम्मेदारी-
शादी के बाद शादीसुदा दिखने की जिम्मेदारी भी औरतो पर ही है। वह शादी कर चुकी कि नहीं, यह बिन बताये समझने के लिऐ मंगलसूत्र, बिछुये पहना दिए जाते हैं और मांग मे सिंदुरभर दिया जाता है। जबकि शादी के बाद पुरूष की शादी हुई है या नही हुई है यह जानने के लिए उसके शरीर पर कोई निशानी नही लादी जाती है । न वह मंगलसूत्र पहनता है, वो मांग में सिंदुर भरता है, न वह बिछुये पहनता है।यह सब परंपरा औरतो के सिर परही मढी जाती है ।

व्रत-
करवाचौथ जैसे व्रत, छठ पूजा जैसे तमाम व्रत औरतो को ही करने पडते हैं। जबकी त्योहार मे दोहरा श्रम औरतो को करना पडता है और उपर से भूखा भी रहना पडता है ।

स्थानांतरण-
अ) घर और अपनो को छोडना-
भारतीय परिवार व्यवस्थामें शादी के बाद लडकी को ही अपना घर छोडना पडता है।उसके अपने घर छोडने पडते है।एक दो मामले मे ही लडका घरजमाई बनकर आता है। घर जमाई बनना भी समाज की नजर मे निचलेस्तर का समझा जाता है । इसमें वो सम्मान नही दिया जाता जो ‘घरबहू’बनाने मे दिया जाता है । घरजमाई भी घरबहू की तरह काम नही करते। इसमे उनको विशेषाधिकार मिल जाते हैं।

ब) शादी करते समय ही लडकी हर तरह से कमजोर देखी जाती है। लडके से कम पढी, लडके से कम हाईट की, लडके से कम कमाने वाली, लडके से कमजोर आर्थिक स्थिति की, ताकि वो शादी के बाद भी दबी हुई रहे, जो घर की राजनीति में सत्ताधारी है उसकी गुलाम बनकर रहे। शादी के बाद वह अपना मायका छोडकर लडके के घर रहने आती है।यह उसका पहला स्थानांतरण होता है। बाद में लडका जहाँ-जहाँ जाब करेगा उसके पीछे पीछे उसका भी सिर्फ घर संभालने के लिए स्थानांतरण होता है। सरकारी नौकरी वाला पति हो, तो जहाँपति का ट्रान्सफर हुआ, उसके पीछे चली जाती है।उसका करिअर, उसके सपने, इनका मोल बहुत ही कम है।

क) बिदाई-
अगर जेंडर इक्वालीटी के हिसाब से देखा जाये तो एक ही जेंडर की बिदाई प्रथा पर रोक लगानी चाहिए।विदेशों की तरह दोनो की बिदाई उनके अपने घर में होनी चाहिए।

स) वेशभूषा में परिवर्तन-
शादी के वक्त से ही लडकी की वेशभूषा में परिवर्तन अपेक्षित रहता है। टी शर्ट, लोअरमें घुमनेवाली लडकी साडी और भारी भरकम लहंगे में शादी करती है।शादी मे पारंपारिक कपडे फैशन के नाम पर पहना दिये जाते है । क्योंकि ये समाज स्वीकृत होते है । शादी के बाद लडकी जो कपडे पहनती है उसको समाज की स्वीकृति होना अति आवश्यक समझा जाता है। ज्यादा से ज्यादा सलवार पहनने की सहुलि यत कुछ परिवारों में मिल जाती है। शादी के बाद सिर्फ साडी ही नहीं पहनना होता है, साड़ी का पल्लू ओढकर घर के काम करना पडता है । यह हिंसा बुजुर्ग के मानसम्मान के नाम पर होती है। मानसम्मान लडकी को ही क्यो करना है? लडका शादी के बाद एक आध टावल, दुपट्टा ओढकर अपने ससुराल वालों का मानसन्मान क्यो नही करता? यह अपेक्षा एक ही जेंडर से क्यो की जाती है?

बच्चे किसके पास रहते है?
देखा जाता है कि, जहा स्त्री और पुरूष दोनो नौकरी करने वाले होतो हैं, घर में वापस आने के बाद घर का दोहरा बोझ औरत ही उठाती है। साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि दोनो अलग-अलग जगह पर नौकरी पर हो तो बच्चे हमेशा नौकरी करनेवाले औरत के साथ ही रहते हैं, अगर बच्चे दूध पीते नही हों, फिर भी। यह भी बडी असमानता भारतीय परिवारो मे देखी जाती है।

इस तरह से हम देखते है अनेक घरों में विविध तरह की असमानतायें देखी जा सकती है अगर हम जागरूक होकर जेंडर-समानता की दृष्टि से देखना चाहें तो।