महिलाओं के हित में है जाति गणना

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा समाज हजारों वर्षों से मनुवादियों द्वारा रचित सामाजिक अन्याय की व्यवस्था का शिकार रहा है और मैं यहां यह भी जोड़ना चाहूंगी  कि यदि किसी वर्ग की सामाजिक वंचना को समाप्त करने संबंधी उपयों में बहुत देरी की जाए तो उस वर्ग में असंतोष मुखर होने लगता है जो कि कभी-कभी हिंसा का मार्ग अपनाने तक चला जाता है। प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहे देश में ऐसा न होने पाए उसके लिए समय पूर्व सतर्कता अतिआवश्यक है। बिहार की सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की अवधारणा साकार होने वाले सपने का रूप ले लेगी।

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02 अक्टूबर, यानि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म दिवस।इस ऐतिहासिक तिथि को नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की सरकार ने जातिगत गणना के आंकड़े को जारी कर भारत के इतिहास में और भी खास बना दिया। सही मायने में सामाजिक न्याय की पैरोकारी में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को इससे सुंदर कोई श्रद्धांजलि हो ही नहीं सकती। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बिहार की सरकार बधाई की पात्र है।

वस्तुतः बोलचाल की भाषा में हम जिसे जाति जनगणना कहते हैं उसे तकनीकी शब्दावली में सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग (SEBC) गणना कहा जाता है क्योंकि ओबीसी का अधिकारी संवर्ग नहीं है। ज्ञातव्य है कि आजादी के समय से ही दशकीय जनगणना में अनुसूचित जाति (एस0सी0) एवं अनुसूचित जनजाति (एस0टी0) के अन्तर्गत आने वाली जातियों को गिना जाता रहा है तथा शेष को सामान्य श्रेणी में मान कर उनकी जाति दर्ज नहीं की जाती है। परन्तु आजाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि न सिर्फ जातियों की गिनती की गई है बल्कि इसके आंकड़े सार्वजनिक किए गए हैं।

इसके पूर्व 2011 में मुख्य जनगणना से अलग सामाजिक आर्थिक जाति गणना के तहत जातिगत जनगणना की गई थी, किंतु इनके आंकड़े अभी तक जारी नहीं किए गए। दरअसल समाज के एक बड़ा तबका (ओबीसी/ईबीसी) जो हजारों सालों से हाशिए पर रहा है के द्वारा जातिगत जनगणना की मांग की जाती रही है इसके जोर पकड़ने का सबसे प्रभावी कारण आरक्षण है। देखा जाए तो पिछड़ा वर्ग एवं अतिपिछड़ा वर्ग की कुल आबादी का 63 प्रतिशत होने के बावजूद भी समाज के हर क्षेत्र यथा राजनीति, नौकरशाही, न्यायिक व्यवस्था, सरकारी नौकरी, पत्रकारिता एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इनकी हिस्सेदारी नगण्य है। बीते समय के दो परिवर्तनों ने इसकी गति और तेज कर दी है, पहला ई0डब्लू0एस0 आरक्षण दूसरा राज्यों को ओबीसी वर्ग की पहचान करने का अधिकार दिया जाना। इन दोनों संशोधनों से दो संभावनाएं पैदा हुई। पहली यह है कि आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा अमान्य हो सकती है और दूसरी यह है कि राज्य अपने स्तर पर ओबीसी वर्ग की पहचान सुनिश्चित कर उसी अनुपात में उन्हें आरक्षण का लाभ दे सकें। सच कहा जाए तो इन्हीं दोनों संभावनाओं ने जाति आधारित गणना की मांग को सम्पूर्ण देश में मजबूत किया है। इस मांग को और गति मद्रास उच्च न्यायालय के एक फैसले ने दे दी जिसमें जाति आधारित गणना को आवश्यक बताया। अब जबकि बिहार की सरकार ने इस मांग के महत्व को समझते हुए जाति आधारित गणना को संभव बनाकर आंकड़े आम जनता के सामने रखे हैं, मेरा मानना है कि तीन कारणों से यह कदम सर्वाधिक सराहनीय है। पहला कारण यह है कि यदि कोई सामाजिक वर्ग वंचना का शिकार है तो उसे मुख्यधारा में ले आने के लिए सबसे प्राथमिक कार्य है उसकी वास्तविक स्थिति का अध्ययन किया जाय। बिहार सरकार द्वारा किये गये इस अध्ययन ने उनकी वास्तविक संख्या, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति को देश के सामने लाकर रख दिया है अब उनके उत्थान हेतु नीति का निर्माण संभव हो पायेगा। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा समाज हजारों वर्षों से मनुवादियों द्वारा रचित सामाजिक अन्याय की व्यवस्था का शिकार रहा है और मैं यहां यह भी जोड़ना चाहूंगी  कि यदि किसी वर्ग की सामाजिक वंचना को समाप्त करने संबंधी उपयों में बहुत देरी की जाए तो उस वर्ग में असंतोष मुखर होने लगता है जो कि कभी-कभी हिंसा का मार्ग अपनाने तक चला जाता है। प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहे देश में ऐसा न होने पाए उसके लिए समय पूर्व सतर्कता अतिआवश्यक है। बिहार की सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की अवधारणा साकार होने वाले सपने का रूप ले लेगी। कोई भी देश सही अर्थों में तभी विकसित व सफल राष्ट्र की श्रेणी में आता है, तब वह समाज के सभी वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करता है। सरकार का यह कदम सभी जातियों के मध्य व्याप्त विसंगतियों के समाधान की ओर एक सार्थक कदम है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद से ही कुछ राजनीतिक दल एवं मीडिया का एक विशेष वर्ग इस बात को परोसने की लगातार कोशिश कर रहा है कि बिहार सरकार के इस कदम से जातिगत विद्वेष बढ़ेगा और देश में जाति आधारित राजनीति को बढ़ावा मिलेगा। यह तथ्य तो सर्वविदित है कि भारत की राजनीति में जाति का प्रभाव हमेशा से रहा है और आगे भी बने रहने की पूरी आशंका है। हमें यह समझना चाहिए कि यह समस्या लोकतंत्र की व्यवस्था में व्याप्त कमियों को दर्शाती है जिसका समाधान वैचारिकी के स्तर पर अभी बाकी है इस उपर्युक्त तर्क के आधार पर हजारों वर्षों से शोषित एवं वंचित समाज को उनके उचित अधिकार से दूर नहीं रखा जा सकता है। एक महिला की नजर से किसी भी राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में महिलाओं की भूमिका को कदापि नकार कर नहीं चला जा सकता है। महिला एवं पुरूष दोनों समान रूप से समाज के दो पहियों की तरह कार्य करते हैं और समाज एवं राष्ट्र को प्रगति की ओर ले जाते हैं। बिहार सरकार द्वारा जाति आधारित गणना के प्रकाशित आंकड़ों का सन्दर्भ देते हुए मैं इस विदित तथ्य को प्रकाश में लाना चाहती हूँ कि इन आंकड़ों में आधी आबादी भी शामिल है जो सामाजिक अन्याय की विभिषिका को वर्षों से झेल रही है। केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए महिला आरक्षण में वंचित समाज की महिलाओं के लिए अलग से किसी प्रकार के प्रावधान नहीं किए गए हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। बिहार सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से महिलाओं के अंदर विशेष कर वंचित समाज की महिलाओं के अंदर तीव्र आशा का प्रकाश फैला है। विदित हो कि वर्ष 2006 में पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने वाला देश का पहला राज्य बिहार ही रहा है। बाद में कई दूसरे राज्यों ने इसका अनुकरण किया। जाति आधारित जनगणना से सभी वर्ग की महिलाएं और उनके परिवार के सदस्य आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के मामले में समृद्धि का मापदंड बना सकती हैं। सरकार के इस कदम से निम्नलिखित बिन्दुओं पर निश्चित रूप से महिलाओं को लाभ मिलने की उम्मीद की जा सकती है।

1. सरकारी योजनाओं का लाभ:- जाति आधारित जनगणना से मिली सटीक जानकारी के आधार पर सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर पड़ी महिलाओं को लाभ होगा। इन आंकड़ों का उपयोग सरकारी योजनाओं में होगा। महिलाएं विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकती हैं जैसे कि शिक्षा, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसर।

2. महिला शिक्षा को प्रोत्साहन:- जानकारी के आधार पर सरकार महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना सकती हैं। बिहार में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है (51.50 प्रतिशत, जनगणना 2011)

3. समाज में समानता की दिशा में कदम:- जनगणना में जाति आधारित जानकारी की उपलब्धता से समाज में समानता की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। इसके परिणाम स्वरूप महिलाएं समाज में अधिक भागीदारी कर सकती हैं और समाज में बेहतर स्थिति प्राप्त कर सकती हैं।

4. समृद्धि के लिए सरकारी नीतियां:- जनगणना के आंकड़ो के आधार पर सरकार नीतियों की समीक्षा कर सकती है और महिलाओं के लिए उन्हें अधिक समृद्धि के उपायों की ओर प्रेरित कर सकती है।

5. महिला विकास से महिला नेतृत्वकारी विकास की ओर:- जाति आधारित गणना से निश्चित रूप से वंचित समाज की राजनैतिक हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। महिला नेतृत्वकारी विकास का श्रंृखला-प्रभाव निर्विवाद है क्योंकि एक शिक्षित और सशक्त महिला आनेवाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करेगी। बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने कहा था, ‘‘मैं किसी समाज के विकास की स्थिति वहां की महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति से मापता हंू’’। मुझे पूर्ण विश्वास है कि बिहार सरकार के इस कदम से बाबा साहेब की संकल्पनाओं को मूर्त रूप मिलेगा और यह कदम समाज के हर तबके को विकसित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा साथ ही सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए पथ-प्रदर्शक बनेगा।