कला-संस्कृति

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी  ( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. ) सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने...

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की...

आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर : चौथी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  'अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की'की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर...

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट  'रेमो'  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा 'अन्ना केरेनिना' अपना प्यार ढूंढने आई है... पुराना घर, ढेर सारी पुरानी...

*‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ : यथार्थवादी कॉमेडी

जावेद अनीस एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com javed4media@gmail.com भारत में एक बार आप राजनीति और सरकार पर...

आये तुम इस धरती पर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

  प्रो. परिमळा. अंबेकर ( कर्नाटक के गुलबर्गा में १० दिनों तक के एक कला शिविर में महात्मा बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं को उकेरा कलाकारों ने...

स्त्री के रंगों की दुनिया

परिमला अंबेकर कलाकारों की कल्पना में कैद स्त्री, कलाकारों के सौन्दर्यबोध की कसौटी स्त्री, कलाकारों के रंगों के लिए कैनवास पर वस्तू बनकर बिखरती स्त्री,...

युवाओं के गायक संभाजी समाज बदलने के गीत गाते हैं

कुसुम त्रिपाठी स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं , जिनमें ' औरत इतिहास रचा है तुमने','  स्त्री संघर्ष  के सौ वर्ष ' आदि चर्चित...

मैं स्त्रीवादी नहीं ,मार्क्सवादी हूँ : श्रीलता स्वामीनाथन

बात 2004 की है. श्रीलता स्वामीनाथन को स्त्रीकाल के लिए हम श्रीराम सेंटर में इंटरव्यू कर रहे थे. एक युवक काफी देर से हमें...

आप योनि को किस निगाह से देखते हैं, यह सवाल मेरे लिए बेमानी है…

कल्पना पटोवारी मुझे नहीं पता कि खलनायक फिल्म का वह गीत आपको कैसा लगता है जिसके बोल हैं - ‘चोली के पीछे क्या है, चुनरी...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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