कला-संस्कृति

पेंटिंग में माँ को खोजते फ़िदा हुसेन

डा. शाहेद पाशा  मकबूल फ़िदा हुसेन ने अपनी कलाकृतियों में स्त्री को दर्शाते हुए न जाने कितने ही ऐसे चहरों को रंगा है, जिसकी दुनियाँ...

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट  'रेमो'  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा 'अन्ना केरेनिना' अपना प्यार ढूंढने आई है... पुराना घर, ढेर सारी पुरानी...

*‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ : यथार्थवादी कॉमेडी

जावेद अनीस एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com javed4media@gmail.com भारत में एक बार आप राजनीति और सरकार पर...

आये तुम इस धरती पर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

  प्रो. परिमळा. अंबेकर ( कर्नाटक के गुलबर्गा में १० दिनों तक के एक कला शिविर में महात्मा बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं को उकेरा कलाकारों ने...

स्त्री के रंगों की दुनिया

परिमला अंबेकर कलाकारों की कल्पना में कैद स्त्री, कलाकारों के सौन्दर्यबोध की कसौटी स्त्री, कलाकारों के रंगों के लिए कैनवास पर वस्तू बनकर बिखरती स्त्री,...

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की...

आंबेडकरी गीतों में रमाबाई और भीमराव आंबेडकर : चौथी क़िस्त

शर्मिला रेगे की किताब  'अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल  पैट्रीआर्की'की भूमिका का अनुवाद हम धारावाहिक प्रकाशित कर...

युवाओं के गायक संभाजी समाज बदलने के गीत गाते हैं

कुसुम त्रिपाठी स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं , जिनमें ' औरत इतिहास रचा है तुमने','  स्त्री संघर्ष  के सौ वर्ष ' आदि चर्चित...

कान फिल्म महोत्सव में मेरी बेटी (बेटी की शिखर-यात्रा माँ की नजर में)

कान फिल्म फेस्टिवल, 2018 में फ़कीर, मंटो, शॉर्ट फिल्म सर और अस्थि सहित भारत से विविध भाषाओं की 63फ़िल्में गयी थीं. अस्थि माँ-बेटी के परस्पर लगाव...

‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

ललिता धारा  सोलह सितम्बर, 2016 को ‘पिंक’ देश भर में रिलीज़ हुई. लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने उसे 4 स्टार की रेटिंग दी. यह टाइमपास...
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लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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