‘पिंक’एक आज़ाद-ख्याल औरत की नज़र से

ललिता धारा  सोलह सितम्बर, 2016 को ‘पिंक’ देश भर में रिलीज़ हुई. लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने उसे 4 स्टार की रेटिंग दी. यह टाइमपास...

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी  ( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. ) सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने...

रंगमंच में हाशिये की सशक्त आवाज़ है ईश्वर शून्य का रंगकर्म

राजेश चन्द्र दिल्ली का रंगमंच संख्यात्मक दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय रहता आया है, क्योंकि यहां महीने में औसतन तीस से पचास नाटक मंचित होते हैं...

लेखिका ने गिनाये प्रगतिशील लेखक संघ के महिला विरोधी निर्णय: संघ सेक्सिस्ट पुलिसवाले के...

उस समय विवाद उठा था कृष्ण कल्पित जी कि कुछ पहले अनामिका जी से कि गई बदतमीजी पर। लेकिन वी॰एन॰ राय भी वहाँ मौजूद थे। वहाँ भी सवाल उठाया था, जवाब मिला, “जब मैत्रेयी पुष्पा जी उत्सव मे मौजूद हैं और उन्हे कोई ऐतराज नहीं तो किसी को क्यों ऐतराज हो ।“ खैर, इस साल जब वे नहीं थे तो हमे लगा कि शायद हमारे कहने का कुछ असर हुआ हो। लेकिन कहाँ साहब ? यहाँ तो वरिष्ठ कवि, मंच से ही महिला विरोधी गाली दे गए और विरोध केवल मैंने और सुजाता ने दर्ज किया । वैसे संबंध हमारे समानान्तर साहित्य उत्सव के सभी आयोजकों से बहुत अच्छे हैं ।

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...

बनारस घराने की अंतिम ठसक का विदा-लेख

अभिषेक श्रीवास्तंव  बुधवार की शाम बनारस बेचैन था और कलकत्ता मौन। काल के निरंतर प्रवाह में सदियों से ठिठके हुए ये दो शहर जो हमेशा...

दिल्ली सरकार के खिलाफ आगे आये रंगकर्मी: मनीष सिसोदिया सवालों से बचते नजर आये

रंगकर्मियों के प्रदर्शन कभी-कभी के ही दृश्य होते हैं. रंगकर्म की अस्मिता और उसकी स्वायत्तता बचाये रखने के लिए रंगकर्मियों के एक समूह ने...

उम्मीदों के उन्मुक्ताकाश की क्वीन

नीलिमा चौहान पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक 'बेदाद ए इश्क' प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. एंड दे...

सामंती हवेलियों में दफ्न होती स्त्री

शिप्रा किरण सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ. संपर्क:kiran.shipra@gmail.com साहित्य के फिल्मी रूपांतरण की कड़ी में यूँ तो कई फ़िल्में आईं हैं किन्तु कुछ ही...

वर्जिनिटी का नहीं है सवाल … सवाल ना का है . !

प्रो परिमळा अंबेकर ‘‘व्हेन यू लास्ट युवर वर्जिनिटी ... जोर -जोर से वकील साब अपने क्लाइंट से पूछे जा रहे थे । और इस सवाल...
250FollowersFollow
644SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
Loading...