चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ग्रन्थावली

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

भारत के राजनेता: अली अनवर

स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

बहुजन परंपरा की ये किताबें पढ़ें

डेस्क  स्त्रीकाल की अनुषंगी संस्था 'द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन ' की आगामी किताबों की अग्रिम बुकिंग शुरू है. आगामी तीन से चार सप्ताह में आने वाली किताबों...

मैंने अमित शाह को गुंडा (इसलिए) कहा…..राना अय्यूब

मुकुल सरल   “ये किताब एंटी मोदी या एंटी अमित शाह नहीं है, ये किताब उन लोगों के लिए जस्टिस की किताब है। हम आपको सिर्फ...

गुजरात दंगों में साहब कौन थे और क्या कर रहे थे बताने वाली किताब...

राजीव सुमन  राणा अयूब की यह किताब  गुजरात दंगे की भीतरी परत के पीछे के सच को नंगा करती है एकदम जासूसी उपन्यास के अंदाज़...

पढ़ें जगरनॉट एप पर हिन्दी की बेहतरीन किताबें

 पूजा मेहरोत्रा जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड अपने हिंदी पाठकों के और करीब पहुंच गया है। उसने अपने पाठकों को जगरनॉट हिंदी एप की सौगात दी...

ऑब्जेक्ट से सब्जेक्ट बनने की जद्दोजहद

सुधा उपाध्याय जानकीदेवी मेमोरियल कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं संपर्क:ईमेल:sudhaupadhyaya@gmail.com हमने जो तर्ज़े-फुगाँ की थी कफ़स में ईजाद फैज़ गुलशन में वही तर्ज़े-बयाँ ठहरी है….(फैज़अहमदफैज़) क्या...

प्रत्यक्ष प्रमाण से आगे और सूक्ष्म संवेदना की कविताएं : अभी मैंने देखा

सुनीता गुप्ता अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित ‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन है, जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक...

ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित  आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति-...

स्त्री मुक्ति के प्रश्न

कर्मानंद आर्य मह्त्वपूर्ण युवा कवि . बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929 अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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