भगवान! ‘एक कटोरा भात खिला दो बस, भारत में भात नहीं मिला’

ज्योति प्रसाद  शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com स्वर्ग और नरक के बीच भूखी बच्ची वहाँ भी फंस गयी, उम्र 11 साल. क्या...

क्या इसे ही जंगलराज कहते है योगी जी

योगी जी इधर आप रोमियो स्क्वैड बना रहे हैं  उधर आपके राज्य के दबंग बलात्कार पीडिता को तेज़ाब पिला रहे हैं. क्या इसी को...

मगध में छठ : स्त्रीवादी पाठ

संजीव चंदन  मगध का सांस्कृतिक प्रतीक “छठ पूजा’ स्त्रियों के लिए  एक व्यापक अवसर मुहैय्या कराता है, घर से बाहर सामूहिक अभिव्यक्ति  का, धार्मिक भावनाओं...

सामूहिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब है स्त्रीविरोध का अनफेयर गेम

ज्योति प्रसाद इसी बेसर्दी के महीने दिसंबर में द इक्नॉमिक्स टाइम्स ने एक सूचना छापी है कि विनी कॉस्मेटिक्स जो फॉग सेंट भी बनाती है...

बलात्कार-बलात्कार में फर्क होता है साहेब !

पूजा सिंह पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com महमूद फारूकी को बलात्कार के मामले...

“मोर्चे पर कवि” / राजा रोज कुरते बदलता है/लेकिन राजा नंगा है

 जनता के बीच सीधे जाकर अपनी कविताओं की प्रस्तुति द्वारा देश में बढ़ते जा रहे साम्प्रदायिक तनाव के माहौल में सकारात्मक हस्तक्षेप और प्रतिरोध...

महज मुद्दा

संजीव चंदन ( आज के जनसत्ता से साभार इस आलेख में संजीव चन्दन इसकी पड़ताल कर रहे हैं कि महिला आंदोलन की अगुआई में...

तीन तलाक, समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार: पहली किस्त

जावेद अनीस एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com javed4media@gmail.com तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह से शुरू हुई बहस...

बिल्डर और डीडीए के गुंडों ने मुझे मारा, शुरुआत दिल्ली पुलिस ने की थी:...

‘पहली शुरुआत तो जरूर पुलिस ने की थी, लेकिन उसके बाद दिल्ली डेवलॉपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) के और बिल्डर के गुंडों  के हवाले कर दिया....

महिला की मुहीम का असर: पासपोर्ट अधिकारी ‘मिश्रा’ का तबादला, अंतर्धार्मिक विवाह को आधार...

आवाज उठाने पर कट्टरपंथ के खिलाफ भी जीता जा सकता है. इसका ताजा उदाहरण है लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी 'विकास मिश्रा' पर कार्रवाई. उसने...
245FollowersFollow
644SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
Loading...