दोस्त तथा अन्य कविताएं(पूजा यादव )

पूजा यादव 1- दोस्त तुम जैसे हो वैसे ही रहना मेरे दोस्त तुम मत बदलना किसी के लिए मेरे लिए भी नही क्योंकि तुम जैसे हो उसी से मैंने प्रेम...

स्त्री विमर्श की वैचारिकी में मील पत्थर है ‘बधिया स्त्री’

ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह (शोधार्थी)     आज हम लोग जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें समाज के उपेक्षित वर्गों के हित के पक्ष में...

मेरे हमदम मेरे दोस्त ( दूसरी किस्त ) : रजनी दिसोदिया

रजनी दिसोदिया कहानी कार मुकेश मानस की कहानियों को पढ़ने के बाद स्त्री के पक्ष में स्थितियाँ चाहे बहुत बेहतर न हों पर यह उनकी...

मेरे हमदम मेरे दोस्त ( पहली किस्त ) : रजनी दिसोदिया

रजनी दिसोदिया  दलित पुरुष के लेखन में स्त्री इस मुद्दे पर दलित स्त्री विमर्श प्राय: उत्तेजित और आवेशमयी मुद्रा में रहता आया है। वास्तव में यह...

हाशिमपुरा का प्रेत तथा अन्य कविताएं ( ललिता यादव )

ललिता यादव  1. हाशिमपुरा का प्रेत    मेरे घर और हाशिमपुरा के मध्य बहता है एक बेहद गंदा नाला इक्कीस वर्ष पूर्व मुझ नववधू को बड़े गर्व से छत...

‘तसलीमा के लिए’ पूजा तिवारी की अन्य कविताएं

पूजा तिवारी तसलीमाएं  कब-कब बनती हैं 'तसलीमाएं' ? उसने पूछा । मैंने कहा, जब-जब रौंदा जाता है एक स्त्री के आत्मसम्मान को तभी तसलीमा जनमती है, जब स्त्री की...

संघर्ष और सफलता की कड़ी

डॉ. कौशल पंवार आज के दिन मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में ज्वाइन किया था, पूरे बारह बरस आज...

प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले एक अच्छी कवयित्री थीं

सुमित कुमार चौधरी  वर्ष 2019 के जाते-जाते देशभर में जो राजनीति और शैक्षणिक बहस छिड़ी हुई है वह हमारे भविष्य के लिए बहुत ही विशेष...

यात्रा साहित्य का स्त्री पक्ष

प्रीति कुमारी                                                                                       प्रस्तुत आलेख में यह देखने की...

हवा व अन्य कविताएँ (डॉ. मिथिलेश)

हवा हवा में, खून की सड़ांध... हर कहीं, से आती एक चीख़ मुझे, जीने नहीं देती । निर्भया, आसिफा  और अनगिनत शक्लें... पूँछती हैं... क्या यही – वह, सभ्य समाज...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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