विद्रोह: क्रांतिकारी परिवर्तन का उपन्यास.

'विद्रोह' युवा साहित्यकार कैलाश चंद चौहान का तीसरा उन्यास है। इससे पहले कैलाश चंद चौहान का पहला उपन्यास 'सुबह के लिए' तथा दूसरा उपन्यास...

नबनीता देव सेन की कविताएं

7 नवंबर 2019 को कैंसर की वजह से नबनीता देव सेन नहीं रहीं. बंगाल की कवयित्री, गीतकार, व्यंग्य लेखिका राधारानी देबी की बेटी पद्मश्री...

माँ मैं आपकी गुनाहगार हूँ!

मां और मैं साथ में बैठे थे. मां ने धीरे से मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया था. मैं और मां ऐसे ही बहुत देर तक बैठे रहे. मैने मां को स्पेन जाने के बारे में बताया और कर्नाटक के बारे में भी बाताया. मां ने बालों में हाथ फ़ेरते हुए ही कहा कि कब जाना है तो मैने अपनी डेट बता दी कि 30.10.2018 को कर्नाटक और फ़िर अगली रात यानि दो को स्पेन जाना है. मैने लेटे लेटे ही कहा कि-“अब की बार तू मेरे पास नहीं थी इसलिए मैं आ गयी जाने से पहले मिलने”. मेरी हर विदेश यात्रा में जाने से पहले मां मेरे साथ रही है लेकिन अब की बार नहीं थी मेरे पास दिल्ली में.

बौद्ध देश की यात्रा-2

वहाँ के लोगों में वो अनुशासन हर चीज़ में दिखाई देता है। चाहे बाथरूम हो, घर हो, रेस्टरूम हो, सार्वजनिक जगह हो या कोई अपनी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी ही क्यूँ न हो। रेस्टरूम जो मेरे जहन के सबसे करीब रहता है। शायद इसलिए की इसके अनुभव मेरे जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। इसलिए किसी भी देश में जाऊं मेरा ध्यान बरबस ही इस ओर चला जाता है।

बौद्ध देश की यात्रा

बुद्धिज्म के मायने क्या है, इसे मैंने जापान में अनुभव किया है। व्यवहारिकता में देखा है कि यह धर्म केवल बौद्ध विहार में जाना और भिक्षु बन जाना ही बौद्ध बन जाना नहीं है, बल्कि उसे अपने जीवन में धारण कर उसी पथ पर चलना ही बौद्ध है. यहा धर्म की आस्था की तरह यह धर्म है ही नहीं बल्कि मानव मात्र के कल्याण के लिए ही समाज बना और उसे मनुष्यों ने अपनी आवश्यकता अनुसार धारण कर लिया, ऐसा जाना मैने इसे। भारतीय बौद्धों को जापान से सीख लेने की ज़रूरत है अन्यथा भारत के बुद्धिस्ट तो यही देखने में लगे रहते है कि कौन क्या पहन-ओढ़ रहा है। यही हमारा पैमाना बन गया है बुद्धिज्म का।

कमला और प्रभावती: दो मित्रों की कहानी

वे दोनों दृढ धरना वाली महिलाएं थीं और उनका आत्म-संयम और भी दृढ था. स्वतंत्रता-संग्राम में अपने पतियों के साथ एक होकर उन्होंने परम्परानुसार पति-धर्म को निभाया. साथ ही विचारों में दोनों पूरी तरह आधुनिक थीं. -इंदिरा गाँधी

वह कैसी अजनबियत थी माँ!

फोन पर मां कई बार मुझे आप कहकर बुलाती तो मुझे खराब लगता था. मै मां को ड़ाट देती थी कि ऐसे क्यूं बोल रही है. वैसे मां थैन्क्यू और हेलो कहना अच्छे से सीख गयी थी. पर मां खुलकर बात करना बंद करने लगी थी अब थोड़ा-थोड़ा. मेरे काम और मेरी व्यस्तता को देखकर खुशी तो उन्हें मिलती थी लेकिन अपने मन की बात अब वो छुपाने लगी थी.

कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।

गिरह

स्साला सतीश पांडे को अब भी भाव मिलता है पार्टी में! मैंने तो उसी के कारण ही पार्टी को छोड़ा। धारा 370 का विरोध पांडे नहीं कोई दलित करे तो इसका मतलब बनता है। राजनीति भी बड़ी कमीनी हो गयी है। हम लाल झंडा ढोते रहते हैं और यह जानते हुए कि आजकल लाल और भगवा में बहुत अधिक फर्क नहीं रह गया है। कम से कम जाति के सवाल पर।

ट्रोजन की औरतें’ एवं ‘स्त्री विलाप पर्व

‘द ट्रोजन विमेन’/ ‘ट्रोजन की औरतें’ नाटक यूरिपिडीज द्वारा 416 ईसापूर्व में लिखा गया था। यह नाटक यूनान की विजय तथा ट्रॉय की पराजय के कथ्य पर केन्द्रित है। किन्तु इसका मूल कथ्य विजय के पश्चात की घटनाओं से जुड़ा हुआ है। ‘ट्रोजन की औरतें’ युद्ध के पश्चात के उन्माद, पाशविकता, व्यभिचार, हिंसा पर आधारित है। यह नाटक मुख्य रूप से हैक्युबा के विलाप और उस बहाने महान यूनान की सभ्यता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ‘महाभारत’ के ‘स्त्री पर्व’ में विभिन्न प्रकार के ‘विलाप दृश्य’ रखे गए हैं। जैसे धृतराष्ट्र का विलाप, कौरववंश की युवतियों के सामूहिक विलाप। इसके अतिरिक्त विभिन्न अध्याय केवल विलाप की विभिन्न भंगिमाओं के निमित्त रचे गए हैं।
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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