आबिदा (परिमला अम्बेकर की कहानी)

‘‘अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस पच्चीस हजार लगते हैं !!‘‘ जब से खबर मिली है आबिदा...

आम्रपाली ( रेनू यादव की कविताएं)

मस्तक गिरवी पैर पंगू छटपटाता धड़ हवा में त्रिशंकू भी क्या लटके होंगें इसी तरह शून्य में ? रक्तीले बेबस आँखों से क्या देखते होंगे इसी तरह दो कदम रखने खातिर

मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियों के कशमकश भरी जिंदगी की कविताएं !

विनीता परमार की कवितायेँ आधुनिक कामकाजी महिलाओं की परिस्थितियों को, रोज -रोज की उनकी समस्याओं को बहुत बारीकी और तीक्ष्णता के साथ अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं. पर्यावरण विषय से पीएचडी कवयित्री ने अपनी इन कविताओं में भले ही प्रकृति का वर्णन नहीं दिखत पर सूक्ष्म रूप में यह आधुनिक जीवन की खोखली और फीकी चकाचौंध और उसमे कामकाजी स्त्रियों के बनावटी मुस्कान की मज़बूरी का बेहद सशक्त चित्र उभारती है.

आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.

वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (आख़िरी क़िस्त)

सुनीता को यथार्थ का आइना दिखाते हुए वह बोला, ’दुनियाँ के इस बाज़ार में तुम्हारा शरीर तुम्हारा अपना माल है। इससे पहले कि कोई ज़बरदस्ती तुमसे तुम्हारा माल तुमसे लूटे, यह बेहतर है कि तुम इसको किसी उचित ग्राहक को बेच दो। कम से कम इसमें पाशविक हिंसा से बचोगी, और तुम्हारे अंदर लुटने और हारने की पीड़ा नहीं, बल्कि कहीं न कहीं जीतने का अहसास होगा। …….और, एक बार तुम लुटीं तो यह कोई गारंटी नहीं है कि फिर कभी नहीं लुटोगी।

वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (पहली क़िस्त)

उन लड़कों की बातों के तेवर से अशोक को यह आभास हो गया था कि आने वाला समय सुनीता के लिए बहुत अच्छा नहीं है। उसके साथ कुछ भी हो सकता है। और यदि वह इसी तरह सुनीता के साथ स्कूल जाता रहा तो वह भी चपेट में आए बिना नहीं रहेगा। कई दिन वह इस बात को लेकर परेशान रहा और सोचता रहा कि वह क्या करे और क्या नहीं करे।

मेरी माँ मेरा आदर्श..!

इंदिरा जी के इस कथन से सीख लेते हुए कि “राजनीति में अगर रहना है तो टीका-टिप्पणी, निंदा, सहन करने की और पचाने की क्षमता होनी चाहिए” माँ ने जीवन के कटु-अनुभवों से सिख लेते हुए हर स्थिति का सामना करने की शक्ति प्राप्त की. जब मैं जिला परिषद् की अध्यक्षा बनी तो भी उन्होंने मुझे यही समझाया कि ‘किसी का बुरा मत करना. नेकी कर दरिया में डाल’ उनका कहना है कि गरीब के सेवा से ही भगवान की पूजा हो जाती है.

स्त्री यौनिकता से भयभीत हिन्दी आलोचना और ‘उर्वशी’

'उर्वशी' की ख्याति काम को प्रधान विषय बनाने के कारण है लेकिन इसका सबसे कमजोर पक्ष काम को आध्यात्मिक रंगत दे देना है। कवि अगर भौतिक सुख की विशेषकर संभोग और रति सुख को ही अपने काव्य का विषय बनाता है तो रचना श्रेष्ठ नहीं कहलाएगी, कहीं न कहीं रचनाकार की चेतना में यह भाव है।

वेश्यालय में किस्म-किस्म के लोग आते हैं: विदुषी पतिता की आत्मकथा

राजबाला ने कहा, “ये मेरे बाबुओं में से एक हैं. बहुत बड़े अध्यापक हैं. ये महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित हैं. ये आजकल मुझे लेकर पड़े रहते हैं. लेकिन इनके बारे में एक बात सुनी. इनमें एक दोष है. इन्हें नित नूतन चेहरे चाहिए. वेश्याओं के बीच ये खासे परिचित हैं. इन्हें खोलाबाड़िया ही पसंद हैं, जहां तक हो सकता है मैं इनसे वसूली कर रही हूँ, न जाने कब ये खिसक जाएँ.”

एक विदुषी पतिता की आत्मकथा: दूसरी क़िस्त

कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी  अनुवाद और सम्पादन: मुन्नी गुप्ता 1929 में मूल बांग्ला में प्रकाशित किताब “शिक्षिता पतितार आत्मचरित”, का हिन्दी अनुवाद एवं सम्पादन...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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