‘कागज पर लगाए गए पेड़’ सी जीवंत कविताएँ

स्त्री के मौन में उसके उत्पीड़न का इतिहास छिपा है . शारीरिक अत्याचार, शोषण, हिंसा, क्रूरता की कथाएँ स्त्री उत्पीड़न की स्थिति बयान करती हैं. स्त्री की सहनशीलता ने उत्पीड़कों को सर्वदा बल दिया है. इसलिए संध्या कहती हैं- ‘‘ अतीत ठीक नहीं था औरत का /परंतु भविष्य / मैंने ठान लिया है कि मैं अपनी बेटी को बोलना सिखाउंगी.’ दलित आंदोलन के भीतरी चरित्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हुए वे अपनी कलम की ताकत को दर्शाती हैं- ‘‘कर क्या रहे हैं हम/ धरना, मोर्चा, निर्देशन, निवेदन / अथवा / सबकी नजर बचाकर भीतर ही भीतर / किया गया सेटलमेंट.’’

अपराधी हूँ मैं और अन्य कविताएँ

कसूर बस इतना सा, मेरा जन्म लेना, जो अधिकार क्षेत्र नहीं हैं मेरा, स्त्री- पुरुष से भिन्न, किन्नर हूँ मैं, अपराध बस इतना सा,

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।

नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला–टोनी मॉरिसन

राजीव सुमन टोनी मॉरिसन को सामजिक मुद्दों पर अपनी सूक्ष्म और स्पष्ट दृष्टिकोण रखने के साथ-साथ उनके तीक्ष्ण शब्द...

ग्राम्य जीवन का दस्तावेज़ :चिरकुट दास चिन्गारी

हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष राजेंद्र यादव ने एक दफा कहा था, ‘घर में जो स्थान नाली का है, साहित्य में वही स्थान गाली का है.’ इस बयान का यह अर्थ नहीं कि राजेंद्र जी गाली का समर्थन करते थे, बल्कि यह कि अगर कहानी के पात्र गाली दे रहे हैं, तो लेखक की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पात्रों की ज़बान न काटे.

हव्वा की बेटियों का ख़्वाब है ‘दूसरी जन्नत’/नासिरा शर्मा

यहां यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आई.वी.एफ और सरोगेसी जैसे मसले के सन्दर्भ में वास्तव में इस्लाम धर्म, कानून और मुस्लिम समुदाय अपना किस तरह का नजरिया इख्तियार करता है। इस दृष्टि से नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘दूसरी जन्नत’ बहुत ही महत्वपूर्ण है।

आए बड़े पढ़े-लिखे इंसाफ़ज़ादे व अन्य कविताएं (कवयित्री: वीना)

धत तेरी की देखो कैसे धड़ल्ले से संसद के भीतर, लालकिले पर चढ़कर, आम सभाओं में, स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं में विदेशों में झूठ की रेलम-पेल किये जाता है खामोश! देश के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हो अर्बन नक्सल, देशद्रोही का ठप्पा लगाकर जेल में सड़वा देगा

वे सख्त दिल मह्बूब: सफ़र के क़िस्से

पहले रोज़ लुम्बिनी का सैर करना तय पाया गया , गौतम बुद्ध की जन्मस्थली देखने की शदीद ख़ाहिश थी , उसकी एक वजह ये थी कि बचपन से गौतम बुद्ध की अच्छाई की नेकी की बहुत सी कहानियां अम्मी से सुन रखी थी , या यूँ कह लें उनके क़िस्से कहानियां सुन कर बड़े हुए थे हम। परिंदे से नेक सुलूक की दास्तान और वो कविता जो अम्मी हमें सुनाती थीं,"

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जायेगा (भारती वत्स) की कविताएं

तुम अपनी निरँकुशताओँ की उन कार्यवाहियों से जिनकी बहुत भारी कीमत चुकाई है उन लोगों ने जिनने खडे होने का साहस किया था तुम्हारे विरुद्ध …. और अकस्मात पड़ गये थे निपट अकेले

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता और स्त्री-मुक्ति के प्रश्न

यह कहना कतई गलत न होगा कि उन्नीसवीं सदी के हिन्दी समाज का लोकवृत्त भारतेन्दु के इर्द गिर्द ही गढ़ा जा रहा था। उस युग में सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक बदलावों का वाहन बनने वाली कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना भारतेन्दु ने की थी। उनके युग के सभी महत्त्वपूर्ण रचनाकार और पत्रकार हरिश्चंद्र मंडल में शामिल थे। रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु युग नामक अपनी पुस्तक में लिखा है
253FollowersFollow
631SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
Loading...