मैं अमर बेल को गाली नहीं देता और अन्य कविताएं (कवि:एस एस पंवार)

कितनी ही बार वो मर्लिन मुनरो होते-होते बची और उसने अपनी दीवार पर नए कैलेंडर टांगे, एक अस्तित्वहीन मुल्क का समाजशास्त्र उसे काटता रहा बार-बार

“केदारनाथ सिंह की कविताओं में स्त्री”

यह सर्वविदित है कि गया वक्त पुनः लौटकर नहीं आता . फिर भी कवि का यह प्रयास है कि उस उधड़े हुए समय को फिर से सिलने का प्रयत्न किया जाए ! यहाँ हमें कवि के आशावादी होने का परिचय मिलता है . जीवंतता का परिचय मिलता है . सुई और तागे की बात करते हुए करघे की बात करना, इस बात का संकेत है कि केदारनाथ जी कहीं-न-कहीं महात्मा गांधी के लघु-कुटीर उद्योग से प्रभावित थे और हथकरघा पद्धति में भी विश्वास करते थे .

औरतें अपने दु:ख की विरासत किसको देंगी

माँ-बेटी के आपसी संवाद एक दूसरे के पूरक नजर आते हैं। जिन्दगी के सारे रंग खासकर स्त्री जीवन के सारे रंग हर्ष, ख़ुशी, उत्साह, दुःख, शोक, वियोग, अकेलापन आदि एक दूसरे से गूंथे हैं। “ऐ लड़की अँधेरा क्यों कर रखा है! बिजली पर कटौती! क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गई है”

पंखुरी सिन्हा की कविताएं (घास पटाने के मेरे बूट व अन्य)

पंखुरी सिन्हा युवा लेखिका, दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, तीन हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह।

कविता की प्रकृति ही है समय से आगे चलना

इन प्रमुख प्रगतिशील कवियों के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था और साहित्‍य में प्रमुख रूप से जनवादी चेतना और फासिज़्म के विरोध के पीछे भी प्रगतिशील लेखक संघ काम कर रहा था। राजसत्‍ता, राजतंत्र के ख़िलाफ़ जनवादी आवाज़ का उठना ही तत्‍कालीन स्थिति के आधार पर बड़ी बात थी। 1942 की अगस्‍त क्रांति, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी का रूस समेत मिश्र राष्‍ट्रों का और एक तरह से ब्रिटिश सरकार का ही पक्ष समर्थन करना, इसी बीच बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, इस तरह देखा जाए तो 1939 से 1946 तक का दौर अनेक प्रकार के जटिल राजनीतिक और सामाजिक प्रश्‍नों का दौर बन गया।

आबिदा (परिमला अम्बेकर की कहानी)

‘‘अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस पच्चीस हजार लगते हैं !!‘‘ जब से खबर मिली है आबिदा...

आम्रपाली ( रेनू यादव की कविताएं)

मस्तक गिरवी पैर पंगू छटपटाता धड़ हवा में त्रिशंकू भी क्या लटके होंगें इसी तरह शून्य में ? रक्तीले बेबस आँखों से क्या देखते होंगे इसी तरह दो कदम रखने खातिर

मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियों के कशमकश भरी जिंदगी की कविताएं !

विनीता परमार की कवितायेँ आधुनिक कामकाजी महिलाओं की परिस्थितियों को, रोज -रोज की उनकी समस्याओं को बहुत बारीकी और तीक्ष्णता के साथ अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं. पर्यावरण विषय से पीएचडी कवयित्री ने अपनी इन कविताओं में भले ही प्रकृति का वर्णन नहीं दिखत पर सूक्ष्म रूप में यह आधुनिक जीवन की खोखली और फीकी चकाचौंध और उसमे कामकाजी स्त्रियों के बनावटी मुस्कान की मज़बूरी का बेहद सशक्त चित्र उभारती है.

आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.

वर्जिन : जयप्रकाश कर्दम की कहानी (आख़िरी क़िस्त)

सुनीता को यथार्थ का आइना दिखाते हुए वह बोला, ’दुनियाँ के इस बाज़ार में तुम्हारा शरीर तुम्हारा अपना माल है। इससे पहले कि कोई ज़बरदस्ती तुमसे तुम्हारा माल तुमसे लूटे, यह बेहतर है कि तुम इसको किसी उचित ग्राहक को बेच दो। कम से कम इसमें पाशविक हिंसा से बचोगी, और तुम्हारे अंदर लुटने और हारने की पीड़ा नहीं, बल्कि कहीं न कहीं जीतने का अहसास होगा। …….और, एक बार तुम लुटीं तो यह कोई गारंटी नहीं है कि फिर कभी नहीं लुटोगी।
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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।
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