मुकेश मानस और दीप्ति की कवितायें

    (  मुकेश मानस कवि, कथाकार और विचारक हैं , चर्चित पत्रिका मगहर का संपादन करते हैं  और दिल्ली वि वि में हिन्दी के प्राध्यापक...

स्त्री-सत्ता : यथार्थ या विभ्रम

अर्चना वर्मा हम सब जानते हैं कि शब्दों के अर्थ उनके प्रयोग-सन्दर्भ से निर्धारित होते हैँ। सत्ता का प्राथमिक अर्थ विद्यमानता, वर्तमानता, उपस्थिति, मौजूदगी या होना यानी...

स्त्री रचनाधर्मिता के तीन स्वर

( इन तीन कवयित्रियों की कविताओं से गुजरना पीडा की एक समान भावभूमि से गुजरना तो है ही लेकिन अलग -अलग सामाजिक स्थितियां और...

जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

( निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘...

स्त्री रचनाधर्मिता की दो पीढियां .

( दो –दो कवितायें दो पीढियों की कवयित्रियों की. पूनम सिंह और पूजा प्रजापति की कवितायें. फर्क सामाजिक स्थितियों का  भी है. ) स्त्री (...

डॉ. अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन

अनिता भारती   ( कहानीकार आलोचक व कवयित्री अनिता भारती का यह आलेख उनकी पुस्तक ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ में संकलित...

पत्रों में झांकता बच्चन का व्यक्तित्व

रविता कुमारी हिंदी विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार, उत्तराखण्ड ईमेल: ravita_kumari@yahoo.in व्यक्ति का अन्तर्बाह्य समायोजन ही व्यक्तित्व की परिभाषा है। जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके विशेष गुणों,...

दलित स्त्री आंदोलन तथा साहित्य- अस्मितावाद से आगे

स्त्रीकाल के ताजा अंक 'दलित स्त्रीवाद ' में प्रकाशित  बजरंग बिहारी तिवारी का यह आलेख दलित स्त्रीवाद को समझने के  लिए अनिवार्य  पाठ है....

सावित्रीबाई फुले : शैक्षिक –सामाजिक क्रान्ति की अगुआ

आज भारत की आद्यशिक्षिका सावित्री बाई फुले का जन्मदिन है. आज के इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए ....

समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रश्न

समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रश्न: अनिता भारती के भाषण का वीडियो देखें
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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