बिहार- सियासत और लेनिनग्राद का मिथ

पूर्व वामपंथी शोधार्थी (बहुजन) मुलायम सिंह का बिहार की सियासत और उनके संगठन के पूर्व साथी कन्हैया कुमार की बेगुसराय में उम्मीदवारी के बहाने छिड़ी बहस पर यह आलेख पठनीय है. आलेख वामपंथी राजनीति की सीमाओं का एक इंसाइडर रिव्यू है.

मुलायम सिंह

पाँच साल मोदी सरकार के बीत जाने के बाद 2019 में देश में जब फिर से लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। मुल्क की सारी पार्टियाँ अपने ढंग से रणनीति बनाकर चुनाव जीतने की तैयारी कर रही हैं। सभी राज्यों के चुनाव का परिदृश्य  अलग-अलग राज्य की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप दिलचस्प है। जहां एक ओर मौजूदा एनडीए गठबंधन के खिलाफ यूपीए गठबंधन है तो वहीं कुछ कुछ राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का अपना गठबंधन मजबूती से चुनाव जीतने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। मोदी सरकार की जुमलेबाजी, झूठ, बेइमानी, भ्रष्टाचार, मंहगाई तथा जनविरोधी नीतियों को सारी पार्टियाँ अपने ढंग से पर्दाफाश कर रही हैं। सियासी ज्ञानियों की माने तो मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में एनडीए के विशाल गठबंधन को हराने के लिए उसके विपक्ष में दूसरा मजबूत गठबंधन का खड़ा होना समय की जरूरत है। आगामी संकटग्रस्त परिस्थितियों की आहट को ध्यान में रखते हुए देखें तो इस बार 2019 का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। मोदी-शाह की मौजूदा जुगलबंदी देश में योगियों-ढोंगियों तथा आवारा भीड़ के सहारे आने वाले समय में क्या क्या तबाही मचाने वाली है इसका अंदजा शोषितों और वंचितों की पक्षधर पार्टियों के लोग लगा रहे हैं। लोकतंत्र, संविधान, धर्मनिररेक्षता तथा सामाजिक न्याय को जिस तरह से ध्वस्त किया जा रहा है। दहशतगर्द संघ के इशारे पर जिस तरह से संविधान तथा संवैधानिक ढाँचे को छेड़ने और बदलने की व्याकुलता दिखाई दे रही है वो देश के 90 प्रतिशत बहुजनों को गुलाम बनाने की एक मनुवादी कोशिश है।

एआईएसएफ के दिनों में मुलायम सिंह डफली बजाते हुए

फिलहाल मेरी नजर अभी बिहार के चुनाव पर टिकी है। जैसा कि आपको ज्ञात हो कि बिहार विधानसभा चुनाव के जनादेश को छल से अपहरण करके पलटी मारते हुए नीतीश कुमार ने जब से मोदी-शाह की बेलगाम जोड़ी का दामन पकड़ा है, बिहार में आये दिन संघ के आतंकी और साम्प्रदायिक उन्माद की खबरें फैल रही हैं। नीतीश कुमार के सहारे भाजपा-संघ अपने सांप्रदायिक जहर को बिहार के जनमानस में फैलाने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा भाजपा-जदयू गठबंधन के विपक्ष में राजद-कांग्रेस-हम-रालोसपा तथा वीआईपी जैसी विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है। इस गठबंधन में शोषितों-वंचितों की पार्टियों तथा उनके हितों को  ध्यान में रख कर समायोजित किया गया है। इस गठबंधन में लालू प्रसाद की पार्टी राजद सबसे मजबूत घटक है। सांप्रदायिक फासीवाद के खतरे को देखते हुए राष्ट्रीय जनता दल ने दूरदर्शिता दिखाई और दो कदम पीछे हट कर वामपंथी पार्टियों में भाकपा-माले को भी आरा सीट से एक टिकट देकर गठबंधन में शामिल किया। यही वो जड़ है जिसकी वजह से तथाकथित प्रगतिशीलों और जातिवादी साम्यवादियों के पेट में मरोड़ हो रही है।

आइये जानते हैं कि पेट में उठ रही इस दर्दनाक मरोड़ की असल वजह क्या है। इस मरोड़ की पहली वजह है कि भाकपा को गठबंधन में क्यों नहीं शामिल किया गया? और उसके पसंदीदा उम्मीदवार को क्यों टिकट नहीं दिया। पूरे एशिया और यूरोप के एनजीओ, मीडिया और संस्थानों में बैठे इन अभिजात्य वर्गीय और जातिवादी कामरेडों का तर्क है कि बेगूसराय से भाकपा के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को टिकट न देना, महागठबंधन के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा। राजद बेगुसराय में फासीवाद के खतरे की विभिषिका को भांप नहीं पा रहा है। बिहार में या देश में फासीवाद और सांप्रदायिक ताकतों का अगर सफाया होगा तो वो बिहार के बेगुसराय से होगा अन्यथा मुश्किल है। यह तर्क नहीं बल्कि सवर्णवादी हित के सम्मोहन के आगोश में अभिजात्य वर्ग एवं शिक्षित सवर्णों का सनकपन की हद तक गुजर जाना मात्र है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि भाजपा को हराने के लिए इनके चिंतन और भावावेश के केंद्र में बिहार का 39 लोकसभा सीट नहीं है। बल्कि सारा तिकड़म और कवायद सिर्फ बेगूसराय में राजद गठबंधन को हराने के लिए किया जा रहा है। वह भी राजद के ऐसे उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन को जो मोदी लहर में भी सभी उम्मीदवारों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर थे।

उम्मीदवारी को लेकर सियासत

भाकपा की तरफ से उम्मीदवारी का पहला तर्क यह है कि कन्हैया देश का सबसे बड़ा चेहरा है। अगर इनके इस प्रसिद्धि के तर्क को देखें तो फिर भाकपा को गठबंधन से बाहर होने पर मर्सिया गाने की क्या जरूरत है। वो तो एक ऐसे विश्व प्रसिद्ध उम्मीदवार को मैदान में उतारी है तो फिर डर किस बात का है? दूसरा तर्क यह है कि वो बेगुसराय का बेटा है। अहा! क्या महान मार्क्सवादी तर्क है। आप कहना क्या चाह रहे हैं कामरेड, कि महागठबंधन का उम्मीदवार कराची से आया है? क्या डॉ तनवीर हसन बेगुसराय का बेटा नहीं हैं, ये अपने आप में कितना ब्राह्मणवादी और साम्प्रदायिक मानसिकता वाला तर्क है। तीसरा तर्क यह है कि बेगूसराय लोक सभा क्षेत्र वामपंथ का गढ़ रहा है इसीलिए उसे लेलिनग्राद कहा जाता है। यह भी एक फर्जी का गढ़ा हुआ मिथ है। मौजूदा समय में भाकपा का बेगूसराय में न तो एक भी विधायक है और न ही सांसद। बल्कि 1967 में मात्र एक बार भाकपा वहाँ से लोकसभा चुनाव जीत पाई है। अब जनाधार के मामले में भी पार्टी दो लाख वोटों के अंदर में सिमट गई है। इसलिए ये लेलिनग्राद वाला प्रॉपेगेंडा भी भ्रामक है। बल्कि भाकपा के मुकाबले में राष्ट्रीय जनता दल का जनाधार वहाँ अधिक है। फिर किस तर्क के हिसाब से राजद अपने जीतने वाले, जमीनी और सबसे जुझारू उम्मीदवार की दावेदारी को खारिज करे?

पिछली बार तथाकथित मोदी लहर में राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन 3,69,892 वोट पाकर जीत के दौड़ में दूसरे नंबर पर थे। महज 58,335 वोट से भाजपा के उम्मीदवार भोला सिंह से हार गए थे। इस बार कांग्रेस के अलावा बिहार महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा, जीतन राम माझी की पार्टी हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी जैसी पार्टियों के शामिल होने से राजद का जनाधार और बढ़ेगा तथा डॉ. तनवीर हसन के जीतने की संभावना सबसे अधिक है। गठबंधन में शामिल उपरोक्त पार्टियों का अपना जातीय जनाधार वोट राजद गठबंधन में जुड़ने से भाजपा का हारना लगभग तय है। वहीं बेगुसराय सीट पर भाकपा और जदयू के संयुक्त उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 1,92,639 वोट मिले थे। अब खोते जनाधार वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पिछले वोट को आगामी चुनाव में हू ब हू मान भी ले तब भी भाजपा के कुख्यात नेता गिरिराज सिंह को हराने के लिए 2,35,588 वोटों से अधिक की जरूरत पड़ेगी। वहीं राजद के पिछले उम्मीदवार तनवीर हसन को भाजपा के उसके कुल 4,28,227 वोट से आगे जाने के लिए से महज 58,335 वोटों से अधिक की जरूरत है। अर्थात बेगूसराय सीट पर राजद के जीतने की दावेदारी प्रबल है।  

गठबंधन की सियासत

वामपंथ से मेरा कई सालों का नाता रहा है। वामपंथी पार्टियों के अंदर रह कर मैने काम किया है इसलिए उनके तौर-तरीके, नीति और नीयत का मुझे नजदीक से भान है। आइए गठबंधन की राजनीति को वामपंथी गठबंधन के नजरिये से समझते हैं। वामपंथी पार्टियाँ गठबंधन करने के दौरान सबसे पहले इस बात पर विचार करती हैं कि किस पार्टी से गठबंधन करना है। पार्टी तय हो जाने के बाद इस बात पर विचार किया जाता है कि कितने सीटों पर कौन पार्टी चुनाव लड़ेगी। इसके बाद अंत में क्षेत्र और उम्मीदवार कौन सा होगा इस बात पर निर्णय होता है। लेकिन यही भाकपा जैसी वामपंथी पार्टी जब राजद और कांग्रेस से गठबंधन करने जाती है तो गठबंधन होगा कि नहीं होगा, कितने सीटों पर होगा, बिना इस बात की परवाह किए अपने उम्मीदवार का नाम और क्षेत्र की घोषणा पहले ही कर देती है। महागठबंधन में शामिल न होने के कारण भाकपा घूम-घूम कर जो मर्सिया गा रही है उसकी तमाम अन्य वजहों में एक वजह यह भी रही है। राजद के आंतरिक सूत्रों का मानना है कि भाकपा की तरफ से जिन उम्मीदवारों के नाम पेश किए गए थे उनमें अधिकतर भूमिहार या सवर्ण जाति से थे। अब दलित-पिछड़े-अकलियत और वंचितों की राजनीति करने वाली राजद वामपंथ की इस सवर्णपरस्ती पर कैसे मोहर लगा देती। खैर अंततः भाकपा बिहार के महागठबंधन से बाहर हो गई।

जैसे ही पता चला कि महागठबंधन में उनको जगह नहीं मिली, भाकपा तथा अन्य वामपंथियों के रंगरूटों ने मीडिया पोर्टल, सोशल मीडिया, तथा कई यू-ट्यूब चैनलों पर लालू प्रसाद तथा राजद के खिलाफ लिखने लगे। अब राजद फिर से घोर जातिवादी हो गयी। लालू प्रसाद तथा उनके पूरे परिवार को तथाकथित चारा चोर और भ्रष्टाचारी के विशेषणों से नवाजा जाने लगा। मतलब साफ है कि इनका हित सध जाता तो राजद महान पार्टी हो जाती तथा विगत तीस सालों से मीडिया में बैठे मनुवादियों द्वारा लगातार विकृत की गई लालू प्रसाद और राजद की कलंकित छवि इनके निगाह में धुल कर साफ हो जाती। कहने का आशय यह है कि राजद अगर इनके सवर्णवादी मंसूबों को साधने में साथ देता तो ठीक था। नहीं तो मानो राजद गठबंधन ने देश में आने वाले इंकलाब की लहर को रोक कर भारतीय वामपंथी क्रांति की गति कुंद कर दिया हो। इसके अलावा एक बात और सोचने वाली है कि आरा लोकसभा सीट से महागठबंधन के उम्मीदवार कामरेड राजू यादव को लेकर पूरे देश के वामपंथियों की कोई चिंता नहीं है। शायद आरा में फासीवाद या सांप्रदायिकता का खतरा इनके नजर में नहीं है। जबकि आरा का उम्मीदवार कामरेड राजू यादव भाकपा-माले जैसी लेफ्ट पार्टी का ही है। संघर्ष के हिसाब से देखा जाए तो वहां सामंतियों और उच्च जातियों के आतंक के खिलाफ पिछड़ों और शोषितों का जबरदस्त प्रतिरोध का इतिहास रहा है। आरा का चुनाव प्रचार और माहौल देख कर लग रहा है कि भाकपा-माले खुद वहाँ गंभीर नहीं है। उनके जनसंगठनों के लोग आरा के बजाय बेगूसराय पर अपनी ऊर्जा लगाए हुए हैं। वामपंथ के महीनी जातिवाद और सवर्णपरस्ती का इससे बड़ा उदाहरण आपको कहीं नहीं मिलेगा। वामपंथ के उपरोक्त वैचारिक पतन और विचलनों को गंभीरता से समझा जाना चाहिए ताकि बहुजनों को वास्तविकता से अवगत कराया जा सके।

वामपंथ का दोहरा चरित्र

आइये गठबंधन की राजनीति को वामपंथ के वैचारिक तर्कों व नजरिए से समझते हैं। गठबंधन में भाकपा को शामिल न किये जाने की वजह से बेगूसराय में जो मीडिया के द्वारा माहौल बनाया जा रहा है उसका संबंध कहीं न कहीं छात्र राजनीति से भी जुड़ा है। जगह जगह इस बात का रोना-धोना हो रहा है कि जेएनयू की छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि से आये हुए एक युवा चेहरे को टिकट नहीं दिया गया। जिसके लिए मीडिया, एनजीओ और उच्च संस्थानों में बैठे ब्राह्मणवादी वामपंथियों ने बिहार में लगातार गठबंधन को कोसना शुरू कर दिया है। जबकि महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन की पृष्ठभूमि भी छात्र राजनीति रही है लेकिन उसका जिक्र कोई नहीं कर रहा है बल्कि उल्टा ये प्रोपेगैंडा चलाया जा रहा है कि तनवीर हसन वोटकटवा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, इसको समझने के लिए मैं आपको कुछ महीने पीछे जेएनयू की छात्र राजनीति की ओर ले चलता हूँ। पिछले सितंबर में जेएनयू में छात्रसंघ का चुनाव हो रहा था| छात्र राजद की तरफ से जयंत जिज्ञासु अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे| दूसरी तरफ लेफ्ट गठबंधन चुनाव लड़ रहा था| चूंकि जेएनयू कैंपस दुनिया में वैचारिक विमर्शों के लिए जाना जाता है अतः पूरे देश की निगाह जेएनयू छात्रसंघ चुनाव पर थी|तब कैंपस तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में बैठे सवर्णवादी वामपंथियों का तर्क था कि छात्र राजद को वोट मत दो नहीं तो ABVP जीत जाएगी| जयंत जिज्ञासु को वोट मत दो नहीं तो गठबंधन हार जाएगा| राजद लेफ्ट गठबंधन का वोट काट रहा है| सब लोग मिल कर गठबंधन को वोट करो|

आज हू ब हू राजनीतिक परिस्थिति बिहार के बेगूसराय लोक सभा क्षेत्र में बनी है| लेकिन आज देश के घनघोर जातिवादी वामपंथियों के सुर और तर्क बदल गए हैं| आप अंदाजा लगाइये कि कैसे जाति और वर्ग हित के हिसाब से दोमुहें वामपंथियों का सिद्धांत और तर्क बदल जाते हैं| आज बेगूसराय में ये किसका वोट काट रहे है क्या बहुजन बुद्धिजीवियों को पता नहीं है| वर्ग संघर्ष की बात करने वाले ये लोग दलित पिछड़े और मुसलमानों का नाम लेकर किसको झांसा दे रहे हैं| तुम अपना हित देख कर समाज की परिस्थितियों की व्याख्या करोगे और सोचते हो कि तुम्हारी धूर्तता को कोई पकड़ नहीं पाएगा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर, पेरियार, लोहिया तथा जगदेव बाबू जैसे नायकों ने अपने समय में मार्क्सवाद की आड़ मे छिपे इनके इसी ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर किया था| बिहार लेनिन जगदेव बाबू तो खुलेआम बोलते थे कि ‘मुझे वामपंथी विचारधारा पसंद है लेकिन भारतीय वामपंथियों से नफरत है’।

लालू प्रसाद के साथ कन्हैया कुमार

मीडिया का सवर्णवादी चरित्र

चूंकि इन दिनों बिहार राजनीति में मीडिया के सारे कैमरे और लाव-लश्कर जब सीधे बेगूसराय क्षेत्र में जाकर शरण ले रहे हैं तो इस हलचल के पीछे की सियासत को समझना बहुत जरूरी है। आखिर क्या कारण है कि रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में चर्चा के दौरान कन्हैया कुमार का भाषण दिखाते हैं और यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि बेगुसराय में मुकाबला भाजपा के गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार में है। जबकि महज 58,335 वोट से भाजपा के उम्मीदवार भोला सिंह से पिछल बार पीछे रह जाने वाले राजद के उम्मीदवार डॉ. तनवीर हसन का जिक्र करना तक भी भूल जाते हैं। ये कैसी चाल है कि पिछली बार 39.71% वाले भाजपा के खिलाफ 35.30% वोट लाने वाले राजद उम्मीदवार तनवीर हसन को मुकाबले से गायब कर देते हैं और मात्र 17.86% वोट पाने वाली भाकपा को टक्कर में खड़ा कर देते हैं। क्या यह अनायास हो रहा है? मेरे हिसाब से बिल्कुल नही। मीडिया में बैठे सवर्णों द्वारा पूरी सोची-समझी साजिश के साथ कन्हैया कुमार को उछला जा रहा है। जबकि ऊपर मैने समझाने की कोशिश की है कि कैसे महागठबंधन के उम्मीदवार का पिछली बार की अपेक्षा इस बार जीतने की संभावना सबसे प्रबल है। तमाम पिछड़ी, दलित और मुस्लिम जातियों का वोट गठबंधन की तरफ आकर्षित हो चुका है। फिर, मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से बहुजन जनता को भ्रमित करने की वजह क्या है?  

सोचने वाली बात ये है कि ये कि ये दावा ठोक रहे हैं कि हम देश में मोदी को हराएंगें। लोकतंत्र और संविधान बचाएंगें। लेकिन 40 सीटों में एक सीट पर(बाकी जगह नाममात्र के लिए लड़ा जा रहा है, फोकस सिर्फ एक जगह है) व्याकुलता के साथ लड़ने वाली भाकपा या तथाकथित वामपंथी गैंग कैसे मोदी को हराएँगे। अगर अन्य सीट पर भाजपा जीत दर्ज कर लेगी तो एक सीट की चिंता में आतुर हो कर भला कैसे ये भाजपा को रोक लोगे। सच कहो तो इनका ये तर्क किसी को भी संतुष्टप्रद नहीं लग रहा है। देश भर के वामपंथियों की नजर अगर एक ही सीट पर टिकी हुई है तो, जो किसी भी दृष्टिकोण से भाजपा को रोकने में सक्षम नहीं हैं फिर उनके इस तार्किकता के पतन का कारण क्या है? क्या वो कन्हैया के बहाने पूरे वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं? या फिर कन्हैया के जरिये व्यापक सवर्णवादी एवं अभिजात्य हितों के पोषित होने का सपना देख रहे हैं। मेरा जहां तक मानना है कि यहां वामपंथ का उत्थान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन गरीबी की ब्रांडिग जिस तरह से सवर्णवादी वामपंथियों के द्वारा किया जा रहा है, वह देश के शहरी मध्यवर्ग और अभिजात्य लोगों की  फंतासी को जरूर मानसिक खुराक दे रहा है। मीडिया या सोशल मीडिया पर इस नैरिटिव को बहुत जोर-शोर से बेचा जा रहा है।

सवर्णवादी वामपंथियों की कहीं इस छटपटाहट के पीछे कन्हैया को मोदी-विरोध का सबसे बड़ा चेहरा या आइकन बना कर प्रचारित करना तो नही है। अगर ऐसा है तो ये देश की सवर्णवादियों की सबसे बड़ी चतुराई है। आखिर देश में मोदी विरोधी तो कई चेहरें हैं। इस मुल्क में लालू यादव से बड़ा मोदी-संघ का प्रखर विरोधी चेहरा भला दूसरा कौन हो सकता है। सारे कैमरे और विमर्श की जद से उन्हें किस आधार पर उपेक्षित किया जा रहा है। क्या इस उपेक्षा के पीछे के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारण कोई बताएगा। सिर्फ नौजवानों की गिनती करें तो चंद्रशेखर रावण, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, हार्दिक पटेल आदि बहुत सारे चेहरे हैं, लेकिन वे क्यों नहीं प्रोजेक्ट किये जा रहे हैं। सारा छल-प्रपंच एक ही चेहरे के लिए क्यों हो रहा है। आखिर मंशा साफ है कि दलित, पिछड़ा, अंबेडकर, रोहित वेमुला आदि का नाम रटते हुए शब्दों की जादूगरी दिखाओ और परोक्ष में अपने सवर्णवादी हितों की साधना करो। अर्थात इन जनेऊ जनार्दनों के हिसाब से फूले, अंबेडकर, मंडल, बिरसा और अब्दुल कयूम जैसे नायकों की पीढ़ियों की सारी बौद्धिक चेतना शून्य हो गयी है न, जो तुम्हारी धूर्तता और चालबाजियों  को समझ नहीं पाएंगी।

इसलिये मतदाताओं को चाहिए कि वे बिहार में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक सीट पर जो हाय-तौबा मचाया जा रहा है, गरीब के बेटे के नाम पर सज रहे बाजार में सवर्णवादी हितों को साधने के लिए जितना बड़ा माहौल बनाया जा रहा है, उस पर शांति से, थोड़ी देर ठहर कर सोचें। मोदी को पूरे बिहार या देश में हराए बिना एक सीट पर जीत कर कैसे बोल्शेविक क्रांति हो सकती है इस मिथ को गंभीरता से समझने की जरूरत है।   

लेखक- मुलायम सिंह, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अध्येता एवं छात्रनेता हैं| आप युनाइटेड ओ.बी.सी फोरम के संस्थापक सदस्य हैं। देश में सामाजिक न्याय के सवालों को लेकर छात्र एवं युवा आंदोलनों में हमेशा संघर्षरत हैं|