एक राजधानी: जहाँ टॉयलेट ढूंढते रह जाओगे. महिलाओं ने बयान किया दर्द

स्वच्छता अभियान, महिला हित के दावे और सच यह कि इस राजधानी में इक्के-दुक्के गंदे सार्वजनिक शौचालयों को छोड़कर कई-कई किलोमीटर तक एक शौचालय,...

ब्रजेश ठाकुर की बेटी के नाम एक पत्र: क्यों लचर हैं पिता के बचाव...

संजीव चंदन निकिता आनंद कैसी हैं? जाहिर है आप परेशान होंगी अपने पिता के लिए. आप कम से कम उतनी प्रसन्न तो नहीं होंगी जितना आपके पिता...

1990 के बाद का हिंदी समाज और अद्विज हिंदी लेखन

प्रमोद रंजन  संपादक,फारवर्ड प्रेस. बहुजन साहित्य की अवधारणा सहित चार अन्य किताबें प्रकाशित. ईमेल आईडी janvikalp@gmail.com 1990 का दशक वैश्विक परिदृश्य अनेक सकारात्मक-नकारात्मक परिवर्तनों...

जाति-वर्ग और लिंग के दायरे में चल रहे संघर्षों के साथ जुड़ें :...

जन आन्दोलन  का राष्ट्रीय समन्वय  के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा दिन        छद्म राष्ट्रवाद के खिलाफ सब एक साथ आएं देश में बढ़ती जाति...

वीरांगना होलिका मूल निवासी थी , क्यों मनायें हम उनकी ह्त्या का जश्न

(  भारत में होली जैसे त्योहारों का जन्म  कृषि समाज के आम जन के उल्लास के  रूप में  हुआ है . ऋतुओं के चक्र...

मर्दाना हकों की हिफ़ाजत करता मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड

नासिरुद्दीन एक बार फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुर्खियों में है. और इतिहास गवाह है कि पर्सनल लॉ बोर्ड के सुर्खियों में आने की...

महज मुद्दा

संजीव चंदन ( आज के जनसत्ता से साभार इस आलेख में संजीव चन्दन इसकी पड़ताल कर रहे हैं कि महिला आंदोलन की अगुआई में...

आदिवासियों का पत्थलगड़ी आंदोलन: संघ हुआ बेचैन, डैमेज कंट्रोल को आगे आये भागवत

झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी पत्थलगड़ी की अपनी पुरानी परम्परा का नये रूप में अपने अधिकारों को स्थापित करने के लिए राजनीतिक रूप से इस्तेमाल...

मंडल मसीहा को याद करते हुए

लेखक : प्रेमकुमार मणि 25 अगस्त उस विन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मदिन है , जिनकी अध्यक्षता वाले आयोग के प्रस्तावित फलसफे को लेकर 1990 के...

दैनिक जागरण और अन्य मीडिया के अपराधिक खबरों पर जम्मू पुलिस ने जारी की...

सुशील मानव  जम्मू पुलिस ने जम्मू के कठुआ जिले के रसाना गाँव में बकरवाल समुदाय की आठ वर्षीय बच्ची  के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में...
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भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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