देश में रेप कल्चर- एक हकीकत

गिरीश चंद्र लोहनी पिथौरागढ़, उत्तराखंड में मानविकी के विषयों को पढ़ाते हैं संपर्क:Email-Id glohani1@gmail.com मो. 999005798 स्त्रीकाल कॉलम  बलात्कार को अपराध नियंत्रण कार्यक्रम के तहत नहीं रोका जा सकता...

अबोध पर अपराध थोपने के ख़तरे

प्रियंका कल से आ रही ख़बरों के मुताबिक दिल्ली के एक स्कूल में नर्सरी में पढ़ने वाले चार साल के एक बच्चे पर, लगभग अपनी...

कुछ अच्छे शेल्टर होम भी हैं बिहार में, जाने TISS की रिपोर्ट के...

स्त्रीकाल डेस्क  टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल सायंसेज के सोशल ऑडिट रिपोर्ट में मुजफ्फरपुर सहित 14 शेल्टर होम में बड़ी अनियमिततायें तथा रहने वालों का शोषण...

तो हत्यारे जीत जायेंगे….!

निवेदिता  आज से 19 साल पहले चन्द्रशेखर मारा गया था. 19 साल बाद सीवान फिर गहरे सदमें,दुख और गुस्से में है. पत्रकार राजदेव रंजन की...

मीडिया की बलात्कारी भाषा: शेल्टर होम का सन्दर्भ

सुशील मानव  यौन-उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग में अपने भाषा संस्कार से बलात्कारी समाज गढ़ रहा मीडिया सेवा संकल्प बालिका गृह मुज़फ्फ़रपुर यौन उत्पीड़न केस...

मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी

डिसेंट कुमार साहू उत्पीड़ित समूहों द्वारा लिखी जाने वाली आत्मकथाओं ने हाल के समय में ब्राम्हणवादी-पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्वकारी मूल्यों को उद्घाटित करने में महत्वपूर्ण...

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया.

एक राजधानी: जहाँ टॉयलेट ढूंढते रह जाओगे. महिलाओं ने बयान किया दर्द

स्वच्छता अभियान, महिला हित के दावे और सच यह कि इस राजधानी में इक्के-दुक्के गंदे सार्वजनिक शौचालयों को छोड़कर कई-कई किलोमीटर तक एक शौचालय,...

अफसोस कि औरतें उठ तो रही हैं पर मर्दवादी संस्थाएं उन्हे कुचल देना...

पर अफसोस कि ये मार्च भी देश भर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में भर दी गयी महिला विरोध की भावना की भेंट चढ़ गया. मुख्यधारा मीडिया में इस मार्च कि चर्चा आज न के बराबर दिख रही है. खासकर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो आम लोगों के बीच अभी सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं वे लगातार सत्ता के खिलाफ जारी राजनीतिक सामाजिक बदलाव को खारिज करने या आम लोगों के बीच न पहुंचने देने में एक षड़यंत्रकारी भूमिका निभा रहे हैं.

भगत सिंह: हवा में रहेगी मेरे ख़यालों की बिजली

अंजलि कुमारी, उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे–जफा क्या है | हमें यह शौक है देखें...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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