भारत माता जार-बेजार रो रही है

 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com ( 'भारत माता की जय'...

नरसंहारों का स्त्रीपक्ष

संजीव चंदन बिहार के जहानाबाद कोर्ट ने सेनारी नरसंहार (जहां सवर्ण जाति के लोग मारे गये थे) के मामले में अपना निर्णय सुनाया है. कई...

कथित उदार नजरिया भी ब्राह्मणवादी नजरिया है

स्त्रीकाल डेस्क  पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बहुजन समाज की जानी मानी नेत्री डॉ मनीषा बांगर पिछले दिनों कनाडा के ब्राह्मप्टन शहर...

एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

प्रमोद रंजन व रवि प्रकाश ( देश में एक धीमा सांस्कृतिक आन्दोलन करवट ले रहा है , एक क्रांति घटित हो रही है , जिसकी...

मिथक और स्त्री आंदोलन का अगला चरण

संजीव चंदन ‘रिडल्स इन हिन्दुइज्म’ में डा. बाबा साहेब अंबेडकर इतिहास लिखने से ज्यादा इतिहास की व्याख्या को महत्वपूर्ण मानते हैं. भारतीय इतिहास के बहुत...

थेरीगाथा , बौद्ध धर्म और स्त्रियाँ

रजनीश कुमार रजनीश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय में बौद्ध अध्ययन विभाग में शोधरत हैं. रजनीश से इनके मोबाइल न 09911639095 पर संपर्क किया जा सकता...

लेखक संगठन (प्रलेस) ने स्त्री अस्मिता पर मर्द दरोगा को दी तरजीह

प्रलेस के इस महिलाविरोधी रवैये से अब महिलाओं को कुछ करना चाहिए। चुप रहने और बर्दाश्त करने की भी एक सीमा होती है। अब कहना ज़रूरी हो गया है। जब सिर्फ ऐतराज और शिकायत दर्ज करने से कोई सुनवाई नहीं हो रही है तो शायद ज्यादा कड़ा कदम उठाना चाहिए। लगता है कि सभी महिला सदस्यों को प्रलेस से सामूहिक इस्तीफा देने जैसा कदम उठाना चाहिए।

नफरत के खिलाफ “अमन की बातें”: महिलाओं की यात्रा का आज दिल्ली में...

स्त्रीकाल डेस्क  20 सितम्बर 2018 से देश की स्त्रियाँ "बातें अमन की" यात्रा पर हैं. यह यात्रा देश भर में अमन राग बिखेरते हुए अपने...

होली : एक मिथकीय अध्धयन

(कँवल भारती) डा. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक “फिलोसोफी ऑफ हिन्दुइज्म” में एक जगह लिखा है, “आज के हिंदू सबसे प्रबल विरोधी मार्क्सवाद के हैं. और...

धरती ( भूदेवी ) जहाँ होती हैं रजस्वला !

मंजू शर्मा सोशल मीडिया में सक्रिय मंजू शर्मा साहित्य लेखन की ओर प्रवृत्त हैं .संपर्क : ई मेल- manjubksc@yahoo.co.in ओडिशा में धरती (...

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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।