आज का स्त्रीलेखन सहज और ज्यादा आत्मविश्वासी है

आज हर व्यक्ति का वेल्यु सिस्टम, उसके जीवन मूल्य दूसरे से बहुत अलग हैं, या तो वहाँ नैतिकता का प्रश्न अप्रसांगिक हो गया है, या सबने इसे अपने वेल्यु सिस्टम के अनुसार पुनर्परिभाषित कर लिया है. आज सामूहिक जीवन मूल्यों की प्रतिध्वनियाँ धीरे-धीरे डूबती जा रही हैं वे औरअगर वे कहीं सुनाई भी देती हैं तो विभिन्न सत्ताओं द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए व्यक्ति या समाज पर आरोपित होती हैं.

औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जायेगा (भारती वत्स) की कविताएं

तुम अपनी निरँकुशताओँ की उन कार्यवाहियों से जिनकी बहुत भारी कीमत चुकाई है उन लोगों ने जिनने खडे होने का साहस किया था तुम्हारे विरुद्ध …. और अकस्मात पड़ गये थे निपट अकेले

कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।

मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियों के कशमकश भरी जिंदगी की कविताएं !

विनीता परमार की कवितायेँ आधुनिक कामकाजी महिलाओं की परिस्थितियों को, रोज -रोज की उनकी समस्याओं को बहुत बारीकी और तीक्ष्णता के साथ अपनी कविताओं के माध्यम से उठाती हैं. पर्यावरण विषय से पीएचडी कवयित्री ने अपनी इन कविताओं में भले ही प्रकृति का वर्णन नहीं दिखत पर सूक्ष्म रूप में यह आधुनिक जीवन की खोखली और फीकी चकाचौंध और उसमे कामकाजी स्त्रियों के बनावटी मुस्कान की मज़बूरी का बेहद सशक्त चित्र उभारती है.

वे सख्त दिल मह्बूब: सफ़र के क़िस्से

पहले रोज़ लुम्बिनी का सैर करना तय पाया गया , गौतम बुद्ध की जन्मस्थली देखने की शदीद ख़ाहिश थी , उसकी एक वजह ये थी कि बचपन से गौतम बुद्ध की अच्छाई की नेकी की बहुत सी कहानियां अम्मी से सुन रखी थी , या यूँ कह लें उनके क़िस्से कहानियां सुन कर बड़े हुए थे हम। परिंदे से नेक सुलूक की दास्तान और वो कविता जो अम्मी हमें सुनाती थीं,"

मेरी साड़ी वो आशियाना है

भारती वत्स चार्ली चैपलिन ने कहा था कि कविता पूरी दुनिया के नाम लिखा प्रेम पत्र है, आज...

आम्रपाली ( रेनू यादव की कविताएं)

मस्तक गिरवी पैर पंगू छटपटाता धड़ हवा में त्रिशंकू भी क्या लटके होंगें इसी तरह शून्य में ? रक्तीले बेबस आँखों से क्या देखते होंगे इसी तरह दो कदम रखने खातिर

आए बड़े पढ़े-लिखे इंसाफ़ज़ादे व अन्य कविताएं (कवयित्री: वीना)

धत तेरी की देखो कैसे धड़ल्ले से संसद के भीतर, लालकिले पर चढ़कर, आम सभाओं में, स्कूलों-कॉलेजों, संस्थाओं में विदेशों में झूठ की रेलम-पेल किये जाता है खामोश! देश के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हो अर्बन नक्सल, देशद्रोही का ठप्पा लगाकर जेल में सड़वा देगा

आबिदा (परिमला अम्बेकर की कहानी)

‘‘अम्मा आजकल मय्यत उठने के लिए भी बीस पच्चीस हजार लगते हैं !!‘‘ जब से खबर मिली है आबिदा...

हव्वा की बेटियों का ख़्वाब है ‘दूसरी जन्नत’/नासिरा शर्मा

यहां यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आई.वी.एफ और सरोगेसी जैसे मसले के सन्दर्भ में वास्तव में इस्लाम धर्म, कानून और मुस्लिम समुदाय अपना किस तरह का नजरिया इख्तियार करता है। इस दृष्टि से नासिरा शर्मा द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘दूसरी जन्नत’ बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।