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कला-संस्कृति | स्त्रीकाल | Page 10

भिखारी की विरासत की गायिका

नवल किशोर कुमार मूल रुप से असम की रहने वाली कल्पना पटोवारी, बिहार और उत्तरप्रदेश के लोगों के दिलों में वर्ष २००० में अपना जगह...

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी  ( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. ) सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने...

मंच पर स्त्री

मोना झा बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने...

ओमप्रकाश कुशवाहा के कुछ कार्टून

युवा कार्टूनिस्ट ओम प्रकाश कुशवाहा के कार्टून सामाजिक यथार्थ और विडम्बनाओं को बखूबी अभिव्यक्त करते हैं.  इन्होने जे एन यू से ' लोकतंत्र में...

चित्र श्रृंखला से समझें ‘ यौन सहमति’ का महत्व

यह चित्र श्रृंखला रूटीन में शामिल हमारे क्रिया -कलापों से समझा रही है कि ' सहमति' की क्या अहमियत होती है . यौन -संबंधों...

उम्मीदों के उन्मुक्ताकाश की क्वीन

नीलिमा चौहान पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक 'बेदाद ए इश्क' प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. एंड दे...

स्त्री मन , जीवन और भाव की कलाकृतियाँ

दलित लेखक संघ के महासचिव हीरालाल  राजस्थानी बेहद महत्वपूर्ण कलाकार हैं . उनके द्वारा बनाई गई मूर्तियाँ उनकी सजीव कला का प्रमाण हैं ....

कैफी आज़मी इप्टा सांस्कृतिक केंद्र ,पटना का उदघाटन किया शबाना आज़मी ने

निवेदिता  एक लंबे समय के बाद आखिरकार कलाकरों के पास एक ऐसी जगह हुई जहां वे अपनी कला का विस्तार कर सकते हैं।' कैफी आज़मी...

आये तुम इस धरती पर बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय !

  प्रो. परिमळा. अंबेकर ( कर्नाटक के गुलबर्गा में १० दिनों तक के एक कला शिविर में महात्मा बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं को उकेरा कलाकारों ने...

बहस में डाक्यूमेंट्री

सुधा अरोड़ा/  अरविन्द जैन ( ' इंडियाज डॉटर' डाक्यूमेंट्री के विवाद के दौरान स्त्रीकाल का अपडेट रुका था . उन्हीं दिनों लेखिका सुधा अरोड़ा और स्त्रीवादी...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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