वंचित तबकों की लड़कियों के भी खिलाफ है यह साजिश: जेएनयू प्रकरण

आरती रानी प्रजापति  रोहित वेमुला, जीशा, डेल्टा और न जाने कितने एकलव्य इस ब्राह्मणवादी भारत में मारे जा चुके हैं| इनका दोष इतना ही होता...

आधुनिक गुरुकुलों में आंबेडकर के वंशजों की हत्या

चंद्र सेन ( रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारणों की अकादमिक जगत में व्याप्तता की पड़ताल कर रहे हैं , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के...

अलीगढ़ विश्वविद्याल का छात्र आन्दोलन : एक आंतरिक विश्लेषण

कमलानंद झा  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर . संपर्क : 08521912909 अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अपने विश्वविद्यालय के अस्तित्व को बचाने...

महिलाओं दलितों के खिलाफ है इनका राष्ट्रवाद : अपराजिता राजा

जे एन यू पर सरकार और दक्षिणपंथी जमातों के हमले के दौरान बी जे पी के लोगों और हिंदूवादी जमातों के द्वरा सबसे ज्यादा...

वीरबालकवाद: हिन्दी साहित्य के भीतर क्रांतिधर्मिता को समझने के लिए जरूर पढ़ें यह व्यंग्यलेख

मनोहर श्याम जोशी  मनोहर श्याम जोशी के इस व्यंग्य लेख के मुख्य आधार रहे हैं अब बुजुर्ग वीरबालक रामशरणजोशी. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति...

बीएचयू में प्रशासन के गुंडे थे सक्रिय: लाठीचार्ज का आँखों देखा हाल

विकाश सिंह मौर्य 23 सितम्बर को दोपहर बाद अखिल विद्यार्थी परिषद् के उपद्रवी लड़कों ने अफवाह उड़ाई कि मुख्य गेट के सामने स्थित मदन मोहन...

अश्लील चैट की जांच के लिए बनी जांच-समिति पर उठे सवाल, जज ने कहा...

सुशील मानव  इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जांच कमेटी गठित करके मामले की जांच कराए जाने की सूचना के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय कैंपस में एक बार...

स्त्री अध्ययन विभागों पर शामत, असोसिएशन भी सवालों के घेरे में

देश भर में विभिन्न विश्वविद्यालयों में लगभग दो सौ  के आस-पास स्त्री अध्ययंन विभाग/केंद्र आज नयी चुनौतियों से जूझ रहे हैं. अभी बमुश्किल चार दशक...

नाम अम्बेडकर विश्वविद्यालय, काम दलितों की उपेक्षा

दलित शोधार्थी गरिमा एवं रश्मि द्वारा लिखा गया प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक छात्र समुदाय (PDSC) द्वारा किये गए प्रदर्शन के दौरान यह एक बार फिर सिद्ध...

युवा कवयित्री ने की आत्महत्या

स्त्रीकाल डेस्क  युवा कवयित्री और पर्यावरण एवं धारणीय विकास संस्थान, बीएचयू की शोधछात्रा ख्याति आकांक्षा सिंह ने मंगलवार की सुबह साढ़े चार बजे अपने किराये...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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