दलितस्त्रीवाद

दलित पत्रकारिता का जूनून: कठिन डगर की राह पर डॉली कुमार

स्त्री नेतृत्व की खोज’ श्रृंखला के तहत हमने नेतृत्व के कई नामों के बारे में या तो स्वयं उनसे  स्वयं या किसी लेखक द्वारा प्रस्तुत...

‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां आमंत्रित

स्त्रीकाल के द्वारा तृतीय  'सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान' (तृतीय) के लिए आवेदन / संस्तुतियां  15 दिसंबर  2016 तक आमंत्रित हैं. सावित्रीबाई फुले वैचारिकी सम्मान...

दलित स्त्रियाँ खुद लिखेंगी अपना इतिहास

हेमलता हेमलता ने 'दलित अस्मिता और शिक्षा' पर शोध किया है.सम्पर्क :hmdehrwal@gmail.com अनिता भारती आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। अपने तीखे और सटीक शब्दों...

दलित महिलाओं के संघर्ष की मशाल: मंजुला प्रदीप

दलित पितृसत्ता को भी जिसने चुनौती दी आज सावित्रीबाई फुले की जयंती (3 जनवरी) से हम एक मुहीम शुरू कर रहे हैं-स्त्रीकाल में ‘स्त्री नेतृत्व...

सावित्रीबाई फुले-स्त्री संघर्षो की मिसाल

सुजाता पारमिता सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) के संघर्षो पर आज भारतीय स्त्री संगठनों में चर्चा की जा रही है। लगभग डेढ़ सौ साल...

‘राष्ट्रहित और आरक्षण’

मुन्नी भारती मुन्नी भारती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं, सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय हैं . संपर्क :munnibharti@gmail.com आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय...

मीरा को ब्राह्मण सिद्ध करने वालों के पुरखों ने कबीर को भी बनाया था...

प्रेमकुमार मणि  भाजपा का असली चेहरा राष्ट्रपति चुनाव में एक बार फिर उजागर हुआ है . कुछ ही महीने पूर्व उत्तरप्रदेश चुनावों में दोनों हाथ...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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