महिला राजनीतिज्ञों से दुनिया के कई देशों में सेक्सिस्ट व्यवहार

अगर उनके पूरे कार्यकाल की घटनाओं पर गौर करें तो समझ में आएगा कि उनकी इन टिप्पणियों का क्या अर्थ है और स्त्री द्वेष की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहाँ एक विकसित, प्रगतिशील संपन्न देश की प्रधानमंत्री भी अगर महिला है तो कितनी वल्नरेबल हो जाती हैं। उनके लिए जानबूझकर बांझ और शासन करने के लिए अनफ़िट, मोटी, लाइंग काऊ , बिच , मेनोपॉजल मॉन्सटर जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए।

और भी तरीके हैं (तीन) तलाक-ए-बिद्दत समाप्त करने के: सरकार बहादुर की मंशा पर...

सात बिन्दुओं पर आधारित यह बिल अभी भी तीन तलाक बोलने वाले पति को तीन साल की सजा़ देने पर कायम है। अभी भी यह अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा। इसका अर्थ है कि तीन तलाक़ बोलने वाले शौहर को पत्नी या उसके खून के रिश्तेदारों की शिकायत पर फ़ौरन पुलिस जेल ले कर चली जाएगी और उसे तीन साल तक की सजा दी जाएगी। बिल में खून के रिश्तेदारों की परिभाषा भी स्पष्ट नही है।

गिरीश कर्नाड और उनकी इलाहाबादी बेटी

मेरी उम्र बहुत कम थी, मैं बेसब्री से फौरन उनके पास पंहुची और पूछा, "आप वहींं इंटैलीजेंट आदमी हैं ना, जो टर्निंग-पॉइंट में आते हैं... और मालगुड़ी डेज़ में भी.. है ना.."

‘तिवाड़ी परिवार’ में जातिभेद और छुआछूत बचपन से देखा

हमारी संस्था ने इसी समाज की बालिकाओं के छह – छह महीने के दो आवासीय शिविर किए. शिविर के समापन समारोह में प्रोफेसर श्यामलाल जैदिया को भी आमंत्रित किया. उन्होंने अपने उद्बोधन में बताया कि मैं भी आपके ही समाज से हूँ लेकिन मेहनत करके आज जोधपुर यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर पद से रिटायर हुआ हूँ. बचपन में मैं इसी यूनिवर्सिटी में मेरी माँ के साथ मैला ढोने (शौचालय साफ़ करने) जाता था.

ब्राह्मण होने का दंश: कथित पवित्रता की मकड़जाल

शिक्षकों के साथ एससीईआरटी मे विभिन्न प्रशिक्षणों के दौरान काम करते हुए कई बार जाती पूछी गई दक्षिण भारत मे (आंध्र प्रदेश) उस समुदाय या उस क्षेत्र विशेष के लोग ही आपको चिन्हित कर पाते हैं| मैं छत्तीसगढ़ मे रहती हूँ तो जब तक मैं स्वयम से होकर लोगो को अपनी जाति नहीं बताती तब तक पता नही होता| मेरे नाम में मैंने अपना उपनाम कभी नही लिखा संयोग से विद्यालय मे भी मेरा केवल नाम ही रह गया उपनाम किसी तरह से छूट गया|

ऑर्गेज़्मिक पैरिटी की चैरिटी बनाम ‘योनि उद्धारक’ बाजार

हम ड्यूरेक्स वालों का नहीं तो कम से कम अपनी प्यारी सिने तारिकाओं के आह्वान का तो यकीन करो । वो क्या है न कि हुआ ये कि मुल्क की औरतों के शोचनीय कामानुभवों की बात हम क़ंडोम कर्ता लोग से लीक होकर आगे को गई। आगे को गई तो सिने तारिका लोग फीलिंग कंसर्ण्ड हुईं ।

मेट्रो-किराया-माफ़: मोवलिटी और सुरक्षा की ओर एक कदम

इस तरह स्त्री सुरक्षा समाज के कई स्तरों और जीवन की कई परतों में फैला एक जटिल मामला है, एक सुरक्षित समाज बनाने के लिये समाज मे न जाने कितने बदलावों और उपायों की ज़रूरत है. स्त्रियों की दुकानों, दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों, सड़को, सिनेमाघरों, रेस्टोरेंट में बढ़ी हुई उपस्थिति एक ऐसा ही उपाय है जो असुरक्षा की भावना को कम कर सकता है.

उस संस्थान में ब्राह्मणों की अहमियत थी

कुछ बड़ी कक्षाओं में जब स्कूल के फॉर्म हम खुद भरने लगे तो जाति का सर्टिफिकेट लगाने की बात आई और मुझे वह सर्टिफिकेट नहीं लगाना था, तब पता चला कि अच्छा यह कुछ 'खास जातियों'के लिए ही लगता है, लेकिन तब भी मन में किसी तरह का और कोई भाव नहीं था, वह एक दिन होता था जब फॉर्म भरे जाते और अपनी-अपनी जातियाँ लिखी जाती थीं, तमाम दूसरी औपचारिकताओं की तरह। लेकिन तब ये जरूर लगता कि फॉर्म में ये कॉलम नहीं होना चाहिए…न ये कॉलम होता न हमें हमारी जातियाँ पता चलतीं।

हां उनकी नजर में जाति-घृणा थी, वे मेरे दोस्त थे, सहेलियां थीं

हिंदू ग्रंथों, टेलीविजन, सहित, समाज विज्ञान, सिनेमा ने अबतक आदिवासी को नकारात्मक तौर से पेश किया है. एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी के विद्वानों ने भी आदिवासियों का स्ट्रियोटाइप गढ़ने में बड़ा रोल अदा किया है.इसी स्टरियोटाइप से ग्रसित ही कर मेरे कॉलेज के दोस्तों ने मेरे साथ टिफिन खाना बंद कर दिया.

केरल के सभी स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाना अनिवार्य:देश में पहली बार

79 फीसदी छात्राओं ने माना कि वे मासिक धर्म के दौरान स्कूल जाना या घर से बाहर निकलना पंसद नहीं करतीं. 45 फीसदी छात्राएँ मासिकधर्म के दौरान योग और खेलकूद नहीं करती जबकि 41 फीसदी ऐसा करती हैं. 28 फीसदी कभी कर लेती हैं कभी नहीं करती. इसी तरह 63.5 फीसदी छात्राओं ने बताया कि उन्हें महिला प्रजनन प्रणाली के बारे में जानकारी है जबकि 86.5प्रतिशत छात्राओं को पुरुष प्रजनन प्रणाली की जानकारी नहीं थी.
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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